रक्षाबंधन 2025: राखी बांधने के लिए 14 साल से इंतजार कर रही बहन! पाकिस्तानी जेल में बंद भाई की कलाई आज भी है सूनी
मध्य प्रदेश के बालाघाट की एक बहन संघमित्रा 14 साल से अपने भाई को राखी बांधने का इंतजार कर रही है. उसका भाई पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद है, और डाक सेवा बंद होने के कारण वह इस रक्षाबंधन भी उसे राखी नहीं भेज सकती. यह परिवार सरकार से भाई की रिहाई की गुहार लगा रहा है ताकि उनका त्योहार फिर से खुशियों भरा हो सके.
बालाघाट, मध्य प्रदेश: रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है, लेकिन मध्य प्रदेश के बालाघाट में रहने वाली संघमित्रा खोबरागड़े के लिए यह दिन हर साल आंखों में आंसू और एक लंबा इंतजार लेकर आता है. पिछले 14 सालों से, वह अपने भाई प्रसन्नजीत रंगारी को राखी बांधने का सपना देख रही हैं, जो पाकिस्तान की कोट लखपत सेंट्रल जेल में कैद हैं.
इस साल भी संघमित्रा की राखी अपने भाई की कलाई तक नहीं पहुंच पाएगी. उन्होंने अपने भाई के लिए एक बहुत ही भावुक चिट्ठी लिखी है, लेकिन भारत से पाकिस्तान के लिए डाक और कूरियर सेवाएं बंद होने की वजह से उनका यह संदेश उन तक नहीं पहुंच सकता. अपनी चिट्ठी में वह लिखती हैं:
"भाई, रक्षाबंधन पर तुम्हारी बहुत याद आती है. मैं तुम्हें राखी भेजना चाहती हूं, लेकिन तुम बहुत दूर हो. काश, भारत सरकार प्यार से भेजी गई यह राखी लाहौर की कोट लखपत जेल तक पहुंचा दे, ताकि एक बहन की अपने भाई को राखी बांधने की इच्छा पूरी हो सके. हर बहन अपने भाई को राखी बांधती है, पर मैं एक अभागी बहन हूं जो ऐसा नहीं कर सकती. मां तुम्हें बहुत याद करती हैं और तुम्हारा इंतजार करती हैं. तुम्हारी भांजियां भी तुम्हें बहुत याद करती हैं और तुम्हें देखना चाहती हैं."
संघमित्रा ने कसम खाई है कि जब तक उनका भाई घर वापस नहीं आ जाता, वह किसी और को राखी नहीं बांधेंगी.
कैसे पहुंचा भाई पाकिस्तान?
प्रसन्नजीत कभी फार्मेसी का एक होनहार छात्र था, जो कई साल पहले घर से अचानक गायब हो गया था. परिवार ने सालों तक उसे ढूंढा और अंत में उसे मरा हुआ मान लिया था. लेकिन 2021 में, कोट लखपत जेल से लौटे एक पूर्व भारतीय कैदी ने परिवार को बताया कि प्रसन्नजीत जिंदा है और पाकिस्तान की जेल में बंद है. रिकॉर्ड के मुताबिक, पाकिस्तान ने उसे अक्टूबर 2019 में बटापुर से हिरासत में लिया था. वहां उसका नाम कुछ और दर्ज है, लेकिन उसने अपनी असली पहचान और परिवार का पता बता दिया है.
संघर्ष और उम्मीद की कहानी
इस परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. बेटे के इंतजार में पिता की मौत हो चुकी है, जबकि मां की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है. उन्हें आज भी यही लगता है कि उनका बेटा जबलपुर में है. संघमित्रा खुद एक दिहाड़ी मजदूर हैं और दो बच्चों की मां हैं. घर की आर्थिक तंगी के बावजूद, वह लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं ताकि उनके भाई की रिहाई के लिए कोई मदद मिल सके.
परिवार को बस एक ही उम्मीद है कि सरकार उनकी सुनेगी और जल्द ही कोई कार्रवाई करेगी, ताकि एक दिन उनका बेटा घर लौट सके और रक्षाबंधन का त्योहार उनके लिए फिर से सच्ची खुशियां लेकर आए.
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 09, 2025 01:39 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

