Mount Girnar Viral Video: गिरनार पर्वत पर इंसान को पालकी में ले जाने के वीडियो पर छिड़ी ऑनलाइन बहस; लोग दो गुटों में बंटे
गुजरात के जूनागढ़ स्थित गिरनार पर्वत की सीढ़ियों पर चार डोली चालकों द्वारा एक श्रद्धालु को पालकी (पालकी या डोली) में उठाकर ऊपर ले जाने के वीडियो ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है. इंटरनेट पर लोग मानवीय गरिमा, कड़ी मेहनत और स्थानीय आजीविका के मुद्दों पर दो धड़ों में बंट गए हैं.
जूनागढ़: गुजरात (Gujarat) के जूनागढ़ (Junagarh) जिले में स्थित पवित्र गिरनार पर्वत (Mount Girnar) का एक वीडियो सोशल मीडिया (Social Media) पर वायरल (Viral Video) होने के बाद पारंपरिक पालकी (डोली) सेवा को लेकर इंटरनेट पर एक नई बहस शुरू हो गई है.
वायरल वीडियो में चार डोली चालक एक श्रद्धालु को लकड़ी और कपड़े के ढांचे पर बिठाकर गिरनार पर्वत की तीखी सीढ़ियों पर ले जाते दिख रहे हैं. लगभग 10,000 सीढ़ियों वाले इस कठिन मार्ग पर डोली सेवा के उपयोग को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स मानवीय गरिमा, श्रम मानकों और स्थानीय रोजगार के सवालों पर आमने-सामने आ गए हैं. यह भी पढ़ें: Karnataka Accident: डांडेली रिजॉर्ट में झिपलाइन राइड के दौरान हादसा; 40 फीट ऊंचाई से गिरा पर्यटक, गंभीर हालत में इलाज जारी (Video)
विरोध करने वालों का तर्क: 'आधुनिक युग में अमानवीय'
सोशल मीडिया पर इस वीडियो की आलोचना कर रहे लोगों का कहना है कि एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य को इस तरह कंधों पर उठाकर हजारों सीढ़ियां चढ़ना शारीरिक रूप से अत्यंत कष्टदायक है और यह प्रथा आधुनिक युग में अनुचित प्रतीत होती है.
कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य इतनी कठिन चढ़ाई की इजाजत नहीं देता, तो उसे इस तरह पालकी सेवा का उपयोग करने के बजाय नीचे से ही प्रार्थना करनी चाहिए या केवल चिकित्सीय आपात स्थिति में ही इसकी अनुमति होनी चाहिए. आलोचकों ने सरकार से ऐसे कठिन शारीरिक श्रम को रोकने के लिए ठोस नियम बनाने या वैकल्पिक व्यवस्था को बढ़ावा देने की मांग की है.
समर्थकों का पक्ष: 'आजीविका और बुजुर्गों की पहुंच का साधन'
दूसरी ओर, इस पारंपरिक व्यवस्था का बचाव करने वाले लोगों का तर्क है कि यह सेवा दशकों से स्थानीय परिवारों की आजीविका का एक मुख्य और वैध स्रोत रही है.
समर्थकों के अनुसार, जो बुजुर्ग, बीमार या शारीरिक रूप से अक्षम श्रद्धालु पैदल 10,000 सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते, उनके लिए यह सेवा पवित्र स्थल के दर्शन करने का एकमात्र जरिया है। इसके अलावा, डोली वाहकों को उनके काम का उचित किराया दिया जाता है, जिससे उनके परिवारों का पालन-पोषण होता है.
'दूसरों का शोषण करने से बेहतर है घर पर रहना'
गिरनार में पालकी उठाने वाले अपनी मर्ज़ी से काम करते हैं
भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों का आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र
भारत के कई प्रमुख और कठिन चढ़ाई वाले तीर्थ स्थलों जैसे वैष्णो देवी, अमरनाथ और सम्मेद शिखरजी में डोली (पालकी) और खच्चर सेवाएं एक स्थापित स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं.
हालांकि, गुजरात के गिरनार पर्वत पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पहले ही 'रोपवे' (Ropeway) का निर्माण किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद सीमित क्षमता और दूरस्थ मंदिरों तक पहुंचने के लिए पारंपरिक डोली चालक अब भी कार्यरत हैं। वायरल वीडियो के बाद अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि ऐसे स्थानों पर स्थानीय मजदूरों के लिए सुरक्षा, स्वास्थ्य मानकों और उचित दरों का नियमन सुनिश्चित किया जाए.