परमाणु ऊर्जा की ओर लौटने के खिलाफ हैं जर्मन चांसलर

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन यूरोपीय संघ में नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने के प्रस्ताव के पक्ष में हैं, लेकिन जर्मन चांसलर मैर्त्स ने इसे नामुमकिन बताया है, आखिर क्यों?पिछले हफ्ते पेरिस के पास परमाणु ऊर्जा को लेकर एक सम्मेलन हुआ.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन यूरोपीय संघ में नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने के प्रस्ताव के पक्ष में हैं, लेकिन जर्मन चांसलर मैर्त्स ने इसे नामुमकिन बताया है, आखिर क्यों?पिछले हफ्ते पेरिस के पास परमाणु ऊर्जा को लेकर एक सम्मेलन हुआ. इसमें यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने कुछ यूरोपीय देशों द्वारा परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल से पीछे हटने और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने के फैसले को एक ‘रणनीतिक गलती' बताया. उन्होंने कहा कि परमाणु ऊर्जा बिजली का भरोसेमंद, सस्ता और कम प्रदूषण फैलाने वाला स्रोत है. साथ ही, उन्होंने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) की ओर से नए सिरे से आर्थिक मदद देने का भी एलान किया.

ईयू अध्यक्ष की बातों की गूंज जर्मनी में सुनाई दी, जिसने 2023 में ही अपना आखिरी परमाणु रिएक्टर बंद कर दिया था.

फॉन डेय लाएन के पिता एर्न्स्ट अल्ब्रेष्ट अपनी बेटी की तरह जर्मनी के सेंटर-राइट क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) के सदस्य थे. वे 1970 के दशक में जर्मनी के लोअर सैक्सनी राज्य की सरकार के मुखिया थे और परमाणु ऊर्जा के बहुत बड़े समर्थक थे.

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हालांकि, अल्ब्रेष्ट अपने राज्य के पूर्वी हिस्से में परमाणु कचरे के लिए एक स्थायी भंडारण केंद्र बनाने की कोशिश में नाकाम रहे. वे चाहते थे कि परमाणु कचरे को हमेशा के लिए जमीन के नीचे दफनाने के लिए एक जगह बनाई जाए, लेकिन जनता ने उनकी इस योजना को सफल नहीं होने दिया. उन्होंने इसके लिए गोरलेबेन गांव को चुना था, लेकिन वहां शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों ने इतिहास बदल दिया. यह गांव परमाणु ऊर्जा के खिलाफ लाखों लोगों के आंदोलन का प्रतीक बन गया. लोगों के भारी विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा और आखिरकार वह केंद्र कभी नहीं बन पाया.

2023 से जर्मनी में कोई परमाणु ऊर्जा संयंत्र नहीं

फॉन डेय लाएन की परमाणु ऊर्जा पर लौटने की अपील पर बर्लिन में मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है.

साल 1961 से, जर्मनी के कुल 37 परमाणु रिएक्टरों ने देश की 30 फीसदी तक बिजली की जरूरत को पूरा किया. हालांकि, 11 मार्च, 2011 को जापान के फुकुशिमा में हुई आपदा के बाद, जर्मनी ने 15 साल पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को धीरे-धीरे बंद करने का काम शुरू कर दिया. साल 2023 में जर्मनी के आखिरी परमाणु ऊर्जा संयंत्र को भी बंद कर दिया गया. स्पेन और ऑस्ट्रिया ने भी एलान कर दिया है कि उन्होंने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को हमेशा के लिए बंद कर दिया है.

तब से जर्मनी में इस बात पर बार-बार बहस होती रही है कि क्या परमाणु ऊर्जा की ओर लौटना समझदारी होगी. इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं: पहला, सौर और पवन ऊर्जा जैसे अक्षय स्रोतों से बिजली का उत्पादन मौसम के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है. दूसरा, यूक्रेन युद्ध या अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध और उसके बाद मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने जैसे अंतरराष्ट्रीय संकटों के कारण तेल और गैस के आयात में भारी कमी आई है.

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उसी सीडीयू पार्टी के सदस्य और जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स का कहना है कि पिछली केंद्र सरकारों ने परमाणु ऊर्जा को चरणबद्ध तरीके से बंद करने का फैसला लिया था और अब उस फैसले को पलटना संभव नहीं है. उन्होंने कहा, "मुझे इसका अफसोस है, लेकिन हकीकत यही है. अब हम उस ऊर्जा नीति पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो मौजूदा समय में हमारे पास है.”

