राहतकर्मियों के लिए सबसे खतरनाक साल रहा 2025
हिंसाग्रस्त इलाकों में जाने वाले राहतकर्मियों को अगर अपनी ही जान की चिंता सताने लगे तो क्या होगा? संयुक्त राष्ट्र ने आंकड़ों के साथ यही सवाल दुनिया के सामने रखा है.
हिंसाग्रस्त इलाकों में जाने वाले राहतकर्मियों को अगर अपनी ही जान की चिंता सताने लगे तो क्या होगा? संयुक्त राष्ट्र ने आंकड़ों के साथ यही सवाल दुनिया के सामने रखा है.वर्ष 2025, संयुक्त राष्ट्र की नजर में राहतकर्मियों के लिए बेहद घातक साबित हुआ. यूएन के मुताबिक, बीते साल 907 राहतकर्मियों ने सीधे तौर पर हिंसा का सामना किया. यह संख्या उन राहतकर्मियों की है, जो मारे या घायल या फिर अगवा किए गए. ये आंकड़े ऐड वर्कर सिक्योरिटी डाटाबेस के हवाले से दिए गए हैं. यह डाटाबेस कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की वित्तीय मदद से चलता है.
2025 के आंकड़ों की तुलना 2024 से की जाए तो राहतकर्मियों को निशाना बनाने की घटनाओं से साफ इजाफा दिखता है. 2024 में हिंसा का शिकार होने वाले राहतकर्मियों की संख्या 833 थी, इनमें से 387 मारे गए. वहीं 2025 में राहतकर्मियों की मौत के 350 मामले सामने आए.
2026 में भी अब तक 82 राहतकर्मी मारे जा चुके हैं. 97 घायल हुए हैं और 39 अपहरण झेल चुके हैं.
यूएन ने की जवाबदेही तय करने की मांग
संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटेरेश ने राहतकर्मियों और मानवीय मदद के खिलाफ बढ़ती हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए, सदस्य देशों से अपील की है कि वे युद्ध के नियमों का सम्मान करें. गुटेरेश ने दोषियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है. विश्व मानवीय राहत दिवस की तैयारी में जुटे गुटेरेश ने कहा, "दूसरों की मदद करना, अभूतपूर्व रूप से खतरनाक हो चुका है."
यूएन की मानवीय राहत शाखा के प्रमुख टॉम फ्लेचर के मुताबिक, युद्ध प्रभावित इलाकों में सस्ते ड्रोन राहतकर्मियों के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं. मार्च 2026 में डीआर कांगो के पूर्वी इलाके गोमा में एक ड्रोन हमला हुआ. इसमें एक फ्रांसीसी राहतकर्मी समेत तीन लोग मारे गए. सूडान और यूक्रेन में भी राहतकर्मियों के काफिले पर ड्रोन हमले हुए. सूडान में इस साल के पहले चार महीनों में आम नागरिकों की मौत के मामलों के पीछे 80 फीसदी ड्रोन हमले थे.
फ्लैचर ने एक बयान जारी कर कहा, "तीन साल के भीतर 1,000 से ज्यादा राहतकर्मी मारे जा चुके हैं और ये पूरी तरह अस्वीकार्य है. सिर्फ आवाज उठाने से अगले राहतकर्मी की जान नहीं बचेगी."
राहतकर्मियों के लिए सबसे खतरनाक बना गाजा
2025 में गाजा, मानवीय मदद पहुंचाने वाले राहतकर्मियों के लिए सबसे जानलेवा जगह साबित हुआ. डाटाबेस के मुताबिक गाजा में 186 राहतकर्मी मारे गए. इसके बाद सूडान का नाम है.
संयुक्त राष्ट्र की फलीस्तीन रिफ्यूजी एजेंसी का कहना है कि 7 अक्टूबर 2023 को शुरू हुए गाजा युद्ध में अब तक उसके 393 स्टाफ मेंबर मारे जा चुके हैं. इनमें से कई मौतों के लिए इस्राएली हमलों को जिम्मेदार बताया जाता है. गाजा में हमास से लड़ रहे इस्राएल का कहना है कि, वह आम लोगों पर हमला न करने के लिए, कई कदम उठा चुका है.
यूएनआरडब्ल्यूए के पूर्व प्रमुख फिलिपे लाजारिनी, इस साल की शुरुआत में कह चुके हैं कि वह स्टाफ मेंबरों की मौत की जांच उच्च स्तरीय पैनल से कराना चाहते हैं.
चैरिटी संस्था, ऑक्सफैम की विश्व मानवीय नीति की प्रमुख बुशरा खालिदी कहती हैं, "हम मानवीय मदद पर ही हमला देख रहे हैं."
राहत पर निर्भर करोड़ों लोग
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 30 करोड़ से ज्यादा लोगों को जिंदा रहने या अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी करने के लिए मानवीय सहायता की जरूरत है. इस संकट की तीन मुख्य वजहें: युद्ध और हिंसा, जलवायु परिवर्तन और भुखमरी हैं.
हाल के बरसों में दुनिया के कुछ हिस्सों में हिंसक सैन्य संघर्ष भी भड़के हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा होने वाले संकट भी. यूएन के मुताबिक बढ़ती जरूरतों के बीच, फंडिंग में कमी हो रही है.
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 19, 2026 07:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

