क्यों बड़ी बात है चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग
भारत ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारकर बड़ी जीत हासिल की है.
भारत ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारकर बड़ी जीत हासिल की है. जानिए, क्यों खास है चांद का दक्षिणी ध्रुव.भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के वैज्ञानिकों ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयानको उतारकर अंतरराष्ट्रीय विज्ञान जगत में तो ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की ही है, दक्षिणी ध्रुव पर जाने को लेकर उत्सुक पूरी दुनिया की एजेंसियों को भी पछाड़ दिया है. यह एक बेहद बड़ी कामयाबी है क्योंकि इसके जरिये चांद के सबसे कीमती संसाधनों तक पहुंचा जा सकता है.
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर ऐसा क्या है जिसे लेकर पूरी दुनिया के अंतरिक्ष वैज्ञानिक होड़ में हैं? सबसे बड़ी बात है वहां पानी की मौजूदगी की संभावना. उस पानी के लिए यूरोप, रूस और अमरिका की अंतरिक्ष एजेंसियां ही नहीं बल्कि निजी कंपनियां भी चांद पर पहुंचना चाहती हैं क्योंकि वहां एक कॉलोनी बनाने की संभावना दिखती है और आने वाले समय में मंगल पर जाने के लिए भी वह एक अहम अड्डा बन सकता है.
कैसे मिला चांद पर पानी?
1960 के दशक में चांद पर अमेरिकी यान अपोलो के उतरने से पहले ही वैज्ञानिकों ने संभावना जाहिर कर दी थी कि चांद पर पानी हो सकता है. 1960 और 1970 के दशक में अपोलो अभियान के जरिये चांद से मिट्टी के कई नमूने लाये गये. लेकिन वे सब सूखे थे और उनमें पानी नहीं था.
2008 में ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने उन नमूनों का आधुनिक तकनीक से दोबारा विश्लेषण किया और उसमें हाइड्रोजन की मौजूदगी की पुष्टि की. यह हाइड्रोजन ज्वालामुखी की राख में मिली चमकदार शीशों के भीतर मिली थी. 2009 में नासा ने इसरो के चंद्रयान-1 के जरिये कुछ उपकरण चांद पर भेजे, जिनका मकसद उपग्रह की सतह पर पानी की मौजूदगी का पता लगाना था.
उसी साल नासा ने एक अन्य अभियान भेजा जो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा तो नहीं, लेकिन ऊपर से तस्वीरें ले लीं. उस अभियान ने चांद की सतह के नीचे बर्फ का पता लगाया. उससे पहले 1998 में नासा का लुनार प्रोस्पेक्टर भी चांद का चक्कर लगाते हुए दक्षिणी ध्रुव पर छाया में छिपे गड्ढों में बर्फ की जानकारी जुटा चुका था.
क्यों अहम है चांद का पानी?
चांद पर जमे हुए रूप में जो पानी मौजूद है वो बर्फ की प्राचीन सिल्लियों के रूप में है. वैज्ञानिकों की उन सिल्लियों में खासी दिलचस्पी है क्योंकि उनमें चांद के ज्वालामुखियों के बारे में बेशकीमती जानकारी हो सकती है. उनमें वे पदार्थ हो सकते हैं जो उल्कापिंडों के जरिये पृथ्वी पर आये. और उस जानकारी में महासागरों के जन्म की कहानी भी छिपी हो सकती है.
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अगर पानी की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में है तो उसका इस्तेमाल पीने के लिए किया जा सकता है और उससे चांद पर शोध के लिए ले जाये गये उपकरण भी ठंडे किये जा सकते हैं. उस पानी से हाइड्रोजन अलग करके उसे ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है जो मंगल ग्रह पर जाने वाले यानों के काम आ सकता है.
1967 में संयुक्त राष्ट्र की एक संधि हुई थी जिसे यूएन बाह्य अंतरिक्ष संधि कहा जाता है. उस संधि के तहत कोई भी देश चांद की मिल्कियत का दावा नहीं कर सकता. लेकिन उस संधि में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो व्यवसायिक गतिविधियों को रोक सके.
इसके अलावा अमेरिका की कोशिशों पर 27 देशों ने भी एक समझौता किया है जिसके जरिये चांद पर शोध और उसके संसाधनों के इस्तेमाल के लिए नियम बनाये गये हैं. हालांकि चीन और रूस ने उस संधि पर दस्तखत नहीं किये हैं.
दक्षिणी ध्रुव में ऐसा क्या खास है?
दक्षिणी ध्रुव पर उतरना बेहद पेचीदा है क्योंकि वहां की सतह विशाल गड्ढों और खाइयों से भरी हुई है. इस वजह से वहां यान का उतरना बेहद कठिन और चुनौतीभरा है.
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान को उतारने में सफल रहने वाला भारत पहला देश है. इससे पहले बहुत से अभियान विफल रहे हैं. हाल ही में रूस ने अपने लुना-25 यान इसी मकसद से भेजा था लेकिन वह विफल हो गया था. अमेरिका का अपोलो अभियान भी ऐसा करने में विफल रहा था. 2019 में भारत का चंद्रयान भी वहां उतरने में विफल रहा था.
अब भी चीन और अमेरिका दक्षिणी ध्रुव पर अपने-अपने यान उतारने की कोशिशों में हैं. लेकिन भारत ने इस मामले में सबको पछाड़ दिया है.
वीके/सीके (रॉयटर्स, एएफपी)
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 24, 2023 11:20 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

