अरुणाचल में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम पर क्यों बढ़ रहा है विवाद
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में फ्रीडम आफ रिलीजन एक्ट यानी धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम लागू करने के लिए गठित उच्चाधिकार समिति ने सरकार को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी है.
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में फ्रीडम आफ रिलीजन एक्ट यानी धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम लागू करने के लिए गठित उच्चाधिकार समिति ने सरकार को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी है. इसके बाद इस पर नए सिरे से विवाद तेज हो रहा है.एनडीए की घटक पीपुल्स पार्टी आफ अरुणाचल (पीपीए) के अलावा राज्य का ताकतवर ईसाई संगठन अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (एसीएफ) भी इसे लागू करने का विरोध कर रहे हैं. उसकी दलील है कि इस कानून का मकसद उनको निशाना बनाना है. एसीएफ ने इस कानून के नियमों का मसविदा तय होने के विरोध में गुरूवार को राजधानी में एक रैली आयोजित करने के साथ ही पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन भी किया.
हालांकि मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भरोसा दिया है कि तमाम संबंधित पक्षों से बातचीत के बाद ही इसे लागू किया जाएगा. लेकिन इस मुद्दे पर विरोध और विवाद बढ़ता ही जा रहा है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश में वर्ष 1971 में क्रिश्चियन आबादी महज एक फीसदी थी जो अब बढ़ कर 30 फीसदी से ज्यादा पहुंच गई है. इसके उलट स्थानीय धार्मिक परंपराओं और बौद्ध धर्म को मानने वालों की तादाद इस दौरान 63 और 13 फीसदी से घट कर क्रमशः 26 और 12 फीसदी रह गई है. वर्ष 1971 के बाद राज्य में हिंदुओं की आबादी 22 से बढ़ कर 2011 में 29.03 फीसदी पहुंच गई थी.
क्या है यह कानून?
अरुणाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम को विधानसभा ने वर्ष 1978 में पारित किया था. ईसाई संगठनों की नाराजगी और विरोध के कारण यह अधिनियम दशकों तक फाइल में दबा रहा. किसी भी सरकार ने इसे लागू करने के लिए नियम तय करने में दिलचस्पी नहीं ली थी.
वर्ष 2022 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट के निर्देश पर सरकार ने जनवरी, 2025 में इसेलागू करने का फैसला कियाथा. लेकिन उस समय ईसाई संगठनों के भारी विरोध के कारण इसके नियम तय करने के लिए सरकार ने सेवानिवृत्त जज ब्रजेंद्र कुमार काटकी के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया था. अब उस समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट के साथ नियमों का मसौदा बीते सप्ताह राज्य सरकार को सौंपा है.
इस कानून के तहत जबरन, दोखाधड़ी से या किसी प्रलोभन से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने का प्रावधान है. ऐसे किसी धर्म परिवर्तन से पहले औपचारिक तौर पर जिले के उपायुक्त को इसकी सूचना देनी होगी. ऐसा नहीं करने वालों को एक साल तक की जेल या एक हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है.
विरोध और विवाद
एनडीए की घटक पीपुल्स पार्टी आफ अरुणाचल (पीपीए) ने इस कानून के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है. उसने राज्य सरकार से इस कानून पर बहस के लिए विधानसभा का एक विशेष अधिवेशन बुलाने की भी मांग उठाई है.
पार्टी के अध्यक्ष नबम विवेक डीडब्ल्यू से कहते हैं, "यह अधिनियम करीब पांच दशक पहले पारित हुआ था. लेकिन मौजूदा दौर में यह अपनी प्रासंगिकता खो चुका है. इस कानून के जरिए स्थानीय आदिवासियों की पहचान बचाना या किसी को अपना धर्म चुनने से रोकना संभव नहीं है. इससे परिवार और समाज में संघर्ष बढ़ने का अंदेशा है."
ईसाइयों के ताकतवर संगठन अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (एसीएफ) ने धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम से संबंधित नियमों को अधिसूचित करने की प्रक्रिया तत्काल स्थगित करने की मांग की है. मुख्यमंत्री पेमा खांडू को सौंपे गए एक अधिनियम में संगठन ने कहा है कि इस कानून को लागू करने के नतीजे बेहद गंभीर होंगे और इससे लोगों के संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, राज्य के लोगों में आपसी सामाजिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के खतरे में पड़ने की आशंका है.
संगठन का कहना है कि उच्चाधिकार समिति ने नियम तय करने से पहले संबंधित पक्षों के साथ ज्यादा विचार-विमर्श नहीं किया है. सरकार को जल्दबाजी में कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए.
एसीएफ ने सरकार को इस कानून को लागू करने से रोकने का फैसला करने के लिए 15 दिनों का अल्टीमेटम दिया है.
एसीएफ के महासचिव योमरिक लोम्बी डीडब्ल्यू से कहते हैं, "अगर सरकार इस कानून को लागू करने की राह पर आगे बढ़ी तो राज्य में बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया जाएगा. इसमें सामूहिक विरोध रैली के आयोजन के अलावा बंद का भी सहारा लिया जाएगा." संगठन के ज्ञापन की प्रतियां राज्यपाल और मुख्य सचिव को भी भेजी गई हैं.
इस बीच ह्यूमन राइट्स आफ अरुणाचल (एचआरए) ने भी बीजेपी और राज्य सरकार से उच्चाधिकार समिति की सिफारिशों को खारिज करने की मांग की है. संगठन की दलील है कि इससे सामाजिक सद्भाव और विभिन्न समुदायों के बीच आपसी भाईचारा खतरे में पड़ जाएगा.
सरकार की दलील
दूसरी ओर, इस कानून को लागू करने के सवाल पर बढ़ते विवाद के बीच मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा है कि राज्य सरकार संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श के बिना इस कानून के नियमों को अधिसूचित नहीं करेगी.
ईटानगर में एक कार्यक्रम के दौरान उनका कहना था, "इस कानून का मकसद किसी धर्म विशेष के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि राज्य के आदिवासियों की रक्षा करना है."
राज्य के लोकसभा सांसद तापिर गाओ भी इस कानून पर तेज होने वाले विवाद को निराधार बताते हैं. राजधानी ईटानगर में बीजेपी मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत में उनका कहना था, "धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम किसी धर्म के खिलाफ नहीं है. इसमें कहीं भी सिर्फ मूल निवासी समुदायों को सुरक्षा देने की बात नहीं कही गई है और ना ही इसमें ईसाइयों को निशाना बनाया गया है.”
उनकी दलील थी कि देश के 14 राज्यों में पहले से ही ऐसे कानून हैं और इसके नियमों के अधिसूचित होने के बाद अरुणाचल पंद्रहवां राज्य बन जाएगा.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस कानून के लागू होने के बाद सरकार सामान्य धर्मांतरण को भी जबरन बता कर कानूनी कार्रवाई कर सकती है. इस डर के कारण लोगों से अपना धर्म चुनने का संवैधानिक अधिकार छिन जाएगा.
ईसाई समुदाय की महिला अधिकार कार्यकर्ता लूनिया ताडू डीडब्ल्यू से कहती हैं, "राज्य में अब तक ऐसे किसी कानून की जरूरत नहीं पड़ी थी.तो अब आखिर ऐसी क्या स्थिति पैदा हो गई? लेकिन इसके तहत सामान्य धर्मांतरण को भी जबरन धर्म परिवर्तन का रंग देकर कार्रवाई की जा सकती है. इससे ईसाई समुदाय में आशंका बढ़ रही है."
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 18, 2026 07:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

