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परफ्यूम का इतिहास: खुशबू जो समय जितनी पुरानी है

परफ्यूम के इतिहास की छाप मेसोपोटामिया, भारत, मिस्र और यूरोप से होते हुए कई जगहों पर मिलती है.

परफ्यूम का इतिहास: खुशबू जो समय जितनी पुरानी है
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

परफ्यूम के इतिहास की छाप मेसोपोटामिया, भारत, मिस्र और यूरोप से होते हुए कई जगहों पर मिलती है. अब इसकी कहानी डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर नए अंदाज में सुनाई जा रही है.‘परफ्यूम' का नाम लेते ही, सबसे पहले हमारे मन में खूबसूरत बोतलों में बंद खुशबूदार लिक्विड की तस्वीर उभर आती है. यह नाम खुद लैटिन शब्द ‘पर फ्यूमम' से आया है, जिसका मतलब है ‘धुएं के जरिए'. इससे पता चलता है कि आज हम जिसे ‘परफ्यूम' या इत्र समझते हैं, वह अपने पुराने रूप और हमारे पूर्वजों द्वारा इसके इस्तेमाल के तरीके से बहुत अलग है.

इत्र का इतिहास केवल खुशबू से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिक खोजों, एक देश से दूसरे देश तक पहुंचने वाले ज्ञान और व्यापार के विस्तार का भी अध्ययन है. इसके साथ ही, यह उपनिवेशवाद, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और आज के दौर की यूरोपीय मार्केटिंग की कहानी भी बयां करता है.

खुशबू की बात तो हर काल में हुई है

ब्रिटैनिका के मुताबिक, प्राचीन चीनी, हिंदू, मिस्रवासी, इस्राएली, कार्थेजियन, अरब, यूनानी और रोमन सभी कथित तौर पर परफ्यूम बनाने की कला से परिचित थे. इत्र और उसके इस्तेमाल के संदर्भ बाइबिल के साथ-साथ हदीस में भी मिलते हैं.

शुरुआती परफ्यूम बनाने का काम 4,000 साल से भी पहले मेसोपोटामिया की सभ्यता से शुरू हुआ था. उसमें लोबान और गंधरस जैसे खुशबूदार पदार्थों को जलाया जाता था. यह माना जाता था कि ऊपर उठता हुआ धुआं धरती को भगवान से जोड़ता है.

असल में, इतिहास में दर्ज सबसे पहली ‘नोज' यानी इत्र बनाने की कला में माहिर इंसान (परफ्यूमर्स) ‘तप्पुती' नाम की एक महिला थी. वह मेसोपोटामिया की एक रसायन शास्त्री थी. आज से करीब 3,200 साल पहले यानी 1200 ईसा पूर्व के एक प्राचीन शिलालेख में उनके द्वारा इत्र बनाने के तरीकों का जिक्र मिलता है.

परफ्यूमर और इतिहासकार आलेक्जेंड्रे हेलवानी ने डीडब्ल्यू को बताया, "तप्पुती एक ‘मुराक्किटु' थीं. असीरियन और बेबीलोन के शाही दरबारों में ‘मुराक्किटु' की उपाधि इत्र बनाने वाले सबसे बड़े विशेषज्ञों को दी जाती थी. तप्पुती का नाम इतिहास में दर्ज होना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि यह दिखाता है कि हजारों साल पहले भी शाही महलों में इत्र बनाने का काम महिलाओं के हाथ में था और उन्हें बहुत सम्मान दिया जाता था.

आर्कियोकेमिस्ट बारबरा हूबर, इतिहास में इंसानों और पौधों के रिश्तों पर रिसर्च करती हैं. वह बताती हैं, "समय के साथ ‘परफ्यूम' या इत्र में कई तरह की सुगंधित चीजें और तरीके शामिल हो गए. इसमें धूप और अगरबत्ती जलाना, खुशबूदार लकड़ियां, महकते हुए तेल, मरहम, लेप और यहां तक कि सौंदर्य प्रसाधन भी शामिल हैं.”

