FCRA Amendment Bill 2026: एफसीआरए संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति को भेज सकती है सरकार; विरोध के बाद बड़ा फैसला
विपक्षी दलों, नागरिक समूहों और अल्पसंख्यक संगठनों के कड़े विरोध के बाद केंद्र सरकार 'विदेश अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' को विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने पर विचार कर रही है.
नई दिल्ली: विपक्षी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज समूहों और अल्पसंख्यक संगठनों की बढ़ती चिंताओं के बीच केंद्र सरकार 'विदेश अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' (FCRA Amendment Bill, 2026) को गहन समीक्षा के लिए संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee) (JPC) के पास भेजने पर विचार कर रही है. सरकारी सूत्रों के अनुसार, विधेयक के विभिन्न प्रावधानों को लेकर उठ रहे सवालों के बाद यह कदम उठाया जा सकता है.
यह विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य विदेशी चंदा (विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन करना है. इस कानून के तहत देश में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), व्यक्तियों और कंपनियों द्वारा प्राप्त होने वाले विदेशी अनुदान को विनियमित किया जाता है. यह भी पढ़ें: FCRA Amendment Bill 2026: एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 क्या है? जानें मुख्य प्रावधान, बदलाव और विरोध के कारण
विवाद का मुख्य बिंदु: 'नामित प्राधिकारी' (Designated Authority) का गठन
विधेयक के उस प्रावधान को लेकर सबसे अधिक विरोध दर्ज कराया जा रहा है, जिसके तहत राज्य-अधिसूचित 'नामित प्राधिकारी' (Designated Authority) के गठन का प्रस्ताव है.
नया प्रावधान लागू होने पर:
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यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द होता है, आत्मसमर्पण (Surrender) किया जाता है या नवीनीकरण के बिना समाप्त (Expiries) हो जाता है, तो उसकी विदेशी निधि और भौतिक संपत्तियां अस्थायी रूप से इस प्राधिकारी के पास चली जाएंगी.
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यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर पंजीकरण बहाल नहीं होता है, तो वह संपत्ति स्थायी रूप से सरकारी निकाय के अधीन हस्तांतरित की जा सकती है.
आलोचकों और विपक्षी नेताओं का तर्क है कि प्रशासनिक देरी या मामूली तकनीकी कमियों के कारण संस्थाओं को अपनी संपत्तियों से हाथ धोना पड़ सकता है.
अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी प्रतिनिधिमंडलों की चिंताएं
डीएमके (DMK) सांसद पी. विल्सन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें आगाह किया गया कि धारा 14B जैसे प्रावधानों से प्रमाणपत्र तुरंत समाप्त हो सकते हैं और संपत्तियों पर तत्काल कब्जा हो सकता है.
इसके अलावा, ईसाई धर्मगुरुओं और मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी गृह मंत्री से मिलकर पूजा स्थलों, धार्मिक संस्थानों और शैक्षणिक धर्मार्थ ट्रस्टों पर पड़ने वाले असर को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त की थीं.
सरकार की सफाई और सुरक्षात्मक उपाय
बढ़ती चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित विधेयक में आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं.
सरकार का कहना है कि नामित प्राधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखे. इसके अलावा न्यायिक अपील के लिए एक औपचारिक तंत्र प्रदान किया गया है और नियमों के उल्लंघन पर अधिकतम कारावास की सजा को 5 साल से घटाकर 1 साल करने का प्रस्ताव है. राज्य एजेंसियों को एफसीआरए जांच शुरू करने से पहले केंद्र से पूर्व अनुमति लेना भी अनिवार्य किया गया है.
गृह मंत्री के साथ बैठकों के बाद प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया गया था कि यह कानून भूतलक्षी (Retrospective) प्रभाव से लागू नहीं होगा. हालांकि, 13 अगस्त को मानसून सत्र समाप्त होने से पहले इसे जेपीसी (JPC) को भेजे जाने से सांसदों को प्रभावित पक्षों के साथ परामर्श करने और विधेयक के प्रत्येक बिंदु पर विस्तृत समीक्षा करने का अवसर मिलेगा.