अत्यधिक गर्मी का संकट: देश में हर 10 में से 7 स्कूली बच्चों को इस समर मिस करनी पड़ीं क्लासेस, 'क्राई' की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा
बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन 'क्राई' (CRY) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इस साल मई और जून के बीच भीषण गर्मी और लू (हीटवेव) के कारण भारत में लगभग 68% बच्चों को स्कूल या अपनी दैनिक गतिविधियां छोड़नी पड़ीं.
नई दिल्ली: भारत में इस साल मई और जून के महीनों में पड़ी भीषण गर्मी और बार-बार चली लू (हीटवेव) के कारण देश की स्कूली शिक्षा और बच्चों के स्वास्थ्य पर बेहद गंभीर असर पड़ा है. बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन 'क्राई' (CRY) द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, देश के लगभग 70 प्रतिशत (हर 10 में से 7) स्कूली बच्चों को अत्यधिक तापमान के कारण अपनी क्लासेस या नियमित दैनिक गतिविधियां छोड़नी पड़ीं. "फीलिंग द हीट: चिल्ड्रन्स वॉयसेस ऑन हीट, वेल-बीइंग एंड लर्निंग इन इंडिया" शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में देश के 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 10 से 17 वर्ष की आयु के 3,096 स्कूली बच्चों के अनुभवों को शामिल किया गया है, जिसके परिणाम बेहद चिंताजनक हैं. यह भी पढ़ें: El Niño Impact: अल-नीनो का बढ़ता असर, रिकॉर्डतोड़ गर्मी और गंभीर जलवायु चुनौतियों से जूझ रहा यूरोप
पढ़ाई और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पर बुरा असर
रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 88 प्रतिशत बच्चों ने माना कि इस साल की गर्मी पिछले सालों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर थी. वहीं, 76 प्रतिशत बच्चों ने शिकायत की कि अत्यधिक गर्मी ने उनकी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित (फोकस) करने की क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया.
लगभग 47 प्रतिशत बच्चों ने दोपहर के समय को दिन का सबसे कठिन हिस्सा बताया, जबकि 45 प्रतिशत से अधिक बच्चों ने कहा कि स्कूल के घंटे विशेष रूप से असहज और थका देने वाले थे. याद दिला दें कि साल 2026 की गर्मियों में भारत के कई राज्यों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था, जिसके चलते कई जिला प्रशासनों को स्कूलों के समय में बदलाव करना पड़ा था या कुछ समय के लिए कक्षाएं स्थगित करनी पड़ी थीं.
बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रही भारी मार
तीव्र गर्मी के दौर ने बच्चों पर शारीरिक रूप से भी भारी बोझ डाला है. रिपोर्ट में बच्चों द्वारा अनुभव की गई स्वास्थ्य समस्याओं के निम्नलिखित आंकड़े सामने आए हैं:
- 63 प्रतिशत बच्चों ने अत्यधिक गर्मी के दौरान डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) की शिकायत की.
- 51 प्रतिशत बच्चे भीषण धूप और लू के कारण सिरदर्द से पीड़ित रहे.
- 44 प्रतिशत बच्चों ने अत्यधिक थकान और सुस्ती महसूस होने की बात कही.
इसके अलावा, बुनियादी सुविधाओं की कमी ने इस संकट को और बढ़ा दिया. लगभग 53 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि उन्हें घर पर लगातार बिजली कटौती (पावर कट) या अत्यधिक गर्म कमरों में रहना पड़ा, जबकि लगभग 30 प्रतिशत बच्चों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ा. झारखंड की एक 17 वर्षीय छात्रा ने सर्वेक्षकों को बताया, "अत्यधिक तापमान के कारण स्कूल में ध्यान लगाना मुश्किल हो गया था. क्लासरूम बहुत गर्म था और मैं सामान्य से बहुत पहले थक जाती थी."
गरीब और मजदूर वर्ग के परिवारों पर दोहरी मार
क्राई की यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि अत्यधिक गर्मी का प्रभाव सभी आय समूहों पर एक समान नहीं है. दैनिक वेतन भोगी या शारीरिक श्रम करने वाले गरीब परिवारों के 71 प्रतिशत बच्चों ने गर्मी से गंभीर संकट झेलने की बात कही, जबकि संपन्न परिवारों में यह आंकड़ा 46 प्रतिशत था.
इसके साथ ही, 59 प्रतिशत बच्चों ने महसूस किया कि अत्यधिक गर्मी ने उनके माता-पिता के लिए काम करना बहुत कठिन बना दिया, जिससे उनके व्यवहार में बदलाव (चिड़चिड़ापन या तनाव) आया और इसका सीधा असर घर के माहौल पर पड़ा.
लगातार गर्म हो रहे दशक का बैकग्राउंड
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वार्षिक जलवायु वक्तव्य के अनुसार, पिछला दशक (2016 से 2025) इतिहास का सबसे गर्म दशक रिकॉर्ड किया गया है, जिसमें मौसम विज्ञान के इतिहास के 15 सबसे गर्म वर्षों में से 10 वर्ष इसी अवधि के भीतर आए हैं.
मामले पर चिंता व्यक्त करते हुए क्राई (CRY) की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) पूजा मारवाहा ने कहा, "तापमान के रिकॉर्ड हमें केवल यह बताते हैं कि मौसम कितना गर्म हो रहा है, लेकिन बच्चे हमें यह बताते हैं कि यह गर्मी उनके जीवन, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और समग्र कल्याण को किस तरह तहस-नहस कर रही है." विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इस संकट से निपटने के लिए स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को हीट-रेसिस्टेंट (गर्मी अनुकूल) बनाना अब अनिवार्य हो गया है.