भारत: अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और लोकतंत्र की साख का संकट!
क्रिसमस के मौके पर कहीं चर्चों पर हमले तो कहीं त्योहार मनाने वालों के साथ बदसलूकी ने भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं.
क्रिसमस के मौके पर कहीं चर्चों पर हमले तो कहीं त्योहार मनाने वालों के साथ बदसलूकी ने भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं. भारत की वैश्विक छवि पर भी इन घटनाओं का नकारात्मक असर पड़ा है.इस साल क्रिसमस के मौके पर भारत में दो तरह की तस्वीरों ने दुनिया भर का ध्यान खींचा. एक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उन तस्वीरों ने जिनमें दिल्ली के कैथेड्रल ऑफ द रिडेम्पशन की क्रिसमस प्रार्थना में वो पहुंचे और तस्वीरें अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जारी कीं. और दूसरी, देश भर के तमाम इलाकों से आईं उन तस्वीरों ने जिनमें बजरंग दल जैसे कुछ हिन्दू संगठनों के लोग कहीं चर्च के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं, कहीं सांता क्लॉज को मार-पीट रहे हैं या फिर क्रिसमस के मौके पर जबरन कुछ त्योहार मनाने की कोशिश कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री ने क्रिसमस के मौके पर चर्च में जाकर धार्मिक सहिष्णुता का परिचय दिया और शांति और प्रेम की कामना करते हुए ईसाइयों को शुभकामना भी दी. गंभीर मुद्रा में हाथ जोड़े उनकी तस्वीरों को पूरी दुनिया ने देखा. उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया के जरिए यह संदेश देने की भी कोशिश की कि इन तस्वीरों से साबित होता है कि प्रधानमंत्री सबको साथ लेकर चलते हैं.
लेकिन जिस वक्त प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली के कैथेड्रल में मुख्य बिशप से आशीर्वाद ले रहे थे, उसी वक्त और उससे पहले भी बजरंग दल के लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में चर्चों पर हमले कर रहे थे. कहीं सांता की टोपी उखाड़ी जा रही थी, कहीं सांता की ड्रेस बेचने वालों पर हमला किया जा रहा था तो कहीं चर्च में होने वाली प्रार्थनाओं को बाधित किया जा रहा था. देश भर में ईसाई विरोधी हिंसा के दर्जनों खबरें और तस्वीरें प्रसारित हुईं.
प्रधानमंत्री पिछले साल भी क्रिसमस के मौके पर दिल्ली के इसी चर्च में गए थे और उस साल भी देश के तमाम इलाकों में चर्चों के आस-पास यही सब हुआ था.
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धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता पर सवाल
चर्च में जाकर प्रधानमंत्री खुद भले ही भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और धार्मिक सहिष्णुता को दुनिया के सामने लाने की कोशिश कर रहे हों लेकिन वास्तव में दुनिया ने वो सब भी उतना ही देखा जो अन्य चर्चों के इर्द-गिर्द हो रहा था. यही नहीं, प्रधानमंत्री क्रिसमस के मौके पर दिल्ली के जिस कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्पशन गए थे, उसी कैथोलिक चर्च की पत्रिका ‘दीपिका' ने उनकी इस यात्रा और देश भर में चर्चों पर कथित हमलों को लेकर तीखे सवाल खड़े किए हैं.
पत्रिका के संपादकीय में कहा गया है कि ‘एक ओर हिंदू राष्ट्रवादी क्रिसमस की सजावट को नष्ट कर हिंसा कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री चर्च में प्रार्थना कर रहे थे. उनका चर्च जाकर प्रार्थना करना संदेह पैदा करता है.' संपादकीय में सवाल किया गया है कि क्या यह दौरा देश के नागरिकों के लिए था या फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक संदेश देने की कोशिश थी? यदि प्रधानमंत्री की मंशा वास्तव में देश के अल्पसंख्यकों के साथ खड़े होने की होती, तो हमलों की खुलकर निंदा की जाती और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नजर आती.'