हालांकि, मैर्त्स की पार्टी सीडीयू और उसकी सहयोगी बवेरियन पार्टी सीएसयू परमाणु ऊर्जा का समर्थन करती है, लेकिन मैर्त्स जानते हैं कि पुराने फैसले को पलटने के लिए जर्मनी की संसद के निचले सदन बुंडेस्टाग में बहुमत की जरूरत होगी. इस बहुमत के लिए उन्हें धुर दक्षिणपंथी पार्टी ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' (एएफडी) के वोटों की जरूरत पड़ेगी. मैर्त्स पहले ही साफ कह चुके हैं कि वे एएफडी के साथ मिलकर काम नहीं करेंगे.

एसपीडी ने नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र को खारिज किया

रूढ़िवादी पार्टी सीडीयू के गठबंधन सहयोगी, सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेट्स (एसपीडी) ने परमाणु ऊर्जा की ओर लौटने के फॉन डेय लाएन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है. एसपीडी पार्टी के नेता और जर्मनी के पर्यावरण मंत्री कार्स्टेन श्नाइडर ने कहा कि परमाणु ऊर्जा की वजह से करदाताओं को पहले ही अरबों रुपयों का नुकसान हो चुका है.

उन्होंने कहा, "अगर कोई जोखिम भरी तकनीक 75 साल बाद भी सरकारी मदद पर टिकी है और उससे कहीं बेहतर विकल्प काफी समय से मौजूद हैं, तो अब इस बारे में ठोस निष्कर्ष निकाले जाने चाहिए.”

विरोध-प्रदर्शनों के बीच जर्मनी में लाया गया परमाणु कचरा

श्नाइडर ने मोबाइल रिएक्टरों (जिन्हें एसएमआर कहा जाता है) पर विचार करने के सुझाव को भी ठुकरा दिया. उन्होंने कहा, "इन छोटे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर दशकों से काम चल रहा है, लेकिन अभी तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है. आज भी इन्हें चलाने के लिए सरकारी मदद (सब्सिडी) जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.”

जर्मनी की सबसे बड़ी बिजली कंपनी ‘आरडब्ल्यूई' के सीईओ मार्कुस क्रेबर ने हाल ही में छोटे रिएक्टरों के विचार को खारिज कर दिया. क्रेबर ने न्यूज पोर्टल ‘पॉलिटिको' से कहा, "मौजूदा स्थिति को देखते हुए, किसी निजी कंपनी के लिए एसएमआर में निवेश करना मुमकिन नहीं है.” उन्होंने कहा कि दुनिया भर में ऐसा कोई सप्लायर नहीं है जो तय समय और तय कीमत पर इनके निर्माण की गारंटी दे सके. क्रेबर के मुताबिक, कंपनियां इन छोटे रिएक्टरों के लिए फंडिंग नहीं देंगी.

ईयू के कई देश परमाणु ऊर्जा का कर रहे समर्थन

यूरोपीय संघ के कई देश अब परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं. फ्रांस में पहले से ही 57 रिएक्टर काम कर रहे हैं. इसके अलावा, उसने 15 यूरोपीय देशों का एक समूह बनाया है जो नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने की वकालत कर रहे हैं. इस समूह में स्वीडन और इटली जैसे देश भी शामिल हैं.

जर्मनी में परमाणु कचरे को कम खतरनाक बनाने की नई तकनीक

साल 1986 की चेर्नोबिल आपदा ने जर्मनी के लोगों को परमाणु ऊर्जा के बारे में दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया. ग्रीन्स पार्टी, जिसकी स्थापना 1980 में पश्चिमी जर्मनी में हुई थी, ने परमाणु ऊर्जा के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाया. जब वह सोशल डेमोक्रेट्स (एसपीडी) के साथ सरकार में शामिल हुई, तो उसने साल 2000 में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को धीरे-धीरे बंद करने के फैसले को सफलतापूर्वक लागू करवाया.

जब रूढ़िवादी पार्टी ‘सीडीयू' और उदारवादी ‘फ्री डेमोक्रेट्स' (एफडीपी) की गठबंधन सरकार सत्ता में वापस आई, तो उन्होंने पिछले फैसले को पलट दिया. साल 2010 में, इस नई सरकार ने जर्मनी के परमाणु रिएक्टरों की संचालन अवधि को बढ़ाने का फैसला किया, यानी उन्हें तय समय से ज्यादा समय तक चलाने की अनुमति दे दी.

लेकिन हालात फिर से बदल गए. साल 2011 में भूकंप और सुनामी के बाद जापान के फुकुशिमा परमाणु प्लांट में भीषण तबाही (सुपर मेल्टडाउन) हुई. इस हादसे को देखते हुए तत्कालीन चांसलर अंगेला मैर्केल ने खुद परमाणु ऊर्जा को बंद करने के पुराने फैसले को फिर से लागू करवाया. उनका वह फैसला आज भी कायम है.

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