Lalbaugcha Raja History: लालबागचा राजा का क्या है इतिहास? जानें 1934 में कैसे एक मन्नत से हुई थी शुरुआत, आज उमड़ती है लाखों की भीड़
लालबागचा राजा की स्थापना वर्ष 1934 में हुई थी. 1930 के दशक में मध्य मुंबई का लालबाग-परेल इलाका कपड़ों की मिलों के लिए जाना जाता था. वर्ष 1932 में जब स्थानीय पेरू चाल का बाजार बंद हो गया, तो वहां व्यापार करने वाले मछुआरों और विक्रेताओं के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया.
Lalbaugcha Raja History: मुंबई में गणेशोत्सव की पहचान बन चुके 'लालबागचा राजा' (Lalbaugcha Raja) का दरबार हर साल लाखों श्रद्धालुओं से गुलजार रहता है. आम नागरिकों से लेकर बॉलीवुड हस्तियों, उद्योगपतियों और प्रमुख राजनेताओं तक, हर कोई यहां भगवान गणेश के दर्शन के लिए पहुंचता है. लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल इस वर्ष अपना 93वां गणेशोत्सव मना रहा है.
1934 में कैसे हुई स्थापना?
लालबागचा राजा की स्थापना वर्ष 1934 में हुई थी. 1930 के दशक में मध्य मुंबई का लालबाग-परेल इलाका कपड़ों की मिलों के लिए जाना जाता था. वर्ष 1932 में जब स्थानीय पेरू चाल का बाजार बंद हो गया, तो वहां व्यापार करने वाले मछुआरों और विक्रेताओं के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया.
स्थानिक विक्रेताओं और मछुआरों ने भगवान गणेश से प्रार्थना की और मन्नत मांगी कि यदि उन्हें व्यापार के लिए स्थाई जगह मिल जाती है, तो वे सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत करेंगे. स्थानीय नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और भूस्वामी की सहायता से उन्हें बाजार के लिए जगह मिली. मन्नत पूरी होने की खुशी में 12 सितंबर 1934 को पहली बार यहां गणेश प्रतिमा स्थापित की गई.
'मन्नतों के राजा' के रूप में पहचान
लालबागचा राजा को 'नवसाचा गणपति' यानी मन्नतों को पूरा करने वाला गणपति कहा जाता है. श्रद्धालुओं में यह दृढ़ विश्वास है कि यहां मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है.
यही कारण है कि उत्सव के 11 दिनों के दौरान यहां दो प्रमुख कतारें लगती हैं:
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चरण स्पर्श (मन्नत की लाइन): इसमें श्रद्धालु प्रतिमा के पास जाकर उनके चरणों को छूते हैं. इस लाइन में दर्शन के लिए कई बार 20 से 30 घंटे तक का समय लगता है.
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मुख दर्शन लाइन: इसमें श्रद्धालु केवल प्रतिमा का दूर से दर्शन कर आगे बढ़ जाते हैं.
कांबली परिवार और मूर्तिकला की परंपरा
लालबागचा राजा की प्रतिमा का निर्माण 1935 से कांबली परिवार (Kambli Arts) द्वारा किया जा रहा है. प्रतिमा का विशिष्ट आकार, राजसी स्वरूप और चेहरा दशकों से एक समान बनाए रखा गया है. मूर्तिकार परिवार परंपरा के अनुसार मंडल के परिसर में ही प्रतिमा के अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर उसे अंतिम रूप देता है.
मंडल द्वारा जुटाए गए दान का उपयोग विभिन्न सामाजिक कार्यों, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा राहत कोष में भी किया जाता है.