Ravi Kishan Parliament speech on Food Prices: हम सबने यह महसूस किया है. गली के नुक्कड़ पर जो समोसा 10 रुपये का मिलता है, वही किसी अच्छे रेस्टोरेंट में 50 का और एयरपोर्ट या फाइव स्टार होटल में 500 रुपये तक का हो जाता है. चीज़ वही, लेकिन दाम में ज़मीन-आसमान का फ़र्क. आखिर ऐसा क्यों है?
इसी आम आदमी की आवाज़ को लेकर सांसद और अभिनेता रवि किशन संसद में गरजे. उन्होंने एक ऐसा मुद्दा उठाया जो सीधे हम सबकी जेब और भरोसे से जुड़ा है.
क्या कहा रवि किशन ने?
रवि किशन ने संसद में सरकार से सीधा सवाल किया कि देश में खाने-पीने की चीज़ों की कीमत और मात्रा को लेकर कोई एक नियम क्यों नहीं है? उन्होंने कहा:
दामों में भारी अंतर: एक ही दाल, वड़ा पाव या समोसे की कीमत ढाबे से लेकर फाइव स्टार होटल तक अलग-अलग क्यों है? जब चीज़ एक है तो दाम में इतना बड़ा अंतर किस आधार पर तय होता है?
मात्रा और गुणवत्ता का सवाल: कई बार ज़्यादा पैसे देने के बाद भी खाने की मात्रा (quantity) और गुणवत्ता (quality) बहुत खराब होती है. इसकी निगरानी कौन करेगा?
भावनात्मक और आर्थिक ठगी: रवि किशन ने इसे आम जनता के साथ "भावनात्मक और आर्थिक ठगी" बताया. उन्होंने कहा कि देश के करोड़ों लोग, जिनमें छात्र, ऑफिस जाने वाले और मज़दूर शामिल हैं, रोज़ाना बाहर खाते हैं. उनके साथ कीमतों को लेकर ऐसा भेदभाव क्यों हो?
क्या है रवि किशन की मांग?
सांसद ने सिर्फ़ समस्या नहीं बताई, बल्कि इसका समाधान भी सुझाया. उन्होंने सरकार से मांग की है कि एक ठोस कानून बनाया जाए. यह कानून छोटे-से-छोटे ढाबे से लेकर बड़े-से-बड़े फाइव स्टार होटल तक पर लागू हो. इस कानून के तहत खाने-पीने की हर चीज़ की कीमत, मात्रा और गुणवत्ता का एक मानक तय किया जाना चाहिए.
इसका मतलब यह होगा कि कोई भी अपनी मनमर्ज़ी से दाम तय नहीं कर पाएगा और ग्राहकों को यह पता होगा कि वे जितने पैसे दे रहे हैं, उसके बदले में उन्हें सही चीज़ मिल रही है.
रवि किशन ने इस मुद्दे को "लोक महत्व का विषय" बताकर सरकार का ध्यान खींचा है. यह सच है कि यह करोड़ों लोगों से जुड़ा एक गंभीर मामला है. अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकार आम आदमी की इस बड़ी समस्या पर कोई ठोस कदम उठाएगी? क्या आने वाले समय में हमें खाने-पीने की चीजों के लिए एक स्टैंडर्ड रेट देखने को मिलेगा? इसका जवाब तो भविष्य ही देगा.













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