International Day for the Eradication of Poverty 2025: आर्थिक नीतियों में बदलाव! क्या गरीबों को लाभ मिल रहा है? जानें क्या है सच्चाई!
साल 1980 के दशक में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने कहा था, कि ‘कल्याण और गरीबी उन्मूलन हेतु लक्षित प्रत्येक रुपये का केवल 15 पैसे इच्छित लाभार्थी तक पहुंचता है.
साल 1980 के दशक में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने कहा था, कि ‘कल्याण और गरीबी उन्मूलन हेतु लक्षित प्रत्येक रुपये का केवल 15 पैसे इच्छित लाभार्थी तक पहुंचता है.’ कहने का आशय यह कि विभिन्न देशों की सरकारें आर्थिक नीतियों (मौद्रिक, वित्तीय, सामाजिक सुरक्षा, कर व सब्सिडी आदि) को इस तरह तैयार करती है कि वे सबसे निचले तबकों तक राहत पहुंचा सकें, लेकिन क्या ये नीतियां वास्तव में गरीबों की जिंदगी बदल रही हैं? अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस (17 अक्टूबर 2025) के अवसर पर आइये जानते हैं कुछ ठोस आंकड़ों और उदाहरणों के माध्यम से असलियत क्या है.
आर्थिक नीतियों में प्रमुख बदलाव
सामाजिक सुरक्षा कवरेज और कैश ट्रांसफर (मनी ट्रांसफर) योजनाएः कई देशों में गरीबी उन्मूलन के लिए नए या सुधारे गए सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम लागू किए गए हैं. मसलन बेरोजगारी बीमा, वृद्धावस्था पेंशन, महिला सशक्तिकरण योजनाएं, और अनाज-राशन वितरण (PDS) आदि. भारत में उदाहरणार्थ प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में सुधार ने भ्रष्टाचार और लीकेज कम करने में योगदान दिया है. यह भी पढ़ें : Dhanteras Date 2025: धनतेरस कब है 18 या 19 अक्टूबर को? जानें इसका महत्व, मूल-तिथि, विभिन्न शहरों में धनतेरस पूजा के मुहूर्त एवं पूजा-विधि के बारे में?
रोजगार सुरक्षा और कार्यक्रमों का विस्तारः भारत में मनरेगा MGNREGA जैसी योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों में काम और आय की गारंटी देने की कोशिश की है, जिससे ग्रामीण गरीबी में कमी का अनुभव हुआ है.
वित्तीय समावेशन (Financial inclusion) बैंकिंग सेवाओं को आसान बनाना, आधार-आधारित पहचान, जन धन खाते आदि ने गरीबों को बैंकिंग-सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, जिससे बचत, ऋण, माइक्रोफाइनेंस आदि तक पहुंच बनी है. ये नीतियाँ उन्हें आर्थिक झटकों से निपटने में सक्षम बनाती हैं.
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लैवल पर गरीबी की नई परिभाषाएँ और अनुमान
वैश्विक गरीबी रेखा जैसे आज लोगों की संख्या को $1.90 या $2.15 प्रतिदिन की दरों से मापा जा रहा है, लेकिन इन दरों में परिवर्तन, क्रय शक्ति समायोजन, सर्वेक्षण पद्धतियों में बदलाव आदि से आंकड़ों में बड़ा काफी पड़ता है.
चुनौतियां और सीमाएं
महंगाई और जीवन लागत में वृद्धि: गरीब वर्ग अक्सर महंगे राशन, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं का लाभ नहीं उठा पाते क्योंकि कीमतें बढ़ रही हैं.
असमान लाभ वितरण: आज भी कई योजनाएं पहुंच‑बांट और टारगेटिंग की चुनौतियों से जूझ रही हैं. कुछ अमीर या मध्यवर्गीय क्षेत्र बेहतर लाभ उठाते हैं, जबकि दूर‑दराज के या पिछड़े क्षेत्रों की स्थिति अभी भी खराब है.
आर्थिक झटके और अस्थिरताएंः महामारी, युद्ध, जलवायु परिवर्तन आदि ऐसे झटके हैं, जो गरीबी उन्मूलन की प्रगति को पीछे धकेल सकते हैं.
डेटा की विश्वसनीयता: गरीबी रेखा, आय‑खर्च सर्वेक्षण, उपभोग पैटर्न आदि में बदलाव से आंकड़े मिलते-जुलते नहीं हैं, इसलिए तुलना कर पाना मुश्किल होता है.
यह सच है कि सरकार की कई आर्थिक नीतियों ने गरीबों को लाभ पहुंचाया है या पहुंचा रही हैं, विशेषकर उन नीतियों ने जो सही टारगेटिंग, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार सुनिश्चित करने वाले कार्यक्रम और वित्तीय समावेशन पर ध्यान देते हैं. भारत में बीते एक दशक में अत्यधिक गरीब की दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, जो उपयुक्त नीतियों की सफलता का संकेत हैं. लेकिन लाभ का मतलब सिर्फ गरीबी रेखा से ऊपर आना नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता, स्थिर आय, स्वास्थ्य-शिक्षा-आवास की स्थिति, अवसरों की समानता आदि भी मायने रखती है.
(The above story first appeared on LatestLY on Oct 14, 2025 02:38 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

