क्या बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच एशिया के पास महाशक्ति बनने का मौका है?

एशिया के विपरीत, यूरोप में दशकों पुराने अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थागत प्रणालियों में होने वाले बदलावों को अक्सर नुकसान की तरह देखा जाता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

एशिया के विपरीत, यूरोप में दशकों पुराने अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थागत प्रणालियों में होने वाले बदलावों को अक्सर नुकसान की तरह देखा जाता है. हालांकि, ये बदलाव एक नई और ज्यादा समावेशी व्यवस्था की शुरुआत भी हो सकते हैं.यूरोपीय संघ के पूर्वी छोर पर यूक्रेन के खिलाफ रूस का आक्रामक युद्ध, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय नियमों के प्रति अमेरिका की लापरवाही और बेरुखी और गाजा में इस्राएल द्वारा जनसंहार किए जाने के आरोपों ने यूरोप के कई लोगों को गहरा झटका दिया है.

ऐसा लगता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था अब खत्म हो रही है. जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने फरवरी 2026 के म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कहा था, "यह व्यवस्था, जो अपने सबसे अच्छे दिनों में भी पूरी तरह सही नहीं थी, अब अपने उस पुराने रूप में मौजूद नहीं है.”

हालांकि, एशिया के राजनीतिक जानकार अक्सर यूरोपीय नेताओं की इस घबराहट और चिंता को देखकर हैरान रह जाते हैं. सिंगापुर में हर साल होने वाले एशियाई सुरक्षा सम्मेलन ‘शांगरी-ला डायलॉग' के दौरान, सिंगापुर के पूर्व राजनयिक बिलाहारी कौसिकन ने डीडब्ल्यू से कहा, "यूरोप को लगता था कि जंगल को हमेशा के लिए काबू में कर लिया गया है. फिर अचानक उसे एक बड़ा झटका लगा.”

उन्होंने आगे कहा, "प्रतिस्पर्धा और टकराव अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बुनियादी बातें हैं. ये कड़वे और स्थायी सच कुछ समय के लिए छिप गए थे, शायद बर्लिन की दीवार गिरने से लेकर वैश्विक आर्थिक संकट शुरू होने तक के लगभग 20 सालों के बीच. यह दुनिया के इतिहास में एक बहुत ही असाधारण और अनोखा दौर था.”

‘अमेरिका अब पहले जैसा नहीं रहा'

जर्मनी की फ्रीडरिष-एबर्ट फाउंडेशन के एशिया-पैसिफिक प्रमुख, मार्क साक्सर ने डीडब्ल्यू को बताया कि यूरोप और एशिया के लोगों के सोचने का नजरिया उनके अलग-अलग ऐतिहासिक अनुभवों से बना है. अमेरिका के सुरक्षा कवच के साये में रहकर यूरोप एक उदार वैश्विक व्यवस्था के सपने देख सका, लेकिन एशिया के लिए ऐसा सोचना भी नामुमकिन था.

साक्सर का मानना है कि एक उदार वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिशें अब नाकाम हो चुकी हैं. उनका यह भी कहना है कि 'बुनियादी और संरचनात्मक कारणों की वजह से, अमेरिका के लिए फिर से उस भूमिका में लौटना नामुमकिन है जो वह 2010 के दशक तक निभाता आ रहा था.”

राजनीतिक विश्लेषक साक्सर का यह भी कहना है कि एक महाशक्ति वाला दौर (एकध्रुवीय व्यवस्था) अब पूरी तरह खत्म हो चुका है, क्योंकि अमेरिका ने यूरोप, पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) और एशिया-पैसिफिक जैसे कई मोर्चों पर एक साथ उलझकर अपनी ताकत और संसाधनों को बहुत ज्यादा बिखेर दिया है.

जर्मन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (डीजीएपी) के डायरेक्टर थोमास क्लाइने-ब्रॉकहोफ ने डीडब्ल्यू से कहा कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अब 'बड़ी महाशक्तियों के दबदबे वाली एक नई दुनिया बनाने की कोशिश कर रहा है. यह रूस और चीन के साथ मिलकर एक तरह का ग्लोबल डायरेक्टरेट बनाने जैसा है.' इसका मतलब होगा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों पर इन बड़ी महाशक्तियों का सीधा नियंत्रण होगा.

