देश की खबरें | खंडित फैसले के बाद, उच्चतम न्यायालय ने पादरी को गांव से दूर निर्दिष्ट स्थान पर दफनाने का आदेश दिया
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उउच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक पादरी के अंतिम संस्कार के संबंध में खंडित फैसले के बाद उसे पड़ोसी गांव में ईसाइयों के लिए निर्दिष्ट स्थान पर दफनाने का निर्देश दिया। पादरी का शव सात जनवरी से छत्तीसगढ़ के एक शवगृह में रखा है।
नयी दिल्ली, 27 जनवरी उउच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक पादरी के अंतिम संस्कार के संबंध में खंडित फैसले के बाद उसे पड़ोसी गांव में ईसाइयों के लिए निर्दिष्ट स्थान पर दफनाने का निर्देश दिया। पादरी का शव सात जनवरी से छत्तीसगढ़ के एक शवगृह में रखा है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि पादरी को परिवार की निजी कृषि भूमि पर दफनाया जाना चाहिए लेकिन न्यायमूर्ति सतीशचंद्र शर्मा ने कहा कि शव को छत्तीसगढ़ में उनके गांव से दूर एक निर्दिष्ट स्थान पर दफनाया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘‘इस पीठ के सदस्यों के बीच अपीलकर्ता के पिता के अंतिम संस्कार के स्थान पर कोई सहमति नहीं बन पाई, जिनकी सात जनवरी को मृत्यु हो गई थी।’’
पादरी का शव सात जनवरी से शवगृह में रखे होने, तथा ‘‘शीघ्र और सम्मानजनक अंतिम संस्कार’’ के लिए पीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश जारी करने पर सहमति व्यक्त की।
न्यायालय ने अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार करकापाल गांव के कब्रिस्तान में करें, जो उनके पैतृक गांव छिंदवाड़ा से 20-25 किलोमीटर दूर है, जहां ईसाइयों के लिए अलग कब्रिस्तान उपलब्ध है।
इसमें कहा गया है, ‘‘प्रतिवादी-राज्य और उसके स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि यदि अपीलकर्ता चाहे तो शव को जगदलपुर स्थित मेडिकल कॉलेज के शवगृह से करकापाल गांव स्थित कब्रिस्तान में स्थानांतरित करने के लिए अपीलकर्ता और उसके परिवार को सभी प्रकार की सहायता प्रदान की जाए।’’
शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार और उसके प्राधिकारियों को पर्याप्त पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश भी दिए ताकि शव का अंतिम संस्कार जल्द से जल्द हो सके।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने 37 पृष्ठ के अपने फैसले में कहा कि मृत्यु सबसे बड़ा सत्य है और हर किसी को इस गंभीर सत्य को बार-बार याद रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन वर्तमान मामला यह दिखाता है कि किसी गांव के निवासी की मृत्यु से विभाजन पैदा हो सकता है, इसलिए न्यायालय से उसके दफनाने के स्थान के बारे में निर्णय देने की मांग की जाती है।’’
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि ग्राम पंचायत आपत्तियों और ‘‘अपीलकर्ता के परिवार को दी गई धमकियों’’ का समाधान कर देती, तो मामला गांव में ही सुलझ गया होता।
उन्होंने कहा कि यह घोषणा कि समुदाय की परंपरा को त्यागने वाले या ईसाई धर्म अपना चुके किसी भी व्यक्ति को गांव के कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति नहीं है, ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण’’ है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘मेरे विचार से यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन है, जो कानून के समक्ष समानता तथा धर्म के आधार पर भेदभाव पर सख्त प्रतिबंध लगाते हैं।’’
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (बस्तर) द्वारा ऐसी घोषणा करने के अधिकार पर सवाल उठाते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि स्थानीय प्राधिकारियों का ऐसा रवैया ‘‘धर्मनिरपेक्षता के उत्कृष्ट सिद्धांतों’’ और ‘‘देश की गौरवशाली परंपराओं’’ के साथ विश्वासघात है, जो ‘‘सर्व धर्म समन्वय/सर्व धर्म समभाव’’ में विश्वास करती हैं, जो धर्मनिरपेक्षता का सार है।
न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार यथाशीघ्र अपने गांव में अपनी निजी कृषि भूमि पर करें।
हालांकि, न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ ग्राम पंचायत के नियमों के अध्ययन से पता चलेगा कि कब्रों का निर्माण मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है, तथा इन्हें पंचायत द्वारा निर्धारित क्षेत्रों में ही बनाया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति शर्मा ने अपीलकर्ता और उसके परिवार को दफ़नाने के लिए करकापाल गांव में निर्दिष्ट ईसाई कब्रिस्तान के भीतर उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने रमेश बघेल नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती दी है। उच्च न्यायालय ने रमेश के पादरी पिता के शव को गांव के कब्रिस्तान में ईसाइयों को दफनाने के लिए निर्दिष्ट क्षेत्र में दफनाने के अनुरोध संबंधी उसकी याचिका का निपटारा कर दिया था।
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