Harish Rana Passes Away: पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) की कानूनी अनुमति पाने वाले देश के पहले मरीज हरीश राणा का AIIMS में निधन
गाजियाबाद के 36 वर्षीय हरीश राणा का एम्स (AIIMS) में निधन हो गया है. हरीश भारत के पहले ऐसे मरीज थे, जिन्हें एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' के तहत पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मिली थी.
Harish Rana Passes Away: भारत में 'इच्छा मृत्यु' (Euthanasia) की कानूनी बहस का चेहरा रहे 36 वर्षीय हरीश राणा (Harish Rana) का अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (All India Institute of Medical Sciences) (AIIMS) में निधन हो गया है. गाजियाबाद (Ghaziabad) के रहने वाले हरीश राणा पिछले साल तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे, जब उन्हें एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति के कारण देश में 'पैसिव यूथेनेशिया' (Passive Euthanasia) की कानूनी अनुमति पाने वाले पहले मरीज के रूप में मान्यता मिली थी. चिकित्सा अधिकारियों ने पुष्टि की है कि उनकी मृत्यु लंबी बीमारी से जुड़ी जटिलताओं के कारण हुई. यह भी पढ़ें: Harish Rana Euthanasia Case: दर्द से भरी 13 साल की जिंदगी के बाद हरीश राणा को मिली इच्छामृत्यु, मां की यादों ने कर दिया भावुक
एक दशक लंबा संघर्ष
हरीश राणा की चिकित्सा यात्रा एक दशक पहले शुरू हुई थी, जब एक गंभीर चोट के कारण वे 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में चले गए थे. इस स्थिति में उनके मस्तिष्क को गहरा नुकसान पहुँचा था और वे पूरी तरह से लाइफ-सपोर्ट सिस्टम और 24 घंटे की नर्सिंग देखभाल पर निर्भर थे. देश के कई प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में उपचार के बावजूद डॉक्टरों ने निष्कर्ष निकाला था कि उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय (Irreversible) है. वर्षों तक उनके परिवार ने अचेतन अवस्था में उन्हें देखा और इस दौरान भावनात्मक व आर्थिक बोझ का सामना किया.
ऐतिहासिक कानूनी फैसला
पिछले साल एक ऐतिहासिक फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी थी. अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि जिस मामले में नैदानिक रूप से सुधार की कोई उम्मीद न हो, वहां जीवन रक्षक उपचार जारी रखना मरीज की गरिमा के हित में नहीं है.
पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है किसी मरणासन्न मरीज के उपचार या जीवन रक्षक प्रणालियों (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटा लेना, ताकि उसकी मृत्यु की प्रक्रिया को सहज बनाया जा सके। यह 'एक्टिव यूथेनेशिया' से अलग है, जिसमें घातक रसायनों का उपयोग किया जाता है और जो भारत में अवैध है.
भारतीय न्यायशास्त्र पर प्रभाव
हरीश राणा का मामला 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित जटिल दिशा-निर्देशों को सफलतापूर्वक पार करने वाला पहला मामला था. शीर्ष अदालत ने 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी, लेकिन परिवारों के लिए इसके लिए कानूनी मंजूरी पाना बेहद कठिन था.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राणा के परिवार की सफल याचिका ने भविष्य के मामलों के लिए एक रोडमैप तैयार किया है. इसने 'मेडिकल बोर्ड' की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए मजबूर किया, जिसमें स्वतंत्र डॉक्टरों का एक पैनल यह सत्यापित करता है कि क्या मरीज वास्तव में ऐसी स्थिति में है जहाँ से वापसी संभव नहीं है. यह भी पढ़ें: Harish Rana Passive Euthanasia Case: कोमा में 13 साल से पड़े हरीश राणा केस में SC का ऐतिहासिक फैसला, देश में पहली बार मिली ‘इच्छामृत्यु’ की मंजूरी
'लिविंग विल' और चिकित्सा नैतिकता
हरीश राणा के निधन ने भारत में 'लिविंग विल' (Living Will) की आवश्यकता पर बहस को एक बार फिर से तेज कर दिया है. यह एक कानूनी दस्तावेज होता है जिसमें व्यक्ति यह स्पष्ट करता है कि यदि वह गंभीर बीमारी के कारण निर्णय लेने में असमर्थ हो, तो उसके साथ कैसा चिकित्सा व्यवहार किया जाए.
राणा की मृत्यु उनके परिवार के लिए एक लंबे व्यक्तिगत और कानूनी संघर्ष का अंत है, लेकिन उनका मामला भारतीय कानून के विकास में हमेशा याद रखा जाएगा, जो जीवन की पवित्रता और गरिमापूर्ण मृत्यु के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है.