8th Pay Commission: 8वे वेतन आयोग में OPS की वापसी की मांग, एक्सपर्ट्स ने बताया कहां फंस रहा सबसे बड़ा पेच
कर्मचारी संगठनों और रेलवे यूनियनों का तर्क है कि NPS और UPS कर्मचारियों को पूर्ण सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देते हैं. इसी कारण से 8वें वेतन आयोग के समक्ष यह मांग रखी गई है कि सभी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू किया जाए.
8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग के गठन के बाद से ही केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की वेतन और पेंशन संशोधन को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं. कर्मचारी यूनियनों ने पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करने की मांग को प्रमुखता से उठाया है. कर्मचारी संगठन नई पेंशन योजना (NPS) और हाल ही में घोषित यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) को खारिज करते हुए OPS की वापसी पर जोर दे रहे हैं.
ओल्ड पेंशन स्कीम की वापसी पर अड़े कर्मचारी संगठन
कर्मचारी संगठनों और रेलवे यूनियनों का तर्क है कि NPS और UPS कर्मचारियों को पूर्ण सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देते हैं. इसी कारण से 8वें वेतन आयोग के समक्ष यह मांग रखी गई है कि सभी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू किया जाए. हालांकि, आर्थिक और कानूनी जानकार इस मांग पर पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रहे हैं. यह भी पढ़े: 8th Pay Commission: फिटमेंट फैक्टर 3.61, 3.833 या 4.00 होने पर कितनी होगी न्यूनतम बेसिक सैलरी? जानें कर्मचारी यूनियनों के प्रस्ताव और फॉर्मूला
कर्मचारियों को NPS और UPS से क्यों है ऐतराज?
कर्मचारी यूनियनों की सबसे बड़ी चिंता सेवानिवृत्ति के बाद की वित्तीय सुरक्षा को लेकर है. उनका मानना है कि OPS में अंतिम वेतन के आधार पर एक निश्चित पेंशन मिलती है. इसके विपरीत, NPS का रिटर्न पूरी तरह से बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है, जिससे पेंशन की राशि को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है.
लीगल और इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स की चिंताएं
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि OPS को फिर से लागू करने से सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा, जिससे देश के विकासात्मक कार्यों के बजट पर असर पड़ सकता है. कानूनी रूप से भी सरकार NPS में सुधार करते हुए UPS का विकल्प प्रस्तुत कर चुकी है. ऐसे में पुरानी व्यवस्था पर पूरी तरह लौटना नीतिगत और व्यावहारिक रूप से जटिल माना जा रहा है.
कर्मचारियों और पेंशनर्स की 5 बड़ी मांगें
8वें वेतन आयोग की परामर्श बैठकों का दौर जारी है. चेन्नई में आयोजित बैठक के दौरान पेंशनर्स फोरम ने आयोग के समक्ष 5 प्रमुख मांगें रखी हैं:
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OPS की बहाली: NPS को हटाकर पुरानी पेंशन योजना को तुरंत लागू करना.
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बेसिक व फैमिली पेंशन में बढ़ोतरी: न्यूनतम बेसिक सैलरी को बढ़ाकर ₹68,000 करने और 10 साल के बजाय स्थाई वेज-रिविजन सिस्टम बनाने की मांग.
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कम्यूटेशन रिकवरी नियम में स्पष्टता: कम्यूटेड पेंशन की वसूली से जुड़े नियमों को आसान बनाना और राहत प्रदान करना.
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MACP में सुधार: मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन के फायदों को रिवाइज करना, जिससे डाक कर्मचारियों व अन्य कैडर का करियर प्रोग्रेशन बेहतर हो सके.
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भत्ते और सामाजिक सुरक्षा: कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए बेहतर भत्ते, लीव रूल्स और मजबूत सोशल सिक्योरिटी कवर देना.
सिविलियन कर्मचारियों के लिए OROP पर विधिक राय
सशस्त्र बलों की तर्ज पर सिविलियन कर्मचारियों के लिए 'वन रैंक, वन पेंशन' (OROP) लागू करने की मांग पर लीगल फर्म CMS INDUSLAW की पार्टनर अमृता टोंक का कहना है कि सिविल सेवाओं का ढांचा सेना से अलग होता है. हर विभाग, काडर और भर्ती वर्ष का हिसाब अलग होने के कारण समान OROP फॉर्मूला लागू करने से नई असमानताएं पैदा हो सकती हैं.
प्री-2026 पेंशनर्स के अधिकारों पर उनका मानना है कि पेंशन और ग्रेच्युटी कर्मचारियों के अर्जित अधिकार हैं. आयोग पुराने पेंशनर्स के लाभों को फ्रीज नहीं कर सकता. कानूनी रूप से उचित रास्ता यही है कि नए बदलावों को भविष्य में जुड़ने वाले कर्मचारियों पर ही लागू किया जाए.
आयोग की बैठकों का शेड्यूल और सरकार का रुख
जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला आयोग मई-जून 2027 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप सकता है. देशव्यापी परामर्श प्रक्रिया के तहत आयोग 16 से 18 सितंबर 2026 तक चंडीगढ़ में अगली बैठकें आयोजित करेगा.