ऐसा नहीं है कि चर्चों और ईसाइयों के खिलाफ कुछ हिन्दू संगठनों का गुस्सा क्रिसमस के मौके पर ही निकल रहा है बल्कि इस तरह की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं. विश्व हिंदू परिषद ने तो बाकायदा बयान जारी कर हिंदुओं से कहा है कि वे किसी भी तरह क्रिसमस न मनाएं. वीएचपी का दावा है कि वो हिंदुओं को सांस्कृतिक रूप से जाग्रत करने के लिए ऐसा करती है. लेकिन ईसाइयों पर और चर्चों पर हमले अक्सर धर्मांतरण के विरोध के नाम पर भी होते रहते हैं. कई राज्यों ने ऐसे कानून भी बना दिए हैं जिनके मुताबिक लालच देकर या जबरन धर्मांतरण को अपराध घोषित किया गया है.
इन कानूनों की आड़ में राह चलते किसी भी ईसाई पर हमला किया जा सकता है, किसी भी ईसाई के घर में घुसकर वहां हो रहे किसी भी घरेलू कार्यक्रम में मारपीट की जा सकती है और उसे रोका जा सकता है. सामूहिक प्रार्थनाओं पर भी अक्सर हमले कर दिए जाते हैं. और कई बार तो ऐसे मामलों में ईसाई समुदाय के लोग ही गिरफ्तार भी हो जाते हैं. मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की तमाम घटनाएं तो आए दिन होती ही रहती हैं.
सामाजिक असुरक्षा और कार्रवाई
दरअसल, पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़ी हिंसा, भेदभाव और नफरत भरे बयानों की घटनाएं अक्सर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती रही हैं. इन घटनाओं ने न केवल देश के भीतर सामाजिक असुरक्षा का माहौल पैदा किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं. हालांकि कुछ मामलों में फौरी तौर पर कार्रवाइयां भी होती हैं लेकिन ये कार्रवाइयां में ‘ऊंट के मुंह में जीरा' जैसी ही साबित होती हैं. ऐसे में एक बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं और दुनिया के सामने भारत की क्या छवि बना रहे हैं.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और सांस्कृतिक विषयों पर लिखने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर पंकज पाराशर कहते हैं कि दुनिया भर में भारत की छवि निश्चित तौर पर इन घटनाओं के चलते धूमिल होती है लेकिन उनके मुताबिक, ये सब घटनाएं क्षणिक हैं और भारत की सेक्युलर छवि और सामासिक संस्कृति पर इनका कोई बहुत असर नहीं पड़ेगा.
डीडब्ल्यू से बातचीत में डॉक्टर पाराशर कहते हैं, "दुनिया में इन घटनाओं का संदेश तो ठीक नहीं जा रहा है लेकिन इसके उलट सामाजिक सच्चाई ये भी है कि भारत में विभिन्न धार्मिक समुदाय एक-दूसरे के निकट भी आ रहे हैं. खासकर हिन्दू-मुस्लिम. हिन्दूवादी संगठनों का ये जो राजनीतिक उफान है, ये बहुत क्षणिक है. ये भारत को बांट नहीं पाएंगे. यहां सामासिक संस्कृति ही रहेगी. हमारे यहां धर्मों में भी एकरूपता नहीं है, बहुलतावादी समाज है. इसलिए तात्कालिक घटनाओं से बहुत ज्यादा खतरा नहीं है. बाहर के देशों में भी लोग जान रहे हैं कि यहां लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं.”
डॉक्टर पाराशर कहते हैं कि जमीनी स्तर पर देखें तो अभी भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच सामंजस्य बना हुआ है, खासकर गांवों में. वो कहते हैं कि अभी भी बहुसंख्यक हिन्दू कट्टरता के खिलाफ हैं, इसे नहीं पसंद करते हैं.
लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल
दरअसल, किसी भी लोकतांत्रिक समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहां बहुसंख्यक कितना सुरक्षित और आश्वस्त है, बल्कि इससे होती है कि अल्पसंख्यक कितना निडर और आजाद है. भारत जैसे बहुलतावादी देश में ‘अनेकता में एकता' कोई अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य स्थिति रही है. धर्म, भाषा, जाति और संस्कृति की अनेक धाराएं मिलकर जिस भारतीय समाज का निर्माण करती हैं, उसकी आत्मा संविधान में निहित समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय के मूल्यों से बनी है. ऐसे में जब अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाएं बढ़ती हैं, तो यह केवल कुछ समुदायों की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे लोकतंत्र के चरित्र पर सवाल खड़े कर देती हैं.
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पिछले कुछ सालों में लगातार ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें अपवाद कहकर टाला नहीं जा सकता, बल्कि उनके पीछे संगठित तौर पर एक खास विचारधारा काम कर रही है जिसे कहीं न कहीं सत्ता का समर्थन भी मिला है. अफवाहों के आधार पर भीड़ हिंसा हो, धार्मिक पहचान की वजह से लोगों पर हमले हों, धार्मिक जुलूसों के दौरान भड़कने वाली हिंसा हो या फिर पूजा स्थलों पर होने वाले हमले- ये सभी घटनाएं एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करती हैं, जिसे नजरअंदाज करना भारत की बहुलतावादी संस्कृति के लिए घातक साबित होगा.
वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार कहते हैं कि ऐसी घटनाएं इसलिए भी चिंताजनक हैं कि इन्हें लेकर सरकार और समाज की प्रतिक्रिया कैसी होती है. वो कहते हैं, "ऐसी घटनाओं पर अक्सर समाज बंटा रहता है. यहां तक कि समर्थन करने वाले सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में नजर आते हैं. यानी, समाज का एक वर्ग अल्पसंख्यकों पर हिंसा को गलत नहीं मानता, बल्कि उसका समर्थन करता दिखता है. यह स्थिति और खतरनाक है. इसके अलावा, जब हिंसा के बाद न्यायिक प्रक्रिया भी धीमी पड़ती दिखती है या फिर दोषियों पर कार्रवाई को लेकर संदेह बना रहता है, तो यह संदेश जाता है कि कानून का राज सभी के लिए समान नहीं है. ऐसे अनुभव अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं.”
वैश्विक छवि पर असर
ये घटनाएं भारत की वैश्विक छवि को भी प्रभावित करती हैं. क्योंकि दुनिया भारत को सिर्फ उसकी आर्थिक या रणनीतिक क्षमता से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक और लोकतांत्रिक आचरण से भी आंकती है. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, विदेशी मीडिया और कुछ सरकारी रिपोर्टों में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर कई बार चिंता जताई गई है. हम इन टिप्पणियों को भले ही पूर्वाग्रह ग्रस्त बताकर खारिज कर दें लेकिन दुनिया तो खारिज नहीं कर देगी. और शायद इसीलिए प्रधानमंत्री को भी चर्च की प्रार्थनासभा में हिस्सा लेकर दुनिया को यह बात बतानी पड़ती है.
डॉक्टर पंकज पाराशर कहते हैं, "भारत की पहचान जिन वजहों से है, उनसे उलट आप कुछ भी करेंगे तो आपकी वैश्विक स्वीकार्यता खत्म हो जाएगी. लेकिन मौजूदा सरकार की दिक्कत ये है कि वो ऐसे तत्वों को नजरअंदाज भी नहीं कर पा रही है क्योंकि ये उसके लिए वोट बटोरते हैं. लेकिन ‘हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और' पता लग ही जाते हैं, छिपते नहीं हैं.”
डॉक्टर पंकज कहते हैं कि यही वजह है कि भारत पड़ोसी देशों, खासकर बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उन्हें लेकर सख्त संदेश नहीं दे पा रहा है. वजह साफ है- इन आरोपों से खुद भी घिरे हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Jan 01, 2026 01:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

