देश की खबरें | आपराधिक मामले में बरी होना नियोक्ता को अनुशासनात्मक जांच करने से नहीं रोकता है: उच्चतम न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि एक आपराधिक मामले में एक आरोपी को बरी करना नियोक्ता को अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने से नहीं रोकता है।

नयी दिल्ली, 22 मार्च उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि एक आपराधिक मामले में एक आरोपी को बरी करना नियोक्ता को अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने से नहीं रोकता है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि साक्ष्य के नियम, जो आपराधिक मुकदमे पर लागू होते हैं, अनुशासनात्मक जांच को नियंत्रित करने वाले नियमों से अलग होते हैं।

न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के नवंबर 2017 के फैसले के खिलाफ अपील की अनुमति दी। इस फैसले में उच्च न्यायालय ने कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण का निर्णय रद्द कर दिया था। न्यायाधिकरण के फैसले में रिश्वत के आरोप में अनुशासनात्मक जांच के बाद किसी कर्मचारी को सेवा से अनिवार्य सेवानिवृत्ति का निर्देश दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून के तहत दंडनीय अपराध के लिए अभियोजन में, उचित संदेह से परे अपराध के तथ्यों को स्थापित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर है।

उच्च न्यायालय का फैसला निरस्त करते हुए पीठ ने कहा, ‘‘आपराधिक मामले में आरोपी को बरी करना नियोक्ता को अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने में आगे बढ़ने से नहीं रोकता है।’’

उच्च न्यायालय के नवंबर 2017 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर शीर्ष अदालत ने अपना फैसला सुनाया।

पीठ ने इस बात पर गौर किया कि वह व्यक्ति कर्नाटक के बीजापुर जिले में एक ग्राम लेखाकार के रूप में कार्यरत था और उसके खिलाफ आरोप यह था कि उसने एक गांव में स्थित भूमि के संबंध में एक व्यक्ति का नाम हटाने के लिए रिश्वत की मांग की थी।

जांच के बाद, उनके खिलाफ एक अदालत में आरोप पत्र दायर किया गया, जिसने बाद में उन्हें अक्टूबर 2013 में सभी आरोपों से बरी कर दिया था।

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