न्यायालय ने कोविड-19 के मद्देनजर मध्यस्थता कार्यवाही और चेक बाउन्स मामले दायर करने की अवधि बढ़ाई
मध्यस्थता एवं सुलह कानून, 1996 और निगोश्येबल इंस्ट्रूमेन्ट्स कानून, 1881 के तहत वादकारों के पास कार्यवाही शुरू करने के लिये एक निश्चित अवधि का प्रावधान है और अगर कानून में प्रदत्त अवधि के भीतर मामला दायर नहीं किया जाये तो यह निरर्थक हो जाता है।
नयी दिल्ली, छह मई कोविड-19 महामारी के कारण राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के मद्देनजर वकीलों और वादकारों को हो रही परेशानियों को ध्यान में रखते हुये उच्चतम न्यायालय ने कानूनों के तहत मध्यस्थता कार्यवाही शुरू करने और चेक बाउन्स के मामलों में याचिका दायर करने की समयावधि बुधवार को 15 मार्च से अगले आदेश तक के लिये बढ़ा दी।
मध्यस्थता एवं सुलह कानून, 1996 और निगोश्येबल इंस्ट्रूमेन्ट्स कानून, 1881 के तहत वादकारों के पास कार्यवाही शुरू करने के लिये एक निश्चित अवधि का प्रावधान है और अगर कानून में प्रदत्त अवधि के भीतर मामला दायर नहीं किया जाये तो यह निरर्थक हो जाता है।
न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति ऋषिकेश राय की पीठ ने कहा कि यदि समय सीमा 15 मार्च के बाद खत्म हो गयी है तो 15 मार्च से अगले आदेश तक, लॉकडाउन खत्म होने की तारीख तक, यह अवधि बढ़ी रहेगी।
पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुयी सुनवाई के दौरान केंद्र को नोटिस जारी किया। इस मामले में केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल और सॉलिसीटर जनरल मौजूद थे।
पीठ ने कहा कि वह ऐसी राहत देना चाहती है परंतु ऐसा व्यापक आदेश नहीं हो सकता और इसलिए उसने इस बारे में केन्द्र की राय मांगी है।
इससे पहले, न्यायालय ने कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से उच्च न्यायालय या अधिकरण के फैसलों के खिलाफ निश्चित अवधि के भीतर अपील दायर करने में वकीलों तथा वादकारों के सामने पेश आ रही कठिनाइयों का स्वत: ही संज्ञान लिया और संविधान में प्रदत्त अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुये यह समय सीमा बढ़ाने का आदेश दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह आदेश सभी उच्च न्यायालयों के संज्ञान में लाया जाये ताकि वे इसे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली अधीनस्थ अदालतों और अधिकरणों तक पहुंचा सकें।
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