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क्या स्वस्थ रहने के लिए 8 घंटे सोना सच में जरूरी है?

अक्सर हम बड़े लोगों के बारे में सुनते हैं कि वे बहुत कम सोते हैं.

क्या स्वस्थ रहने के लिए 8 घंटे सोना सच में जरूरी है?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

अक्सर हम बड़े लोगों के बारे में सुनते हैं कि वे बहुत कम सोते हैं. कुछ तो रात में सिर्फ तीन घंटे की नींद ही लेते हैं. अगर वे स्वाभाविक रूप से कम नींद वालों में नहीं हैं, तो भविष्य में उन्हें दिक्कत हो सकती है.मुझे नींद नहीं आने की समस्या हमेशा से रही है, शायद सालों-साल से. कभी-कभी यह सिर्फ एक अहसास होता है, तो कभी यह वाकई सच होता है. यह बात मुझे पता है, क्योंकि मेरी घड़ी मुझे यही बताती है. लेकिन देखा जाए तो मेरी यह घड़ी भी इस समस्या की एक बड़ी वजह हो सकती है. यह मुझे लगातार समय पर सोने की याद दिलाती रहती है और हर सुबह खराब ‘स्लीप स्कोर' दिखाकर परेशान करती है. इससे मेरी घबराहट बहुत बढ़ जाती है, दिल की धड़कन तेज हो जाती है और लगता है कि अब नींद नहीं आएगी. अजीब बात यह है कि अगले दिन मैं एकदम ठीक और तरोताजा महसूस करती हूं.

लिस्बन यूनिवर्सिटी की स्लीप रिसर्चर काचा हेईस ने बातचीत के दौरान कहा, "जब आपकी नींद पूरी नहीं होती, तो आपकी सोचने-समझने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है.” उन्होंने कहा कि इससे मेरी परेशानी की वजह समझ में आ सकती है. भले ही मैं हफ्ते के दिनों में ठीक महसूस करूं, लेकिन वीकेंड पर मैं जरूरत से ज्यादा सोती हूं, जो ‘स्लीप डेट' यानी नींद की कमी का संकेत है.

नींद में अहम भूमिका निभाता है हमारा दिमाग

हेईस ने नींद से जुड़ी कई स्थितियों पर शोध किया है, जिसमें एथलीटों पर जेट लैग और नींद की कमी का असर भी शामिल है.

एक शोध में स्लीप एप्निया (एक ऐसी बीमारी जिसमें रात में सोते समय बार-बार सांस रुकने लगती है) के मरीजों और शिफ्ट में काम करने वाले लोगों की नींद और सुस्ती के स्तर की तुलना की गई. शिफ्ट में काम करने वाले लोग अक्सर अपनी ‘सर्केडियन रिदम' (जैविक घड़ी) के खिलाफ काम करते हैं. यह हमारे शरीर की अंदरूनी घड़ी होती है जो हमें बताती है कि हमेंकब जागना है और कब सोना है.

उन्होंने प्रतिभागियों की खुद महसूस की गई सुस्ती (आत्म-मूल्यांकन) और क्लिनिकल (डॉक्टरी) जांच के नतीजों की तुलना की. इसमें उन्होंने पाया कि लोग जैसे-जैसे ज्यादा सुस्ती या नींद के माहौल के संपर्क में आते हैं, अपनी खुद की सुस्ती का सही अंदाजा लगाने की उनकी क्षमता में उतना ही अंतर आने लगता है.

सरल शब्दों में कहें, तो दिमाग काम करना बंद कर देता है. यह चिंता की बात होनी भी चाहिए, क्योंकि नींद में दिमाग की अहम भूमिका होती है.

हर रात लगभग 7.5 से 8.5 घंटे की नींद की जरूरत

जब हम सोते हैं, तो हमारा शरीर मरम्मत और रिकवरी के कई काम करता है. यह भोजन या वातावरण के जरिए शरीर में गए जहरीले तत्वों को बाहर निकालता है, नई ऊर्जा बनाता है, और यह हमारी पढ़ाई, सीखने और याददाश्त के लिए भी बहुत जरूरी है.

