हेट स्पीच: कानून से लगेगा नफरती भाषणों पर अंकुश?
भारत में हेट स्पीच यानी नफरती भाषण के बढ़ते मामलों के बीच इस पर अंकुश लगाने के लिए कर्नाटक सरकार की ओर से हाल में पारित कानून पर विवाद तेज हो रहा है.
भारत में हेट स्पीच यानी नफरती भाषण के बढ़ते मामलों के बीच इस पर अंकुश लगाने के लिए कर्नाटक सरकार की ओर से हाल में पारित कानून पर विवाद तेज हो रहा है. लेकिन क्या सिर्फ कानून बना कर इसे रोकना संभव है?कर्नाटक सरकार ने बीते सप्ताह हेट स्पीच पर अंकुश लगाने के लिए विधानसभा में भारी हंगामे के बीच कर्नाटक हेट स्पीच और हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025 पारित कर दिया. यह ऐसा कानून बनाने वाला देश का पहला राज्य बन गया है.
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इसके तहत पहली बार दोषी पाए जाने पर कम से कम एक साल और अधिकतम सात साल तक की जेल के साथ जुर्माने का प्रावधान है. पहले दोबारा दोषी पाए जाने वालों को दस साल तक की सजा का प्रावधान रखा गया था. लेकिन सरकार ने इसमें संशोधन करते हुए दोनों मामलों में अधिकतम सजा सात साल ही रखी है. ऐसे मामलों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है साफ है कि पुलिस दोषियों को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और उनको आसानी से जमानत भी नहीं मिलेगी. इस कानून में अदालतों को अपराध की गंभीरता के आधार पर पीड़ित लोगों को मुआवजा दिलाने का भी अधिकार दिया गया है.
कर्नाटक की तर्ज पर अब तेलंगाना सरकार ने भी ऐसा ही कानून बनने का एलान किया है.
कितने बढ़े हैं नफरती भाषण
देश में बीते एक दशक के दौरान हेट स्पीच के मामले तेजी से बढ़े हैं. वाशिंगटन स्थित शोध समूह इंडिया हेट लैब की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्ष 2024 के दौरान अल्पसंख्यकों के खिलाफ हेट स्पीच के मामले 74 प्रतिशत बढ़ कर 1185 तक पहुंच गए. इनमें से करीब 98.5 प्रतिशत नफरत भाषणों के निशाने पर मुस्लिम समुदाय के लोग रहे थे. खासकर आम चुनाव के दौरान ऐसे मामलों में उछाल आ गया था.
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इस कानून पर राजनीतिक टकराव लगातार तेज हो रहा है. कर्नाटक के गृह मंत्री डा. जी. परमेश्वर ने विधानसभा में इस विधेयक के समर्थन में दलील देते हुए कहा था, "पूर्वाग्रह से भरे नफरती बयानों के मामले बढ़ रहे थे और समाज पर इसका प्रभाव साफ नजर आने लगा था." उन्होंने बीती मई के सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया जिसमें उसने कहा था कि सांप्रदायिक द्वेष फैलाने या नफरती भाषण देने के प्रयासों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए.
लेकिन विपक्षी बीजेपी इसे कानून को खतरनाक बताते हुए इसका विरोध कर रही है. कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सदन में कहा कि इस कानून के तहत मिलने वाले असीमित अधिकार पुलिस अधिकारियों को 'हिटलर' की तरह तानाशाह बना देगा. पार्टी की दलील है कि भारतीय न्याय संहिता में ऐसे मामलों से निपटने के लिए पहले से ही धारा 196, धारा 299 और धारा 353 जैसे प्रावधान हैं. ऐसे में इस नए कानून की कोई जरूरत नहीं है. पार्टी ने इसे 'राजनीतिक बदले का हथियार' और वोटबैंक की राजनीति' बताया है.
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राज्य सरकार का दावा है कि भारत में पहले से मौजूद आपराधिक कानूनों में हेट स्पीच की कोई स्पष्ट और आधुनिक परिभाषा नहीं थी. मौजूदा कानून सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से बढ़ते नफरती भाषण और सामग्री पर अंकुश लगाने में बेअसर रहे हैं. समाज में तेजी से फैल रही नफरत को रोकने के लिए ही सरकार ने यह कानून बनाने का फैसला किया. सरकार ने लोगों को भरोसा देते हुए कहा है कि नफरती भाषण नहीं देने वालों को इस कानून से डरने की कोई जरूरत नहीं है. कांग्रेस की दलील है कि मौजूदा केंद्रीय कानूनों के तहत ऐसे मामलों में दोषियों को आसानी से राहत मिल जाती है.
कहीं कानून का स्वागत तो कहीं आशंका
सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं संगठनों ने कहा है कि कमजोर समुदाय के लोगों की रक्षा के लिए बनाए गए इस कानून को अभिव्यक्ति की आजादी का भी सम्मान करना चाहिए. इसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं होने और इसके तहत असीमित अधिकार मिलने की स्थिति में राजनीतिक विरोधियों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ इसके इस्तेमाल की आशंका बनी रहेगी.
सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए इसका स्वागत किया है. लेकिन साथ ही इसके इस्तेमाल में सतर्कता बरतने का भी अनुरोध किया है. ऐसे मामलों के खिलाफ अभियान चलाने वाले समूह कैंपेन अगेंस्ट हेट स्पीच ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को लिखे एक पत्र में कहा है कि इस कानून का राज्य के आम लोगों के जीवन पर गहरा असर पड़ेगा. इससे समाज में तेजी से फैल रही नफरती की बीमारी पर अंकुश लगाने में काफी हद तक मदद मिलेगी. इस पत्र में कानून में कुछ संशोधन करने का अनुरोध करते हुए कहा गया है कि नफरती बयानों और वैध असहमति के बीच स्पष्ट अंतर जरूरी है. इस कानून का मकसद लोगों की आवाज को दबाना नहीं बल्कि उनको नफरत से बचाना होना चाहिए.
महिला मानवाधिकार कार्यकर्ता एस. सुजाता रेड्डी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "इस कानून को बनाने के पीछे सरकार की मंशा तो ठीक है. लेकिन सवाल इसे जमीन स्तर पर लागू करने के तौर-तरीकों पर है. यह सावधानी बरतनी होगी कि पुलिस को असीमित ताकत देने वाला यह कानून कहीं राजनीतिक बदले का हथियार नहीं बन जाए."
एक अन्य कार्यकर्ता. डी. नागेश्वर राजू डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हेट स्पीच और अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा रेखा बेहद महीन है. ऐसे में इस कानून के इस्तेमाल के समय इस बात का ख्याल रखना होगा. लेकिन सरकार का यह कदम सराहनीय है. इसके कड़े प्रावधानों की वजह से हेट स्पीच के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है."
विश्लेषकों का कहना है कि इस कानून का कितना और कैसा असर होता है, इसका आकलन कम से कम एक साल बाद ही किया जा सकता है. लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लागू करने में पारदर्शिता बरतना और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देना जरूरी है.
(The above story first appeared on LatestLY on Dec 24, 2025 03:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