नतीजतन, अमेरिका, चीन और रूस (हर कोई अपने-अपने कारणों और इरादों से) अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं को कमजोर कर रहे हैं.

साक्सर ने इसी नाम से एक किताब भी लिखी है. उनका मानना है कि इसका नतीजा ‘भेड़ियों की दुनिया' (वुल्फ वर्ल्ड) के रूप में सामने आ रहा है, यानी एक ऐसी दुनिया ‘जहां कानून की ताकत के बजाए, सबसे ताकतवर का कानून ही चलता है.'

मध्यम दर्जे की ताकतों का क्या रुख होगा?

जाहिर है, विश्व के बाकी ज्यादातर देशों की ऐसी दुनिया में कोई दिलचस्पी नहीं है. लेकिन इसके खिलाफ कौन से नए रुझान उभर रहे हैं?

क्लाइने-ब्रॉकहोफ ने ऐसी तीन खास प्रतिक्रियाओं की पहचान की है, जिनमें से हर एक इस बात पर निर्भर करती है कि कोई देश भौगोलिक रूप से कहां स्थित है और उसके आस-पास का रणनीतिक माहौल कैसा है.

मसलन, जापान के पास अमेरिका के साथ अपने सहयोग को और गहरा करने की कोशिश करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. इसकी वजह यह है कि वह चीन जैसी उभरती हुई महाशक्ति के बिल्कुल करीब स्थित है और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में उसके पास एक जैसी सोच रखने वाले बहुत कम साथी हैं.

क्लाइने-ब्रॉकहोफ के मुताबिक, यूरोप इस समय ‘खुद को आर्थिक और सैन्य रूप से मजबूत करने' पर ध्यान दे रहा है, जबकि वह भौगोलिक रूप से एक इकाई है और राजनीतिक रूप से आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है. ऐसा करके, वह इस बदलाव के दौर में जब तक हो सके, अमेरिका को अपने साथ जोड़े रखने की कोशिश कर रहा है, ताकि आखिरकार वह अपने पैरों पर खुद खड़ा हो सके.”

तीसरा मॉडल है, मध्यम दर्जे की ताकतों का एक तरह का जवाबी गठबंधन. इसकी रूपरेखा कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने जनवरी में दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर दिए गए अपने बेहद सराहे गए भाषण में रखी थी.

उन्होंने कहा था, "पुरानी व्यवस्था अब नहीं लौटेगी. हमें इसका अफसोस नहीं करना चाहिए. बीती बातों को याद करते रहना कोई रणनीति नहीं होती. लेकिन इस बदलाव के बीच हम कुछ ऐसा बना सकते हैं जो पहले से बेहतर, ज्यादा मजबूत और न्यायसंगत हो. यही मध्यम दर्जे की ताकतों का असली काम है.”

साक्सर ने कहा कि इस बात पर ध्यान देना बहुत जरूरी है कि कैसे अब गैर-पश्चिमी देश, दुनिया की नई व्यवस्था और उसके भविष्य को तय करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. बतौर साक्सर, "यह ऐतिहासिक बदलाव इसलिए इतना खास है, क्योंकि सदियों में पहली बार, गैर-पश्चिमी ताकतें अगली वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं. पहले के विपरीत, अब व्यवस्था का मतलब पश्चिमीकरण नहीं होगा.”

कैसी होगी नई वैश्विक व्यवस्था?

इस दुनिया में आगे बढ़ने और टिके रहने के लिए, साक्सर ने कई ऐसी बातों को रेखांकित किया है जो कनाडाई नेता कार्नी द्वारा मध्यम दर्जे की ताकतों को सौंपे गए ‘कामों' को और बढ़ाती हैं. इसमें यह बात भी शामिल है कि इन देशों को आपस में पारंपरिक ‘गठबंधन' बनाने के बजाय ‘मिडिल-पावर पार्टनरशिप' के रूप में सहयोग करना चाहिए, ताकि दुनिया को अलग-अलग गुटों में बंटने से रोका जा सके.

साक्सर ने कहा, "हमारी सीमित क्षमताओं को देखते हुए, हम वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सिर्फ एक जैसी सोच रखने वाले लोकतांत्रिक देशों के गठबंधनों के भरोसे नहीं बैठ सकते. हमें बीच का रास्ता निकालने वाली साझेदारियों में उन सभी देशों को एक साथ लाना होगा जो समस्याओं का समाधान खोजना चाहते हैं, चाहे उनकी आंतरिक राजनीतिक व्यवस्था कुछ भी हो.”

