औरतों को अब तक जो आरक्षण मिला उससे क्या सीखा भारत ने
भारत की लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास हो गया है.
भारत की लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास हो गया है. नगरपालिकाओं और पंचायतों में महिला आरक्षण के अनुभव से संसद इस अधिनियम को कैसे बेहतर कर सकती है.सरकार ने 19 सितंबर 2023 को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में 128वां संशोधन विधेयक पेश किया और गुरुवार 21 सितंबर को इसे पारित भी कर दिया. महिलाओं के लिए कोटा बनाने के प्रयास 1990 के दशक के मध्य से चल रहे हैं. मार्च 2010 में, राज्यसभा ने संविधान संसोधन (108वां) विधेयक पारित किया, लेकिन तब यह कानून लोकसभा में पारित नहीं हो सका. भले ही मंगलवार को पेश किया गया विधेयक संसद के दोनों सदनों में तेजी से पारित हो जाए, लेकिन इसे लागू होने में कुछ समय लगेगा.
वर्तमान लोकसभा में 545 सदस्यों वाले सदन में 78 सांसद (लगभग 14 प्रतिशत) महिला सांसद हैं जो भारत में किसी भी समय से सबसे अधिक है. वैश्विक स्तर पर, संसद में महिलाओं का औसत लगभग 24 प्रतिशत है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, संसद में अधिक महिलाओं का मतलब लैंगिक समानता के लिए बेहतर विधायी विचार है. महिला सांसद अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में साथी महिलाओं का बेहतर प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं और महिलाओं के दृष्टिकोण को राजनीति में लाती हैं. हालांकि, संसद में महिलाओं की संख्या और लैंगिक समानता के बीच संबंध सरल नहीं है.
भारत में महिला आरक्षण की लड़ाई
1930 में पहली बार संसद में महिला आरक्षण की बात को उठाया गया. तब 'पितृसत्तात्मक अंतर' के तर्क पर पहली बार बात हुई. भारत में आजादी की लड़ाई के समय ही एक चलन को बढ़ावा दिया गया. इसमें महिलाओं पर पारंपरिक संस्कृति की जिम्मेदारी का बोझ डाल कर उपनिवेशवादियों के प्रभाव से बाहर एक पवित्र स्थान दिया गया. इसके जरिए सार्वजनिक (पुरुषात्मक) और निजी (स्त्रीलिंग) विभाजन को और मजबूत किया गया.
कांग्रेस ने किया महिला आरक्षण का समर्थन, मांगा कोटे के भीतर कोटा
ऐसी सोच को तोड़ने के लिए 1990 के मध्य में कांग्रेस सरकार की ओर से संकलित 'महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना' में सिफारिश की गई कि पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित की जाएं और राजनीतिक दल स्वेच्छा से अपने 33% टिकट महिला उम्मीदवारों को दें. विशेषज्ञों के अनुसार, इसको संसद में लाने से रोका गया क्योंकि संसद में आरक्षण सीधे तौर पर राष्ट्रीय निर्णय लेने में पुरुषों की जगह को खतरे में डालता और उन्हें व्यक्तिगत प्रभाव झेलना पड़ता.
पंचायत और नगर पालिका का अनुभव
2018 में जयपुर नगर निगम की महिला पार्षदों के अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं को पंचायत और नगरपालिका में कोटा मिलने के कई लाभ सामने आए हैं. कई स्वतंत्र विचारधारा वाली महिलाएं राजनीति में आई हैं और उन्होंने राजनीति को अपना करियर बनाया है. उन्होंने सामान्य रूप से समाज और विशेष रूप से नगर निगम नौकरशाही द्वारा रखे गए लैंगिक पूर्वाग्रहों में कुछ रचनात्मक संशोधनों को सक्षम किया है.
