Investment declaration 2025: वित्त वर्ष 2025-26 की शुरुआत 1 अप्रैल 2025 से हो चुकी है, और इसके साथ ही देशभर की कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को टैक्स सेविंग इनवेस्टमेंट डिक्लेरेशन (Tax-Saving Investment Declaration) जमा करने के लिए ईमेल भेजने शुरू कर दिए हैं. यह प्रक्रिया खास तौर पर उन कर्मचारियों के लिए जरूरी होती है, जो पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) को अपनाते हैं.
हालांकि, जो कर्मचारी नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) को चुनते हैं, उनके लिए इनवेस्टमेंट डिक्लेरेशन की आवश्यकता सीमित है, या बिल्कुल नहीं होती है. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं, कि उन्हें क्या करना चाहिए, किसे डिक्लेरेशन देना है, और कब तक देना है. आइए जानते हैं इस पूरी प्रक्रिया के बारे में:
सबसे पहले क्या करें?
सबसे जरूरी कदम है, यह तय करना कि आप इस साल पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनना चाहते हैं या नई. पुरानी व्यवस्था में आप कई तरह की टैक्स छूट और कटौतियों जैसे एलआईसी (LIC), पीपीएफ (PPF), एचआर (HRA), होम लोन (Home Loan) आदि का लाभ उठा सकते हैं. वहीं, नई व्यवस्था में टैक्स स्लैब (Tax Slab) कम हैं, लेकिन छूटें बेहद सीमित हैं.
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इसका फैसला आसानी लेने के लिए आप इनकम टैक्स कैलकुलेटर का उपयोग करें, और दोनों सिस्टम की तुलना कर लें, कि किसमें आपकी कुल टैक्स देनदारी कम रहेगी.
नियम क्या कहते हैं?
हर वित्त वर्ष की शुरुआत में कंपनियां अपने कर्मचारियों से पूछती हैं, कि वह साल भर में कौन-कौन से टैक्स सेविंग निवेश करने की योजना बना रहे हैं. इन्हीं डिक्लेरेशन के आधार पर आपकी सैलरी से हर महीने टीडीएस (Tax Deducted at Source) काटा जाता है.
फिर साल के अंत में, कंपनी आपसे इन निवेशों के प्रमाण (Proof) मांगती है. यदि आप सबूत नहीं देते या कम देते हैं, तो कंपनी बचे हुए महीनों में ज्यादा टीडीएस काट लेती है.
किसे है इनवेस्टमेंट डिक्लेरेशन से फायदा?
पुरानी टैक्स व्यवस्था अपनाने वाले कर्मचारियों को यह डिक्लेरेशन भरना बहुत जरूरी है. इससे आप धारा 80C, 80D, एचआरए, होम लोन ब्याज जैसे कई टैक्स छूट क्लेम कर सकते हैं. वहीं, नई टैक्स व्यवस्था में ज़्यादातर छूटें हट चुकी हैं. इसलिए इस व्यवस्था में डिक्लेरेशन की जरूरत नहीं होती, सिवाय कुछ खास स्थितियों के (जैसे रेंटल प्रॉपर्टी पर होम लोन का ब्याज).
नई टैक्स व्यवस्था में क्या-क्या छूट मिलती है?
नई टैक्स व्यवस्था में अधिकतर टैक्स छूटों को खत्म कर दिया गया है. फिर भी कुछ स्टैंडर्ड कटौतियां (Standard Deduction) अब भी मिलती हैं:
- 75,000 रुपये की स्टैंडर्ड डिडक्शन (सैलरी या पेंशन वालों को).
- एनपीएस (NP) और पीएफ (PF) में एम्प्लॉयर द्वारा किए गए योगदान पर टैक्स छूट.
इन छूटों के लिए किसी प्रकार की डिक्लेरेशन या प्रमाण पत्र देने की जरूरत नहीं होती है. आपकी कंपनी इन्हें खुद ही आपकी सैलरी में एडजस्ट (Adjust) कर लेती है.
नई टैक्स व्यवस्था में आप क्या डिक्लेयर कर सकते हैं?
यदि आपकी कोई प्रॉपर्टी किराए पर दी गई है, और उस पर होम लोन चल रहा है, तो उस पर दिए गए ब्याज की कुछ छूट नई टैक्स व्यवस्था में भी मिलती है. इस स्थिति में आप अपने एम्प्लॉयर को यह जानकारी दे सकते हैं.
इसके अलावा, कुछ कंपनियां आपसे साल की शुरुआत में ही अन्य आय स्रोतों की जानकारी भी मांगती हैं, जैसे:
- सेविंग अकाउंट पर ब्याज.
- 5 लाख रुपये से अधिक पीपीएफ (PPF) योगदान पर ब्याज.
- नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (NSC) से मिलने वाली राशि.
- अन्य स्रोतों से होने वाली आय.
हालांकि यह जानकारी साल के शुरू में पूरी तरह देना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, फिर भी आप अनुमान के आधार पर यह डिक्लेयर कर सकते हैं.
क्या करें और क्या न करें?
- यदि आप नई टैक्स व्यवस्था में हैं, तो आपको इनवेस्टमेंट डिक्लेरेशन की ज़रूरत नहीं होती, जब तक कोई विशेष स्थिति न हो.
- पुरानी टैक्स व्यवस्था को अपनाने वालों के लिए यह जरूरी है, कि वह सभी संभावित निवेश और अन्य आय की जानकारी समय पर कंपनी को दें.
- समय पर सही जानकारी देने से सैलरी से कम टीडीएस कटेगा और साल के अंत में टैक्स का झंझट नहीं होगा.
- साल के अंत में घोषित निवेशों के प्रमाण पत्र जमा करना न भूलें, वरना कंपनी अतिरिक्त टैक्स काट सकती है.













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