यह व्यावहारिक तरीका मूल्यों पर आधारित राजनीति और समान सोच वाले साथियों की तलाश से कहीं आगे की चीज है. इसके तहत, उन क्षेत्रों में मिलकर काम किया जाता है जहां दोनों देशों के हित आपस में मिलते हैं. वहीं, जहां हित अलग-अलग होते हैं वहां इस सहयोग को कुछ समय के लिए रोका भी जा सकता है.

बेशक, यह सब हमेशा कुछ ऐसे सिद्धांतों को बनाए रखते हुए किया जाता है जिनसे किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता, जैसे कि मानवाधिकार.

नई वैश्विक व्यवस्था के इस सपने को पूरा करने के लिए, साक्सर शीत युद्ध के दौर के ‘हेलसिंकी डिक्लेरेशन' के एक नए रूप की कल्पना करते हैं. वह पुराना समझौता मुख्य रूप से यूरोप में सुरक्षा के मुद्दों से जुड़ा था और उसका पूरा निचोड़ इस बात में था कि ‘बिना किसी दखलअंदाजी के सार्वभौमिकता बनी रहे, यानी सबके अधिकारों का सम्मान किया जाए.'

1970 के दशक की शुरुआत में, शीत युद्ध के दौरान, अमेरिका और सोवियत संघ ने यूरोपीय नाटो देशों और वारसॉ संधि के देशों के साथ मिलकर ‘कॉन्फ्रेंस ऑन सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप' (सीएससीई) में एक स्वैच्छिक सहमति जताई थी. हालांकि, यह कोई औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं थी.

साक्सर के मुताबिक, यह तरीका आज भी प्रासंगिक है. वहीं, क्लाइने-ब्रॉकहोफ को शक है कि ऐसी व्यवस्था लंबे समय तक बनी रह सकती है. खासकर इसलिए, क्योंकि अतीत के विपरीत, वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखने वाली ताकतें इस समय कमजोर पड़ चुकी हैं.

वह कहते हैं, "हर व्यवस्था को नियमों को लागू कराने वाली एजेंसियों के साथ-साथ, कम से कम बुनियादी स्तर के कुछ नियमों तथा उनके पालन की जरूरत होती है. साझेदारों का यह लचीला रवैया आखिरकार अस्थिर ही बना रहेगा, क्योंकि वे जलवायु नीति जैसे क्षेत्रों में तो मिलकर काम करते हैं, लेकिन सुरक्षा नीति के मामले में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं.

कार्नी के नजरिए को लेकर, क्लाइने-ब्रॉकहोफ का तर्क है कि मध्यम दर्जे की ताकतें आपस में एक-दूसरे से बहुत अलग हैं और उनके हित भी एक-दूसरे से काफी मेल नहीं खाते हैं. वह कहते हैं, "मुझे विरोधी ताकतें तो दिखती हैं, लेकिन उनके बीच कोई जुड़ाव नहीं दिखता.”

साझा समाधानों के लिए बुरा दौर

नतीजतन, मौजूदा हालात की वजह से पूरी दुनिया के लोगों के हितों की रक्षा करना पहले से ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन से निपटना, महामारी जैसी स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना और शांति बनाए रखना लगातार मुश्किल होता जा रहा है.

क्लाइने-ब्रॉकहोफ को डर है कि दुनिया ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां हर देश या पक्ष सिर्फ अपना फायदा देखेगा. वैश्विक समस्याओं का मिलकर समाधान खोजने के बजाए सभी अपने-अपने हितों को प्राथमिकता देंगे.

साक्सर का मानना है कि इस स्थिति से बचने का एक ही तरीका है कि जो पक्ष व्यवहारिक तरीके से साथ काम करना चाहते हैं, वे आपस में मिलकर सहयोग करें.

उनका मानना है कि ‘ट्रांसफॉर्मेटिव रियलिज्म' का विचार सबसे बेहतर रास्ता है. इसके जरिए उदारवादी वैश्विक व्यवस्था के बाद उभर रहे अलग-अलग विचारों को साथ लाया जा सकता है और दुनिया की चुनौतियों का समाधान बिना कोई नया गुट बनाए किया जा सकता है.

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