2024 के लिए महिला मतदाताओं पर विशेष ध्यान दे रही है बीजेपी
सांसद बृंदा करात का मानना है कि महिला आरक्षण विधेयक का श्रेय पंचायत और स्थानीय निकाय में चुन कर आई महिलाओं को मिलना चाहिए. इंडियन एक्सप्रेस अखबार के लिए एक लेख में उन्होंने लिखा है, "आज के इस अधिनियम की कामयाबी में पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण की पहली प्रवर्तक महिलाओं को श्रेय दिया जाना चाहिए. उन्होंने निर्णय लेने वाली संस्थाओं में व्याप्त पितृसत्तात्मक शक्ति की अवमानना, तिरस्कारपूर्ण रवैये और बाधाओं पर काबू पाया और राज्य दर राज्य यह साबित किया कि महिलाएं कोई प्रतिनिधि नहीं हैं. इन्हीं की वजह से इस विधेयक को जीवित रखा गया है.”
इसी तरह ही कोलकाता नगर निगम में किए गए अध्ययन में पाया गया कि महिला पार्षदों ने काम में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, और ज्यादातर महिला नेताओं को पुरस्कृत किया गया क्योंकि वह आरक्षण खत्म होने के बाद भी अपने वार्डों से फिर से निर्वाचित हुईं.
महिलाओं की स्थिति में मामूली सुधार
मगर कई अध्ययन कहते हैं कि अधिनियम को और मजबूत करने की जरूरत है. स्थानीय स्तर पर लैंगिक आरक्षण महिलाओं के लिए राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने का एक मंच बनने में विफल रहा है. राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर निर्वाचित महिलाओं की संख्या में बहुत मामूली सुधार हुआ है. दो दशकों से अधिक समय से आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के बावजूद, पार्टी पदानुक्रम में लैंगिक असमानताएं बनी हुई हैं, और महिलाओं को प्रमुख शासन पदों से दूर रखा जा रहा है.
बहुत सी सीटों पर पार्षदों की पत्नियां उन पतियों के स्थान पर आ गई, जिनका रास्ता आरक्षण के कारण बंद हो गया. इस में पति वार्डों पर नियंत्रण बनाए रखते हैं क्योंकि निर्वाचित पत्नियां अपने पतियों के लिए प्रॉक्सी के रूप में काम करती हैं.
एमआईटी के एक शोध में माना गया कि भले ही महिलाएं ग्रामीण स्तर पर काम में योगदान दे रही हों, फिर भी वे काफी हद तक "झिझक" में रहती हैं. रिसर्चरों ने इसके लिए "इस धारणा को जिम्मेदार ठहराया कि महिलाएं प्रभावी नेता नहीं हैं", जो "महिलाओं की सामाजिक धारणाओं से उत्पन्न होती है जिसे नीति सटीक रूप से संबोधित करने का प्रयास करती है."
लैंगिक समानता का रास्ता
सत्ता में मौजूद महिलाओं को बेहतर साक्षरता योजनाओं और उद्योगों में कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी की वकालत करने की जरूरत है. बेहतर शिक्षा महिलाओं को अपने फैसले बरकरार रखने और उन मुद्दों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए सशक्त बनाएगी जिन्हें वह उचित मानते हैं.
लाए गए अधिनियम से शुक्रगुजार होने के बजाए, राजनीतिक विवादों को भी समझने की जरूरत है. बीजेपी ने 2014 में देश की महिलाओं से एक चुनावी वादा किया था कि बीजेपी को वोट देने से कम से कम एक तिहाई महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा.
पार्टी ने अपने पहले कार्यकाल में इस वादे को लागू नहीं किया, जिसके कारण 17वीं लोकसभा के लिए सीटों का आरक्षण नहीं हुआ. इस सदन में केवल 14 प्रतिशत महिलाएं थीं. अपने दूसरे कार्यकाल में, 2019 के चुनाव घोषणा पत्र में भारतीय जनता पार्टी ने फिर यह वादा दोहराया मगर पिछले चार वर्षों में एक बार भी इस विधेयक को सूचीबद्ध नहीं किया गया. राजनीतिक विवादों के बीच अपने कार्यकाल के अंत में लाए गए इस विधेयक का लैंगिक समानता के तौर पर देखना मुश्किल है.
(The above story first appeared on LatestLY on Sep 21, 2023 03:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

