दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने रेस्तरां और होटलों की बिलिंग (Billing of Restaurants and Hotels) पर सख्त सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने कहा कि जब कोई होटल या रेस्तरां अपने यहां खाने-पीने की चीज़ों को एमआरपी (Maximum Retail Price) से ज्यादा दाम पर बेचता है और यह कहकर वसूलता है कि यहां का माहौल, अनुभव और सुविधाएं अलग हैं, तो फिर अलग से सर्विस चार्ज (Service Charge) क्यों लिया जा रहा है?
कोर्ट का सवाल – पारदर्शिता कहां है?
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच ने कहा कि अगर आप ₹20 की पानी की बोतल ₹100 में बेच रहे हैं, तो उसमें पहले ही “अनुभव और माहौल” का खर्च शामिल है. ऐसे में ग्राहक से अलग से सर्विस चार्ज लेना कहीं न कहीं अनुचित लगता है.
कानून क्या कहता है?
कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट के (Legal Metrology Act) तहत कोई भी सामान उसकी एमआरपी से ज्यादा में बेचना गलत है. मतलब, अगर बोतल पर ₹20 लिखा है, तो आप ₹100 में बेच ही नहीं सकते. फिर भी अगर कोई रेस्तरां कहता है कि माहौल या एक्सपीरियंस के लिए ज्यादा पैसा चाहिए, तो उसे बिल में साफ-साफ लिखना चाहिए, ताकि ग्राहक को धोखा न लगे.
सर्विस चार्ज पर पुराना फैसला
इससे पहले मार्च 2025 में एकल बेंच ने कहा था कि सर्विस चार्ज अनिवार्य (Mandatory) नहीं हो सकता, यानी ग्राहक चाहे तो दे, चाहे तो न दे. उसे जबरदस्ती वसूला नहीं जा सकता. इस फैसले को रेस्तरां संघ ने चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने अब साफ कर दिया है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाएगा.
अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2025 को होगी. तब तक कोर्ट ने रेस्तरां से साफ-साफ जवाब मांगा है कि आखिर इस तरह से ग्राहकों से ज्यादा पैसा वसूलना (Charging More Money From Customers) किस कानून के तहत सही है.
क्यों जरूरी है यह फैसला?
-
ग्राहकों को बिल में पूरी पारदर्शिता मिलेगी.
-
रेस्तरां मनमानी तरीके से एमआरपी से ज्यादा दाम और अलग से चार्ज नहीं वसूल पाएंगे.
-
उपभोक्ता अधिकार (Consumer Rights) मज़बूत होंगे.
दिल्ली हाईकोर्ट ने रेस्तरां से साफ-साफ कहा है – “या तो कीमत में ही सब कुछ जोड़ो, या फिर अलग-अलग करके ग्राहकों को परेशान मत करो."