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "इनमें से कई चीजों का इस्तेमाल सिर्फ खुद को सजाने के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक कामों, देवी-देवताओं को चढ़ावा चढ़ाने, शुद्धिकरण या इलाज के लिए भी किया जाता था. परफ्यूम, दवा और कॉस्मेटिक्स के बीच की सीमाएं अक्सर धुंधली होती थीं.”

प्राचीन मिस्र में खुशबूदार तेल और रेजिन, रीति-रिवाजों और ममी बनाने के लिए जरूरी थे. वहीं भारत में, त्वचा पर चंदन का लेप लगाया जाता था, बालों में चमेली के फूल गूंथे जाते थे और कपड़ों में केसर की महक बसाई जाती थी. खुशबू के इन अलग-अलग इस्तेमाल का मकसद शरीर को शुद्ध बनाना था.

हाल के एक शोध में यह भी पाया गया है कि प्राचीन यूनान और रोम में देवी-देवताओं की मूर्तियों को सुगंधित चीजों से ‘महकाया' जाता था ताकि वे अधिक जीवंत लगें.

तरल इत्र की खोज

शुरुआती दौर में खुशबू का मतलब केवल जलती हुई लकड़ियां या गाढ़े लेप हुआ करते थे, लेकिन इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान अरब वैज्ञानिकों ने इसे तरल रूप देना शुरू किया. बगदाद के महान विद्वान अल-किंदी ने 9वीं सदी में इत्र के रसायन विज्ञान पर एक किताब ‘द बुक ऑफ द केमिस्ट्री ऑफ परफ्यूम एंड डिस्टिलेशन' लिखी. यह किताब इत्र बनाने की बारीकियों को समझाने वाली पहली मुकम्मल गाइड मानी जाती है.

एक सदी बाद, फारसी विद्वान इब्न सीना (जिन्हें पश्चिम में एविसेना के नाम से जाना जाता है) ने फूलों से 'इत्र' (एसेंशियल ऑयल) निकालने के लिए 'भाप आसवन (स्टीम डिस्टिलेशन)' की तकनीक को और बेहतर बनाया. उन्होंने खास तौर पर गुलाबों पर काम किया, जो आगे चलकर इत्र बनाने वालों के लिए एक मॉडल बन गया.

उन दोनों ने कई बुनियादी तकनीकों और तरीकों का ईजाद किया. आज इत्र बनाने के मौजूदा उद्योग में उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है.

इत्र के क्षेत्र में कैसे आगे बढ़ गए पश्चिमी देश

ये तरक्की कई रास्तों से यूरोप पहुंची. अल-अंदलुस, 8वीं से 15वीं शताब्दी के बीच स्पेन और पुर्तगाल का मुस्लिम-शासित हिस्सा था. इसने एक पुल का काम किया, जहां टोलेडो में रहने वाले विद्वानों ने अरबी ग्रंथों का लैटिन में अनुवाद किया. उसी समय, भूमध्यसागरीय व्यापार के जरिए गुलाब जल और मसाले वेनिस और जेनोआ जैसे बंदरगाहों तक पहुंचे. वहीं इसी दौर में, धर्म बचाने के लिए हुए युद्धों के दौरान यूरोपीय लोगों ने अरब की चिकित्सा पद्धति और इत्र बनाने के तरीकों को करीब से जाना.

साफ तौर पर कहें, तो यूरोप के लिए परफ्यूम कोई नई चीज नहीं थी. रोम के लोग नहाने के लिए खुशबूदार पानी और तेल का इस्तेमाल करते थे. मध्यकालीन रईस जड़ी-बूटियों, पोमेंडर और अगरबत्ती का इस्तेमाल करते थे. मध्य युग में, इत्र के व्यावहारिक और प्रतीकात्मक उपयोग थे. डॉक्टर 'ब्लैक डेथ' (प्लेग) फैलाने वाली ‘गंदी हवा' से बचने के लिए पक्षी जैसी चोंच वाले मास्क में जड़ी-बूटियां भरते थे. फ्रांस के राजा लुई चौदहवें के वर्साय महल के फव्वारों से उनका पसंदीदा ‘ऑरेंज ब्लॉसम' पानी निकलता था. उस दौर में, सुगंधित दस्ताने न केवल बदबू को छिपाते थे बल्कि फैशन का हिस्सा भी थे.

