One Nation One Election: 6 महीने का नोटिस मिले तो एक साथ चुनाव कराने को तैयार निर्वाचन आयोग, JPC के सामने रखी टाइमलाइन
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एक देश, एक चुनाव प्रस्ताव की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को सूचित किया है कि छह महीने का अग्रिम नोटिस मिलने पर वह लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए पूरी तरह तैयार है. समिति का कार्यकाल मानसून सत्र 2026 तक बढ़ा दिया गया है.
नई दिल्ली: 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (One Nation One Election) (एक देश, एक चुनाव) की दिशा में देश में एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम सामने आया है. भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) (ECI) ने इस प्रस्ताव की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee) (JPC) को सूचित किया है कि यदि उसे छह महीने (6 महीने) का अग्रिम नोटिस दिया जाए, तो वह पूरे देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह तैयार है. सांसद पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली जेपीसी वर्तमान में इस व्यवस्था को लागू करने के लिए जरूरी कानूनी, संवैधानिक और प्रशासनिक ढांचे का बारीकी से परीक्षण कर रही है. यह भी पढ़ें: SIR Exercise: घर-घर जाकर वोटर वेरिफिकेशन करने वाले BLO और सुपरवाइजर को मिलेंगे 6,000 रुपये, चुनाव आयोग का बड़ा फैसला
समिति करेगी निर्वाचन आयोग की तकनीकी योजनाओं की समीक्षा
जेपीसी के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने बताया कि समिति ने गोवा और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों का अध्ययन दौरा (स्टडी विजिट) पूरा कर लिया है. अब समिति कोई भी अंतिम सिफारिश सौंपने से पहले चुनाव आयोग की तकनीकी और व्यावहारिक योजनाओं को विस्तार से सुनेगी.
समिति के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया:
"हम चुनाव आयोग से यह समझेंगे कि वह 'वन नेशन वन इलेक्शन' को जमीन पर कैसे लागू करने की योजना बना रहा है. हम आयोग के सामने अपने सवाल रखेंगे और उनका दृष्टिकोण सुनने के बाद ही समिति यह सिफारिश करेगी कि इसे व्यावहारिक रूप से लागू किया जा सकता है या नहीं. यदि संसद 2028 में आवश्यक कानूनों को पारित कर देती है, तो आयोग ने संकेत दिया है कि वह 2029 में इस नए ढांचे के तहत पहले एक साथ चुनाव आयोजित करा सकता है."
वर्तमान में यह पैनल 'संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024' और 'केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024' की समीक्षा कर रहा है.
एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में क्या हैं तर्क?
इस ऐतिहासिक चुनावी सुधार के समर्थकों और सरकार का तर्क है कि भारत में लगातार होने वाले अलग-अलग चुनाव देश के विकास में बड़ी बाधा बनते हैं. बार-बार चुनाव होने से बार-बार आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू होती है, जिससे नीतिगत फैसले रुक जाते हैं और विकास कार्य बाधित होते हैं.
इसके अलावा, हर साल अलग-अलग राज्यों में चुनाव कराने से सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है. जेपीसी के समक्ष कानूनी विशेषज्ञों ने अपनी राय में कहा है कि यह प्रस्ताव भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) या संघीय सिद्धांतों (Federal Principles) का उल्लंघन नहीं करता है. गौरतलब है कि भारत में साल 1954 से 1960 के बीच एक साथ चुनाव कराने की परंपरा पहले से रही है.
देश में जारी है व्यापक बहस; मानसून सत्र तक बढ़ा समय
'एक देश, एक चुनाव' को लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी बहस जारी है. जहां एक तरफ संसदीय समिति को अपने क्षेत्रीय दौरों के दौरान नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) के कई हितधारकों से व्यापक समर्थन मिलने की बात कही जा रही है; वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल और कई संविधान विशेषज्ञ इसके विरोध में हैं.
विरोधियों का मुख्य तर्क यह है कि चुनावी चक्रों को एक साथ जोड़ने से भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) को नुकसान पहुंच सकता है. इससे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को नुकसान होगा और राष्ट्रीय विमर्श के सामने राज्यों के स्थानीय और बुनियादी मुद्दे दब जाएंगे. इन सभी चुनौतियों और चिंताओं पर अधिक गहराई से विचार-विमर्श करने के लिए जेपीसी के कार्यकाल को आगामी मानसून सत्र 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया है, जिसके बाद समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट संसद को सौंपेगी.