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को में नींद पर शोध करने वाली यिंग-हुई फू कहती हैं, "नींद में दिमाग के कई हिस्से शामिल होते हैं. न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका तंत्र संबंधी) और साइकियाट्रिक (मानसिक) बीमारियों सहित दिमाग की लगभग हर बीमारी का सीधा संबंध नींद की समस्याओं से हो सकता है.”

औसतन, लोगों को हर रात लगभग 7.5 से 8.5 घंटे की नींद की जरूरत होती है. लेकिन अक्सर हम मुश्किल कामों में लगे लोगों, खासकर नेताओं को यह कहते हुए सुनते हैं कि वे बहुत कम घंटे सोते हैं, जैसे कि वे हमेशा लोगों के लिए काम कर रहे हों.

हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने भी यह बात दोहराई थी कि पद संभालने के बाद, वे हर रात केवल 0 से 3 घंटे ही सो पाती हैं. पूर्व हेवी मेटल ड्रमर होने के नाते आप जापानी पीएम से एक खास तरह की सहनशक्ति की उम्मीद कर सकते हैं. हालांकि अगर वह जानबूझकर या आदत के कारण लगातार कम सोती हैं, तो यह भले ही उनकी मेहनत और काम के प्रति समर्पण को दिखाए, लेकिन लंबे समय में यह उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है.

सबसे बुरी स्थिति में, लंबे समय तक नींद की कमी से आपके शरीर में टॉक्सिन्स जमा हो सकते हैं, जिससे दिल या दिमाग की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है. सबसे खराब हालात में, यह जानलेवा भी हो सकता है.

फू ने डीडब्ल्यू को बताया, "हमारी सेहत के लिए नींद से ज्यादा जरूरी सिर्फ दो चीजें हैं. एक है हवा. अगर हमें हवा ना मिले, तो हम कुछ ही मिनटों में मर जाएंगे. दूसरी चीज है पानी. अगर हमें पानी ना मिले, तो हम कुछ ही दिनों में मर जाएंगे. अगर आप खाना ना खाएं, तो आप कुछ महीने जिंदा रह सकते हैं. लेकिन अगर आप सोएं नहीं, तो शायद आप सिर्फ कुछ हफ्ते ही जिंदा रह पाएंगे.”

यह बात सभी जानवरों पर लागू होती है. उन्होंने कहा, "अगर हम सोएं नहीं, तो हम मर जाएंगे.”

अपवाद: नैचुरल शॉर्ट स्लीपर्स (जो स्वाभाविक रूप से कम सोते हैं)

नैचुरल शॉर्ट स्लीपर्स इस नियम के अपवाद हैं. वे रात में छह घंटे से भी कम सो सकते हैं और ना केवल अच्छा महसूस करते हैं, बल्कि असल में स्वस्थ, खुश और ऊर्जावान भी रहते हैं. ऐसा लगता है कि उनमें कुछ जेनेटिक वेरिएशन होते हैं, जो उन्हें बेहतर ढंग से जीने में मदद करते हैं. फू ने एक 80 साल के नैचुरल शॉर्ट स्लीपर का उदाहरण दिया, जिन्होंने ट्रायथलॉन में हिस्सा लिया था.

फू और उनकी लैब ने 2009 में डीईसी2 जीन में इस तरह का पहला वेरिएशन ढूंढा और अपने शोध नतीजे प्रकाशित किए. दस साल बाद, उन्होंने एक और पेपर प्रकाशित किया, जिससे पता चला कि एडीआरबी1 जीन भी ‘नैचुरल शॉर्ट स्लीपर सिंड्रोम' से जुड़ा हुआ है. इसके बाद, एनपीएसआर1, जीआरएम1, और एसआईके3 जीन्स को लेकर भी नई जानकारियां सामने आईं और कई अन्य जीन्स पर भी शोध कार्य चल रहा है.

हम इन्हें ‘म्यूटेशन' (बदलाव) के बजाय जीन ‘वेरिएशन' (अलग-अलग रूप) कह रहे हैं, क्योंकि म्यूटेशन का संबंध अक्सर सेहत पर बुरे असर से होता है. लेकिन ऐसा लगता है कि ‘नैचुरल शॉर्ट स्लीप' (स्वाभाविक तौर पर कम सोना) से सेहत को वे दिक्कतें नहीं होतीं जिनका सामना उन लोगों को करना पड़ता है जो आदतन कम सोते हैं या जिन्हें नींद पूरी नहीं मिलती.

