दिल्ली रेस क्लब बेदखली मामला: हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने हटाई कार्यवाही पर रोक, कहा- एस्टेट ऑफिसर जारी रख सकते हैं प्रक्रिया
दिल्ली उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने दिल्ली रेस क्लब की बेदखली कार्यवाही पर लगी अंतरिम रोक को हटा दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार के पास सार्वजनिक परिसरों से अनधिकृत कब्जाधारियों को हटाने का वैधानिक अधिकार है. इस फैसले के बाद अब एस्टेट ऑफिसर 'पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट, 1971' के तहत रेस क्लब के खिलाफ बेदखली की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकेंगे.
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नई दिल्ली, 26 मई: दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने दिल्ली रेस क्लब (Delhi Race Club) के खिलाफ चल रही बेदखली की कार्यवाही को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट की एक खंडपीठ (Division Bench) ने उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया है जिसने एस्टेट ऑफिसर (संपदा अधिकारी) को रेस क्लब के खिलाफ कार्रवाई करने से रोक दिया था. अदालत ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार के पास 'पब्लिक प्रेमिसेस (इवेक्शन ऑफ अनऑथराइज्ड ऑक्यूपेंट्स) एक्ट, 1971' के तहत किसी भी अनधिकृत कब्जाधारी के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही शुरू करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार है. चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि सिंगल जज का पिछला आदेश स्थापित कानूनी सिद्धांतों की समीक्षा के बिना पारित किया गया था, इसलिए उसमें हस्तक्षेप करना आवश्यक था. यह भी पढ़ें: दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला: 'एग्रेसिव सेक्स' के दौरान मौत के आरोपी को मिली जमानत; सबूतों के अभाव को बताया मुख्य आधार
सिंगल जज के आदेश में थीं कमियां, नियमों के तहत अपील को माना जायज
डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि सिंगल जज ने बीती 24 अप्रैल 2026 को रेस क्लब को कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) पर जो अंतरिम राहत दी थी, वह प्रथम दृष्टया मामला (Prima Facie Case), सुविधा का संतुलन (Balance of Convenience) और अपूरणीय क्षति जैसे अनिवार्य न्यायिक सिद्धांतों पर कोई निष्कर्ष दर्ज किए बिना दी गई थी. अदालत ने माना कि एस्टेट ऑफिसर की कार्यवाही पर रोक लगाना सीधे तौर पर सरकार के वैधानिक अधिकारों को प्रभावित करता है, इसलिए इसके खिलाफ खंडपीठ में अपील पूरी तरह से विचारणीय है.
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा और सीजीएससी आशीष के. दीक्षित ने दलील दी थी कि कारण बताओ नोटिस को चुनौती देने वाली रिट याचिका खुद सुनवाई योग्य नहीं थी. सरकार का रुख था कि रेस क्लब को अपनी सभी आपत्तियां एस्टेट ऑफिसर के समक्ष 'पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट' की धारा 4 के तहत चल रही कार्यवाही में ही उठानी चाहिए.
1994 में ही खत्म हो चुकी है रेस क्लब की लीज
अदालत ने मामले की पृष्ठभूमि और तथ्यों पर गौर करते हुए नोट किया कि दिल्ली रेस क्लब को वर्ष 1926 में कुल 84.484 एकड़ भूमि की लीज (पट्टा) दी गई थी, जो 31 दिसंबर 1994 को समाप्त हो चुकी है। इसके बाद सरकार द्वारा इस लीज का कोई विस्तार या नवीनीकरण (Renewal) नहीं किया गया.
पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट की धारा 2(g) के तहत 'अनधिकृत कब्जे' की परिभाषा का हवाला देते हुए खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही शुरुआत में किसी व्यक्ति या संस्था का कब्जा पूरी तरह से वैध रहा हो, लेकिन लीज की अवधि समाप्त होते ही वह कब्जा स्वतः ही अनधिकृत (Unauthorised) की श्रेणी में आ जाता है.
पुराने मुकदमों का हवाला और रेस क्लब की दलीलें
यह पूरा विवाद तब दोबारा भड़का जब एस्टेट ऑफिसर ने 17 अप्रैल 2026 को दिल्ली रेस क्लब को एक नया कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि उनके खिलाफ बेदखली का आदेश क्यों न पारित किया जाए. रेस क्लब ने इसे सिंगल जज के सामने चुनौती दी थी, जिन्होंने सुनवाई की अगली तारीख तक कार्यवाही स्थगित रखने को कहा था.
खंडपीठ के सामने रेस क्लब की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुहैल दत्त, अजहर आलम और संकल्प गोस्वामी पेश हुए. उन्होंने दलील दी कि साल 1999 में भी ऐसा ही एक नोटिस जारी हुआ था जिसे हाई कोर्ट ने 2012 में रद्द कर दिया था, इसलिए यह नया नोटिस कानूनी रूप से गलत है. हालांकि, डिवीजन बेंच ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि 2012 के फैसले में केवल पुराने नोटिस को तकनीकी आधार पर रद्द किया गया था और सरकार को लीज नवीनीकरण के आवेदन पर विचार करने को कहा गया था. चूंकि सरकार ने बाद में नवीनीकरण के उस अनुरोध को आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया, इसलिए अब नया नोटिस जारी करना किसी भी तरह से कानून का दुरुपयोग नहीं है.
अंतरिम राहत यांत्रिक तरीके से नहीं दी जा सकती: हाई कोर्ट
उच्च न्यायालय ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि रिट याचिकाओं में भी अंतरिम राहत यांत्रिक तरीके (Mechanically) से नहीं दी जा सकती। अदालतों को निषेधाज्ञा (Injunction) जारी करने से पहले स्थापित न्यायिक नजीरों को देखना अनिवार्य है.
सुप्रीम कोर्ट के 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम इरा एजुकेशनल ट्रस्ट' और 'देवराज बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामलों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि सिंगल जज ने रोक लगाने से पहले आवश्यक न्यायिक कसरत नहीं की थी. अदालत ने स्पष्ट किया कि रेस क्लब के पास अभी भी एस्टेट ऑफिसर के समक्ष अपनी बात और आपत्तियां रखने के "सारे और पर्याप्त अवसर" मौजूद हैं, इसलिए बेदखली की इस प्रशासनिक प्रक्रिया को बीच में रोकना सही नहीं है.
(The above story first appeared on LatestLY on May 26, 2026 03:18 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

