फिल्म में रोल का झांसा देकर दुष्कर्म और प्राइवेट वीडियो वायरल करने वाले आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट से खारिज

बॉम्बे हाई कोर्ट ने फिल्मों में काम दिलाने का झूठा झांसा देकर एक महिला के साथ बार-बार दुष्कर्म करने और बाद में उसके आपत्तिजनक फोटो व वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने के आरोपी व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है. अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी ने महिला के भरोसे का दुरुपयोग किया और उसके जीवन को पूरी तरह बर्बाद कर दिया. कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटाने के लिए आरोपी की हिरासत में पूछताछ को आवश्यक माना है.

बॉम्बे हाईकोर्ट (Photo Credits: File Image)

मुंबई, 3 जून: बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने फिल्मों में काम दिलाने का झांसा देकर एक महिला के साथ बार-बार दुष्कर्म (Rape)  करने और बाद में उसके आपत्तिजनक फोटो व वीडियो सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने के आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है. मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति श्याम चांडक की एकल पीठ ने आरोपी की गिरफ्तारी-पूर्व जमानत याचिका को खारिज कर दिया. अदालत ने अपने आदेश में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी ने महिला द्वारा जताए गए भरोसे का न केवल दुरुपयोग किया, बल्कि उसके इस कृत्य ने एक महिला के जीवन को पूरी तरह तबाह कर दिया. कोर्ट ने माना कि पहली नजर में आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म का मामला पूरी तरह बनता है. यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करने वाले वयस्कों पर पुलिस नहीं कर सकती कार्रवाई, 'जबरन पुनर्वास' पर भी लगाई रोक

फिल्म ऑडीशन के नाम पर शुरू हुई थी मुलाकात

अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, पीड़िता के चाचा को साल 2024 में 'दक्षिण दिग्विजय' नामक एक फिल्म के लिए कलाकारों की तलाश से जुड़ा एक पोस्टर मिला था, जिसके बाद उन्होंने वह संपर्क विवरण पीड़िता से साझा किया. महिला ने मई 2024 में फिल्म के ऑडीशन के सिलसिले में आरोपी से संपर्क किया था.

आरोपी ने महिला को बताया कि वह एक उपयुक्त कहानी की तलाश में है और उसने उसे फिल्म में मुख्य भूमिका दिलाने का भरोसा दिया। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत और दोस्ती बढ़ती गई.  आरोप है कि अक्टूबर 2024 में आरोपी ने महिला को फिल्मों में काम दिलाने का पक्का आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी कर लिया.

शादी की बात छुपाई और प्राइवेट वीडियो किए वायरल

महिला का आरोप है कि संबंधों के दौरान आरोपी ने उसकी सहमति के बिना और धोखे से कई आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिए थे. उस समय आरोपी ने उसे आश्वस्त किया था कि ये सभी चीजें पूरी तरह निजी (Private) रहेंगी. महिला ने यह भी बताया कि आरोपी ने कभी यह प्रकट नहीं किया कि वह पहले से शादीशुदा है और उसका एक बच्चा भी है. महिला को उसके वैवाहिक जीवन की सच्चाई काफी बाद में पता चली.

सरकारी वकील के मुताबिक, जब आरोपी की पत्नी को इस संबंध के बारे में पता चला, तो उनके परिवार में भारी विवाद शुरू हो गया. इसके बाद जनवरी 2026 में महिला और आरोपी ने आपसी सहमति से अपने रिश्ते को पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया. रिश्ता टूटने से नाराज आरोपी ने महिला को उसके फोटो और वीडियो इंटरनेट पर पोस्ट करने की धमकी दी और बाद में उन्हें विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल कर दिया.

पुणे के नर्हे थाने में मामला दर्ज; कोर्ट ने जताई कस्टडी की जरूरत

इस हरकत के बाद पीड़िता के परिवार की शिकायत पर पुणे के नर्हे पुलिस स्टेशन में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66E व 67A और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी.

अदालत में बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि दोनों के बीच के संबंध पूरी तरह से सहमति (Consensual) पर आधारित थे और आरोपी ने अपने फोन से सभी आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो पहले ही डिलीट कर दिए हैं, इसलिए उसे हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई आवश्यकता नहीं है.

हाई कोर्ट ने इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आरोपी के पास महिला के ऐसे आपत्तिजनक वीडियो बनाने और उन्हें सार्वजनिक करने का कोई वैध कारण नहीं था. अदालत ने आदेश दिया कि अपराध में इस्तेमाल किए गए मोबाइल, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बरामद करने तथा डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित करने के लिए आरोपी की पुलिस हिरासत (Custodial Interrogation) बेहद जरूरी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत देने से चल रही पुलिस तफ्तीश पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है.

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