TMC Crisis: ममता बनर्जी को बड़ा झटका, 20 लोकसभा सांसदों ने NDA को समर्थन देने का किया ऐलान, टूट सकती है पार्टी
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को एक बड़ा झटका लगा है, क्योंकि पार्टी के लगभग 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को अपना समर्थन देने की घोषणा की है। यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती पेश करता है।
TMC Crisis: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सोमवार को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. पार्टी के लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को अपना समर्थन देने की घोषणा की है. यह चौंकाने वाला घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी दिल्ली में 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की एक महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा ले रही थीं. इस बगावत को तृणमूल कांग्रेस के लिए अब तक का सबसे गंभीर आंतरिक संकट माना जा रहा है.
TMC में बगावत-अलग गुट की तैयारी
तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि पार्टी के लगभग 20 सांसदों ने एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है और इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष को आधिकारिक तौर पर सूचित कर दिया है. यह भी पढ़े: I-PAC Raid Row: ममता बनर्जी के खिलाफ ED की याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, जानें पूरा मामला
सूत्रों के अनुसार, इन बागी सांसदों ने संसद में एक अलग गुट बनाने की इच्छा व्यक्त की है. कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में यह गुट खुद को 'असली टीएमसी' के रूप में मान्यता देने की मांग भी कर सकता है. इस अप्रत्याशित कदम ने पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है.
दिल्ली में बैठकों का दौर-सुखेंदु शेखर का इस्तीफा
इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बीच, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास पर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई. इस बैठक में पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे. सूत्रों का कहना है कि इस बैठक में कुछ बागी टीएमसी सांसदों ने भी हिस्सा लिया, जिससे इस बगावत के पीछे एक सोची-समझी रणनीति के संकेत मिल रहे हैं.
इसी उथल-पुथल के बीच, टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी सोमवार को अपनी राज्यसभा सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपने इस्तीफे के लिए "15 वर्षों के अराजक शासन" को जिम्मेदार ठहराया और भाजपा की प्रशंसा की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पार्टी के भीतर असंतोष काफी गहरा हो चुका है.
दलबदल विरोधी कानून-कानूनी चुनौतियां
इस बगावत के बाद अब सबकी नजरें तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर टिक गई हैं. टीएमसी के नेतृत्व ने दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत इन सांसदों की सदस्यता पर सवाल उठाए हैं.
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नियम के मुताबिक, यदि कोई गुट दलबदल विरोधी कानून के तहत अपनी सदस्यता बचाकर मूल पार्टी से अलग होना चाहता है, तो उसे संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का समर्थन हासिल करना होगा.
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टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से दो-तिहाई की संख्या 19 होती है.
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बागी गुट का दावा है कि उनके पास 20 सांसदों का समर्थन है, यानी उन्होंने कानूनी रूप से जरूरी संख्याबल हासिल कर लिया है.
हालांकि, टीएमसी के कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि संख्याबल होने के बावजूद बागी सांसद सीधे तौर पर एक स्वतंत्र संसदीय समूह नहीं बना सकते, बल्कि उन्हें किसी अन्य राजनीतिक दल (जैसे भाजपा या एनडीए के घटक दल) में विलय करना होगा. इस पूरी स्थिति में अब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का अंतिम निर्णय सबसे महत्वपूर्ण होने वाला है.
राष्ट्रीय राजनीति पर असर
तृणमूल कांग्रेस में हुई यह बड़ी टूट ममता बनर्जी के लिए अब तक की सबसे बड़ी सांगठनिक चुनौती है. यह घटनाक्रम न केवल पश्चिम बंगाल की आंतरिक राजनीति को पूरी तरह बदल देगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके दूरगामी परिणाम होंगे. विपक्षी दलों के 'इंडिया' गठबंधन की एकजुटता और भविष्य की रणनीतियों पर भी इस बगावत का गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी इस आंतरिक विद्रोह को थामने के लिए क्या कदम उठाती हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 08, 2026 07:37 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

