Ganeshotsav POP Idol Immersion Row: गणपति की पीओपी प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर विवाद फिर गरमाया, 1 जुलाई को बॉम्बे HC में सुनवाई

गणेशोत्सव 2026 से पहले प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बनी मूर्तियों के विसर्जन को लेकर विवाद एक बार फिर गरमा गया है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के रुख के खिलाफ पर्यावरणविदों द्वारा दायर की गई संशोधित याचिका पर बॉम्बे हाई कोर्ट 1 जुलाई को सुनवाई करेगा.

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 Ganeshotsav POP Idol Immersion Row: महाराष्ट्र में आगामी गणेशोत्सव 2026 से पहले प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बनी मूर्तियों के प्राकृतिक जल निकायों में विसर्जन को लेकर कानूनी और पर्यावरणीय विवाद एक बार फिर खड़ा हो गया है. बॉम्बे हाई कोर्ट पिछले साल दिए गए अपने अंतरिम आदेश की समय सीमा समाप्त होने के बाद अब इस मामले पर दोबारा विचार करने जा रहा है. न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ इस संबंध में दायर एक संशोधित जनहित याचिका पर 1 जुलाई को सुनवाई करेगी.

क्या था बॉम्बे हाई कोर्ट का पिछला अंतरिम आदेश?

पिछले साल 24 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी किया था. इस आदेश के तहत केवल 6 फीट से अधिक ऊंचाई वाली पीओपी मूर्तियों को कुछ शर्तों के साथ प्राकृतिक जल स्रोतों में विसर्जित करने की अनुमति दी गई थी.   यह भी पढ़े:  Ganesh Chaturthi 2025 Invitation Card in Marathi: गणेश चतुर्थी पर ये मराठी ई- ग्रीटिंग कार्ड अपने प्रियजनों को भेजकर गणेशोत्सव में करें आमंत्रित

हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि यह राहत केवल मार्च 2026 तक आने वाले त्योहारों तक ही सीमित रहेगी. समय सीमा समाप्त होने के बाद अब आगामी गणेशोत्सव के लिए यह मुद्दा नए सिरे से कानूनी जांच के दायरे में आ गया है.

सीपीसीबी के रुख पर पर्यावरणविदों ने उठाए सवाल

पर्यावरण कार्यकर्ता रोहित जोशी और शाडू माटी (पारंपरिक मिट्टी) के मूर्तिकारों ने अधिवक्ता रोनिता भट्टाचार्य के माध्यम से अदालत में एक संशोधित याचिका दायर की है. इस याचिका में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की बदली हुई भूमिका को चुनौती दी गई है.

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सीपीसीबी के 12 मई 2020 के दिशा-निर्देशों के अनुसार पीओपी मूर्तियों पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया गया था. लेकिन बाद में बोर्ड ने अदालत में मौखिक और हलफनामे के जरिए अपनी बात बदलते हुए कहा कि ये केवल 'दिशानिर्देश' के रूप में हैं, जो वैधानिक रूप से सही नहीं है.

देश भर में असमंजस की स्थिति

संशोधित याचिका में कहा गया है कि सीपीसीबी के इस विरोधाभासी रुख के कारण न केवल महाराष्ट्र बल्कि देश के कई अन्य राज्यों में भी असमंजस की स्थिति पैदा हो रही है. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की जिम्मेदारी केंद्रीय नियमों को कड़ाई से लागू करने की होती है, लेकिन मौजूदा रुख से पर्यावरण नियमों का उल्लंघन हो रहा है.

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि महाराष्ट्र सरकार की 1 अगस्त 2025 की नीति को रद्द किया जाए और सीपीसीबी को 2020 के प्रतिबंधात्मक दिशा-निर्देशों को अनिवार्य रूप से लागू करने का आदेश दिया जाए. इस मामले में 1 जुलाई को होने वाली अदालती कार्यवाही से तय होगा कि इस साल गणेशोत्सव में पीओपी मूर्तियों के विसर्जन को लेकर क्या दिशा-निर्देश रहेंगे.

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