Violent Sex Case: क्या मैरिटल रेप छूट के बावजूद हिंसक यौन संबंधों के लिए पतियों पर चल सकता है मुकदमा? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मैरिटल रेप (वैवाहिक दुष्कर्म) को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने वाले कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के बीच एक नए और महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर विचार करने की सहमति जताई है. अदालत इस बात की जांच करेगी कि क्या इस छूट के बावजूद हिंसक और अमानवीय यौन कृत्यों के लिए पतियों पर अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं.

Supreme Court (Photo Credits: File Photo)

नई दिल्ली: देश में मैरिटल रेप (वैवाहिक दुष्कर्म) (Marrital Rape) को अपराध की श्रेणी में शामिल करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई एक नए और बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है. अदालत ने उस कानूनी सवाल की समीक्षा करने पर सहमति जताई है, जिसके तहत यह तय किया जाएगा कि क्या कानून में मिली छूट के बावजूद, एक पति द्वारा अपनी पत्नी को हिंसक, अप्राकृतिक या अन्य आक्रामक यौन कृत्यों (Violent Sex) के जरिए शारीरिक चोट और मानसिक आघात पहुंचाने के लिए अन्य दंडात्मक धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहाना की विशेष पीठ ने इस मुद्दे को मुख्य याचिकाओं के साथ शामिल करते हुए इस पर व्यापक कानूनी बहस करने का फैसला किया है. यह भी पढ़ें: Ahmedabad: शादी के 27 साल बाद कारोबारी पति ने लगाया पत्नी के अफेयर का आरोप, घर में छुपाकर लगाए रिकॉर्डर; कोर्ट ने दिए साइबर जांच के आदेश

एनजीओ की दलील: दुष्कर्म न सही, पर अन्य आपराधिक धाराएं तो लागू होंगी

सुप्रीम कोर्ट में गैर-सरकारी संगठन (NGO) 'रेड डॉट फाउंडेशन' की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. एस. नप्पिनाई ने पीठ के समक्ष एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रखा. उन्होंने दलील दी कि भले ही आईपीसी (IPC) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के मौजूदा प्रावधान पति को 'दुष्कर्म' (Rape) के आरोप से सुरक्षा प्रदान करते हैं, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि वे पत्नी के साथ किसी भी प्रकार की हिंसा करने के लिए स्वतंत्र हैं.

वरिष्ठ वकील ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पति अपनी पत्नी को यौन क्रिया के दौरान शारीरिक नुकसान पहुंचाता है, तो उस पर भारतीय दंड कानून की अन्य धाराओं (जैसे गंभीर चोट पहुंचाना या प्रताड़ित करना) के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए. उन्होंने जस्टिस वर्मा समिति की सिफारिशों का हवाला देते हुए कहा कि निर्भया मामले के बाद किए गए 2013 के संशोधन में इस अपवाद के दायरे को और चौड़ा कर दिया गया था, जिससे पतियों को हर तरह के आक्रामक यौन कृत्यों में एकतरफा सुरक्षा मिल गई.

9 सितंबर से शुरू होगी अंतिम सुनवाई; कोर्ट के सामने बड़ी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की इस पीठ ने घोषणा की है कि वह मैरिटल रेप से जुड़ी सभी याचिकाओं पर 9 सितंबर 2026 से अंतिम सुनवाई (Final Hearing) शुरू करेगी.

अदालत के सामने मुख्य कानूनी चुनौती यह तय करना है कि क्या वह आईपीसी की धारा 375(2) और बीएनएस की धारा 63 के तहत दिए गए इस 'वैवाहिक अपवाद' को पूरी तरह से असंवैधानिक घोषित कर सकती है. तकनीकी रूप से, यदि अदालत इस अपवाद को हटाती है, तो क्या इसे न्यायपालिका द्वारा एक नया अपराध (New Offence) बनाने के रूप में देखा जाएगा, जो कि आमतौर पर संसद (विधायिका) के अधिकार क्षेत्र में आता है? अदालत इसी बारीक कानूनी रेखा की पड़ताल करेगी.

क्या है कानून का मौजूदा प्रावधान?

भारतीय दंड संहिता (IPC) के पुराने नियमों के अनुसार, यदि पत्नी की उम्र 15 वर्ष या उससे अधिक है, तो पति द्वारा उसकी सहमति के बिना बनाया गया शारीरिक संबंध दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता था. साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में इस आयु सीमा को बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया था.

अब देश में लागू नई आपराधिक संहिता यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 में भी इसी 18 वर्ष की सीमा को स्पष्ट रूप से अपनाया गया है. यानी, वर्तमान कानून के तहत यदि पत्नी बालिग (18+) है, तो पति के खिलाफ जबरन शारीरिक संबंध बनाने पर भी दुष्कर्म का मामला दर्ज नहीं किया जा सकता.

केंद्र सरकार का रुख: विवाह केवल यौन संबंधों पर आधारित नहीं

इस पूरे मामले में केंद्र सरकार शुरू से ही मैरिटल रेप को पूरी तरह से अपराध घोषित करने का विरोध करती रही है. सरकार का तर्क है कि विवाह भारत में एक अनूठा और पवित्र सामाजिक रिश्ता है, जो केवल यौन संबंधों पर केंद्रित नहीं होता है.

सरकार ने अदालत में हलफनामा देकर कहा था कि संसद ने सोच-समझकर इस अपवाद को कानून में बनाए रखा है और वैवाहिक संबंधों को सीधे दुष्कर्म के चश्मे से देखना अनुचित होगा. हालांकि, इसके साथ ही केंद्र ने यह भी स्वीकार किया है कि किसी भी पति को अपनी पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने या उसे चोट पहुंचाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सितंबर में होने वाली इस सुनवाई में देश की सर्वोच्च अदालत इस जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दे पर क्या अंतिम निर्णय लेती है.

Share Now