Chemotherapy To Get Costlier? कीमोथेरेपी हो सकती है महंगी? केंद्र ने कैंसर की प्रमुख दवाओं की कीमत बढ़ाने की दी मंजूरी
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Chemotherapy To Get Costlier? भारत में कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों के लिए कीमोथेरेपी का खर्च बढ़ सकता है. केंद्र सरकार ने बाजार में जीवन रक्षक दवाओं की भारी किल्लत को देखते हुए दो प्रमुख और शुरुआती स्तर (फर्स्ट-लाइन) की कीमोथेरेपी दवाओं—'सिस्प्लैटिन' (Cisplatin) और 'कार्बोप्लेटिन' (Carboplatin)—की कीमतों में बढ़ोतरी को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है. सरकार का यह कदम देश के प्रमुख कैंसर अस्पतालों द्वारा जताई गई चिंताओं के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि ये महत्वपूर्ण दवाएं बाजार से लगातार गायब हो रही हैं.

कीमतों में बढ़ोतरी के लिए 'विशेष कानून' का इस्तेमाल

फार्मास्युटिकल विभाग (DoP) द्वारा राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) को भेजे गए एक आधिकारिक संचार के अनुसार, केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री ने ड्रग प्राइस Control ऑर्डर (DPCO) 2013 के 'पैरा 19' को लागू करने की मंजूरी दी है. यह भी भी पढ़े: Pharmacy Strike Today: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर दवाओं की बिक्री के विरोध में AIOCD का आज देशव्यापी हड़ताल का आह्वान, मेडिसिन की हो सकती है किल्लत

यह एक असाधारण कानूनी प्रावधान है, जिसका उपयोग सरकार केवल बेहद आपातकालीन स्थितियों में करती है. इसके तहत आवश्यक दवाओं की बाजार में निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए तय मानक कीमतों से परे जाकर बदलाव करने की छूट मिलती है.

क्यों बढ़ाई जा रही हैं दवा की कीमतें?

दवा निर्माता कंपनियों ने सरकार के सामने दलील दी थी कि इन दवाओं को बनाने की लागत अब व्यावहारिक नहीं रह गई है. कंपनियों के अनुसार, दवाओं को तैयार करने वाले कच्चे माल यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) की कीमतों में भारी उछाल आया है. इसके साथ ही उत्पादन लागत में वृद्धि और विदेशी मुद्रा दरों में उतार-चढ़ाव के कारण वर्तमान तय कीमतों पर इन दवाओं का निर्माण जारी रखना घाटे का सौदा साबित हो रहा था.

इस संबंध में गठित अंतर-मंत्रालयी समिति (IMC) ने कंपनियों द्वारा भेजे गए 82 प्रस्तावों की समीक्षा की. गहन जांच के बाद समिति ने केवल चार दवाओं के दामों में संशोधन की सिफारिश की, जिनमें एक कार्बोप्लेटिन इंजेक्शन, एक सिस्प्लैटिन इंजेक्शन और दो एंटी-टिटनस इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन शामिल हैं.

टाटा मेमोरियल अस्पताल ने जताई थी चिंता

कैंसर दवाओं की कमी का यह मुद्दा तब गंभीर हुआ जब मुंबई के प्रसिद्ध टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल सहित कई बड़े चिकित्सा संस्थानों ने इसके उत्पादन में आ रही गिरावट पर चिंता जताई. डॉक्टरों ने रिपोर्ट किया था कि प्लैटिनम-आधारित इन कीमोथेरेपी दवाओं की कमी के कारण मरीजों के इलाज के शेड्यूल में देरी हो रही थी. कई मामलों में डॉक्टरों को मजबूरन अधिक महंगी या कम प्रभावी वैकल्पिक दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा था, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से चिंताजनक था.

कितना बढ़ सकता है दवाओं का दाम?

सरकार ने अभी तक अंतिम संशोधित कीमतों की घोषणा नहीं की है. फार्मास्युटिकल विभाग ने एनपीपीए (NPPA) को निर्देश दिया है कि वह कच्चे माल और वास्तविक उत्पादन खर्च का मूल्यांकन करके ही नया मूल्य तय करे.

समिति ने एक मार्गदर्शक सुझाव के रूप में पिछली तय कीमत से प्रति वर्ष 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की बात कही है, जो अधिकतम 50 प्रतिशत तक हो सकती है. हालांकि, अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अंतिम मूल्य वृद्धि किसी निश्चित प्रतिशत के बजाय केवल वास्तविक लागत में हुई बढ़ोतरी के आधार पर ही तय की जाएगी.

मरीजों और उद्योग पर इसका प्रभाव

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से मरीजों की जेब पर तात्कालिक बोझ जरूर बढ़ेगा, लेकिन इससे दवाओं की भारी किल्लत से जूझ रहे अस्पतालों को बड़ी राहत मिलेगी. कम विनियमित कीमतों और उच्च लागत के कारण कई कंपनियों ने इसका उत्पादन बंद या कम कर दिया था. अब कीमतों में संशोधन की अनुमति मिलने से दवा निर्माताओं को उत्पादन बढ़ाने और बाजार में आपूर्ति को स्थिर करने का वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा. आने वाले दिनों में एनपीपीए के अंतिम फैसले पर मरीजों और अस्पतालों की नजरें टिकी रहेंगी.