हालांकि, अरब दुनिया की आधुनिक तकनीकों और बेहतरीन सामग्रियों ने यूरोपीय इत्र कला को फिर से जीवित किया. इसे एक आधुनिक उद्योग में बदल दिया. उन्होंने अल्कोहल को बेस के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया, जिससे ऐसे परफ्यूम बने जो पहले के मुकाबले हल्के थे और जिनकी खुशबू ज्यादा देर तक टिकती थी.

औपनिवेशिक विस्तार का असर

जैसे-जैसे यूरोपीय इत्र उद्योग फलने-फूलने लगा, खास तौर पर फ्रांस में, तो उपनिवेशों के विस्तार ने उन जरूरी चीजों की आपूर्ति की जिससे बढ़ते हुए इस उद्योग को सहारा मिला.

आलेक्जेंड्रे हेलवानी कहते हैं, "मार्केटिंग की तस्वीरों में कच्चे माल को प्रकृति के अनमोल और सदाबहार तोहफे की तरह दिखाया जाता है. अक्सर इन्हें इस तरह पेश किया जाता है जैसे ये किसी दूरदराज के अनोखे और जादुई देश से आए हों, जो पुराने औपनिवेशिक दौर की याद दिलाता है. लेकिन जमीन के मालिकाना हक, मजदूरों की हालत, सही कीमत और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर जैसे पेचीदा सवालों को अक्सर छिपा लिया जाता है.”

इसका एक बेहतरीन उदाहरण वनीला है. 16वीं शताब्दी में स्पेनिश लोग इसे यूरोप लाए. बाद में यह हिंद महासागर के द्वीपों में एक प्रमुख औपनिवेशिक फसल बन गई. हेलवानी यहां एडमंड एल्बियस की कहानी बताते हैं, जो रीयूनियन (पुराना नाम बॉर्बन) द्वीप पर एक गुलाम लड़का था. 1841 में, मात्र 12 साल की उम्र में, उसने वह तरीका खोजा जिससे वनीला के पौधों में फूल से फल बनने की प्रक्रिया (परागण) हाथों से की जा सके. आज भी वनीला के उत्पादन में इसी तरीके का इस्तेमाल होता है.

हेलवानी कहते हैं, "अगर वह न होता, तो वनीला एक दुर्लभ चीज ही बनी रहती. पेटेंट और तकनीक की आज की दुनिया में, मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर एडमंड एल्बियस गुलाम न होता, तो वह कितना बड़ा अरबपति होता.” वह इस बात पर जोर देते हैं कि जब हम 'इत्र के इतिहास' की बात करते हैं, तो हम साथ-साथ साम्राज्यों, व्यापार और उपनिवेशवाद के इतिहास की भी बात कर रहे होते हैं.

यूरोपीय ब्रैंडिंग का प्रभाव

जैसे-जैसे इत्र का बाजार बढ़ा, यूरोप की बड़ी कंपनियों ने प्रचार और विज्ञापनों पर अपना कब्जा जमा लिया. उन्होंने धीरे-धीरे दुनिया को यह यकीन दिला दिया कि एक अच्छा और महंगा परफ्यूम वही है जो यूरोपीय अंदाज का हो. इस तरह ‘शालीनता' और ‘क्लास' को यूरोपीय सुंदरता के साथ जोड़कर देखा जाने लगा.

बारबरा हूबर कहती हैं, "इत्र बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फूल, मसाले और जड़ी-बूटियां दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आती हैं जहां इत्र के इस्तेमाल की सदियों पुरानी परंपराएं रही हैं, लेकिन उन्हें पेश करने का तरीका और उनकी कहानियां अक्सर ‘यूरोसेंट्रिक' होती हैं. जब इन परफ्यूम को बेचा जाता है, तो विज्ञापनों में सारा श्रेय यूरोपीय शैली और संस्कृति को दे दिया जाता है.

