फांसी की जगह जहर का इंजेक्शन? सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका; कहा- 'फांसी की सजा संवैधानिक, भविष्य में सरकार चाहे तो कर सकती है समीक्षा'

सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को जहरीले इंजेक्शन या अन्य कम दर्दनाक तरीकों से बदलने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 1983 के ऐतिहासिक फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि फांसी की सजा वर्तमान में संवैधानिक रूप से वैध है, हालांकि वैज्ञानिक प्रगति के आधार पर केंद्र सरकार भविष्य में विकल्पों की समीक्षा के लिए स्वतंत्र है.

सुप्रीम कोर्ट (Photo Credits: File Image)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा (Capital Punishment) के लिए फांसी के फंदे के बजाय कम दर्दनाक विकल्पों—जैसे जहरीला इंजेक्शन (Lethal Injection) या अन्य विधियों—को अपनाने की मांग वाली वर्षों पुरानी याचिका को खारिज कर दिया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में मृत्युदंड के क्रियान्वयन के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था संवैधानिक रूप से पूरी तरह वैध है.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुनाते हुए इस मुद्दे को किसी बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 393(5) [पूर्ववर्ती CrPC की धारा 354(5)] के तहत निर्धारित फांसी की प्रक्रिया की वैधता पर पुनर्विचार करने का कोई ठोस आधार नहीं है. यह भी पढ़ें: SC On Abhishek Banerjee: सुप्रीम कोर्ट से TMC सांसद अभिषेक बनर्जी को बड़ी राहत, आंखों के इलाज के लिए विदेश जाने की मिली अनुमति

याचिकाकर्ता की दलील: 'गरिमापूर्ण मृत्यु' और कम दर्दनाक विकल्प

यह जनहित याचिका (PIL) वर्ष 2017 में वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर की गई थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि:

सुप्रीम कोर्ट का रुख: '1983 का फैसला वैध, लेकिन भविष्य के विकल्प खुले'

पीठ ने अपने फैसले में 1983 के ऐतिहासिक 'दीना बनाम भारत संघ' (Deena vs Union of India) मामले का हवाला दिया, जिसमें तीन जजों की संविधान पीठ ने फांसी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था.

हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस याचिका का खारिज होना भविष्य के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करता. पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा:

"हम यह स्पष्ट करते हैं कि इस रिट याचिका की अस्वीकृति को भविष्य की संवैधानिक समीक्षा को रोकने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, यदि भविष्य में कोई ठोस वैज्ञानिक, न्यूरोलॉजिकल या मेडिकल साक्ष्य सामने आते हैं."

अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार वैज्ञानिक प्रगति और कैदी की गरिमा की रक्षा के साथ दर्द को कम करने के उद्देश्य से एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है.

केंद्र सरकार का पक्ष: 'फांसी सबसे सुरक्षित और त्वरित तरीका'

मामले की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए बताया था कि सरकार ने इस मुद्दे पर एक विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार-विमर्श किया था.

हालांकि, केंद्र ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया था कि कैदियों को मृत्युदंड के तरीके का विकल्प देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है. सरकार का रुख रहा है कि अन्य विकल्पों की तुलना में फांसी की प्रक्रिया अधिक सरल, त्वरित और विश्वसनीय है, जबकि अमेरिका जैसे देशों में घातक इंजेक्शन के कई मामलों में तकनीकी खामियां और विफलताएं देखी गई हैं.

शीर्ष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सजा के तौर-तरीकों में कानूनी बदलाव करना संसद और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि न्यायिक निर्देशों के तहत.

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