इन जीन से पता चलता है कि नींद शरीर के कई अलग-अलग कामों को प्रभावित करती है:

डीईसी2: सोने और जागने के समय को कंट्रोल करने में मदद करता है.

एडीआरबी1: दिल और नसों के सिग्नल भेजने में मदद करता है.

एनपीएसआर1: उत्तेजना और बेचैनी को कंट्रोल करने में मदद करता है.

जीआरएम1: दिमाग के काम में शामिल है. यह डिप्रेशन से जुड़ा हो सकता है.

एसआईके3: सेल साइकिल, मेटाबॉलिज्म और सूजन को कंट्रोल करने में भूमिका निभाता है.

इनमें से हर एक को खोजने और उन्हें टेस्ट करने में, कई वर्षों की मेहनत और बुनियादी शोध लगे हैं. फू ने कहा, "हम में से हर किसी के जीनोम में 500 से 1,000 खास तरह के म्यूटेशन होते हैं. ऐसे में यह पता लगाना कि असल में किस म्यूटेशन की वजह से ऐसा हो रहा है, बहुत मुश्किल काम है.”

अच्छी नींद का फायदा

स्वाभाविक रूप से कम सोने वाले जिन लोगों के बारे में अभी जानकारी है, उनकी संख्या बहुत कम है. लेकिन फू का कहना है कि यह क्षमता जितने लोगों में अभी रिसर्च के जरिए सामने आई है, असल में उससे कहीं ज्यादा आम हो सकती है.

फू की ज्यादातर खोजें उन चुनिंदा परिवारों तक ही सीमित हैं जिनमें एक जैसा जीन वेरिएशन (जेनेटिक बदलाव) पाया गया है. इसका एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण है: अगर किसी परिवार के तीन सदस्यों में एक जैसा वेरिएशन हो और वे सभी सिर्फ चार से छह घंटे की नींद लेकर भी पूरी तरह स्वस्थ दिखते हैं, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वही जेनेटिक बदलाव इसके लिए जिम्मेदार है. खासकर तब, जब वह जीन पहले से ही अच्छी नींद के लिए जरूरी माना जाता हो. लेकिन अभी यह शोध शुरुआती चरण में ही है.

फू ने कहा, "हम बस इतना जानते हैं कि वे बेहतर काम करते हैं और ज्यादा स्वस्थ रहते हैं. मेरे लिए सबसे तार्किक बात यही है कि उनकी नींद का सिस्टम बेहतर है, यानी वे अच्छी नींद ले पाते हैं."

हेईस भी इस क्षेत्र में हो रहे शोध को लेकर संभलकर बात करती हैं. उनका कहना है कि स्वाभाविक रूप से कम सोने वाले लोगों पर अभी बहुत कम अध्ययन हुए हैं.

उन्होंने कहा, "जब हम आदतन कम सोने वाले लोगों का क्लिनिकल टेस्ट करते हैं और उनकी नींद का समय बढ़ाते हैं, तो हमें दिखता है कि उनकी सेहत और परफॉर्मेंस में सुधार हुआ है. लेकिन दिक्कत यह है कि स्वाभाविक तौर पर कम सोने वालों पर हमारे पास लंबे समय तक किए जाने वाले अध्ययन की कमी है.”

फू भी इस बात से सहमत हैं. लेकिन उन्होंने कहा कि इस शोध के लिए पैसे जुटाना एक चुनौती रही है. फू ने कहा, "मेरा लक्ष्य हर किसी को अच्छी नींद लेने में मदद करना है, क्योंकि अगर हम सभी को अच्छी नींद लेने में मदद कर सकें, तो बीमारियों में कमी आएगी. बीमारियों के होने की दर में भारी कमी आएगी. क्या आप सोच सकते हैं कि इसका मानवता पर क्या असर होगा?”

(The above story first appeared on LatestLY on Aug 07, 2026 07:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).