इसी वजह से, कुछ यूरोपीय इत्र कंपनियों को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा है, जो सुगंधों को ‘ओरिएंटल' के रूप में वर्गीकृत करती हैं. 'चेंज डॉट ओआरजी' की एक याचिका में इस तरह के वर्गीकरण का विरोध करते हुए कहा गया है: "ओरिएंट शब्द मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया जैसे एक बहुत बड़े क्षेत्र को एक ही दायरे में समेटने की कोशिश करता है जहां इत्र बनाने के कई पुराने तरीके और कच्चे माल की खोज हुई थी. किसी चीज को सिर्फ ‘आकर्षक' और ‘खुशबूदार' दिखाने के लिए इस शब्द का बार-बार इस्तेमाल करना, उस साम्राज्यवाद और इस्लामोफोबिया को छिपा देता है जो आज भी दुनिया के इन हिस्सों को अस्थिर कर रहे हैं.”

इसी वजह से, साल 2000 के बाद से इत्र कंपनियों ने अपनी मार्केटिंग के तरीके बदले हैं. अब तीखी और गर्माहट भरी खुशबुओं को बताने के लिए ‘ऐम्बर' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.

'परफ्यूम-टॉक' का असर

सोशल मीडिया ने इत्र की दुनिया को सबके लिए खोल दिया है. आज टिकटॉक के इन्फ्लुएंसर्स और उनके ‘अनपैकिंग' रील्स की वजह से दुनिया भर के लोग उन खुशबुओं के बारे में आसानी से जान सकते हैं जिनके बारे में लोगों को सीमित जानकारी थी या जो किसी खास इलाके तक ही मशहूर थीं.

परफ्यूम-टॉक (टिकटॉक का वह हैशटैग जो खुशबू के लिए है) पर शुरुआती वायरल सेंसेशन ‘फ्लूर' के ‘मिसिंग पर्सन' का था. यह 2022 में इतना बिका कि स्टॉक खत्म हो गया और अमेरिका में 2 लाख से ज्यादा लोगों की वेटिंग लिस्ट बन गई. इसकी वजह से इमोशनल वीडियो की बाढ़ आ गई, जिसमें लोग इस इत्र को सूंघकर अपने बिछड़े हुए प्रियजनों को याद कर रहे थे.

वहीं, आज भारत में युवाओं का एक नया वर्ग उभर रहा है जो इत्र बनाने के पारंपरिक तरीकों को आधुनिक रूप दे रहा है. इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके वे दुनिया को इत्र बनाने की प्राचीन और पर्यावरण के अनुकूल प्रक्रिया के बारे में बता रहे हैं. उनकी ये 'डिजिटल स्टोरीटेलिंग' यह साबित करती है कि सोशल मीडिया के जरिए हम अपनी उन जड़ों तक वापस पहुंच सकते हैं जिन्हें शायद औपनिवेशिक काल के व्यापार के दौरान छिपा दिया गया था.

कुल मिलाकर देखा जाए, तो इत्र का इतिहास बिल्कुल उसकी बनावट की तरह है, जिसमें समय-समय पर अलग-अलग परतें उभरती हैं. जिस तरह कोई एक अकेला परफ्यूम दुनिया की हर खुशबू को अपने अंदर नहीं समेट सकता, उसी तरह कोई एक कहानी इत्र के इस विविधता भरे इतिहास को पूरी तरह बयां नहीं कर सकती.

आलेक्जेंड्रे हेलवानी कहते हैं, "इत्र का हर स्प्रे अपने साथ एक बड़ी विरासत लेकर आता है. जब हम इत्र छिड़कते हैं, तो वह केवल एक खुशबू नहीं होती, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति और मेहनत का हिस्सा होती है. इत्र की यही खूबी मुझे सबसे अच्छी लगती है. भले ही इसे त्वचा पर लगाना एक छोटा सा काम हो, लेकिन इसके पीछे के इतिहास की परतें बहुत गहरी हैं.”

(The above story first appeared on LatestLY on Dec 26, 2025 07:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).