अब भी दूर की कौड़ी ही है भारत में महिला सशक्तिकरण

भारत में केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक महिला सशक्तिकरण के दावे करती हैं लेकिन हाल में सामने आई पश्चिम बंगाल के संदेशखाली जैसी घटनाएं और देश में महिलाओं के पिछड़ेपन के ताजा आंकड़े इन दावों को मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत में केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक महिला सशक्तिकरण के दावे करती हैं लेकिन हाल में सामने आई पश्चिम बंगाल के संदेशखाली जैसी घटनाएं और देश में महिलाओं के पिछड़ेपन के ताजा आंकड़े इन दावों को मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं.देश में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने बीते साल सितंबर में नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 पारित किया था. हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखपति दीदी और नमो ड्रोन दीदी योजनाओं की शुरुआत की थी. बीते साल संसद में महिला आरक्षण विधेयक भी पारित हो गया है.

भारत के जिस एकलौते राज्य, पश्चिम बंगाल, में 13 साल से एक महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राज है वहां भी युवतियों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कम से कम आधा दर्जन योजनाएं चल रही हैं. हाल में पश्चिम बंगाल के संदेशखाली से सामने आने वाली यौन उत्पीड़न की खबरें और नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट इन दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं. यूएन वीमेन और युनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) की ओर से जारी महिला सशक्तिकरण और वैश्विक लैंगिक समानता सूचकांकों के मामले में भी भारत दुनिया के उन देशों की सूची में शामिल है जो इस मामले में पिछड़े हैं. इनसे साफ है कि भारत में महिला सशक्तिकरण अब भी दूर की कौड़ी है.

हाल की घटनाएं

पश्चिम बंगाल की संदेशखाली की घटना चिराग तले अंधेरा कहावत को चरितार्थ करती है. कोलकाता से महज सौ किमी दूर बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाके में बसे संदेशखाली ने बीती फरवरी में राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी थीं. इसकी वजह थी सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के कथित यौन उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार के खिलाफ महिलाओं का सड़क पर उतरना. वह भी उस राज्य में, जहां 13 साल से महिला मुख्यमंत्री का राज है.

आखिर इस मामले के तमाम अभियुक्तों की गिरफ्तारी के बाद फिलहाल यह मुद्दा शांत तो है. लेकिन यह अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है. राज्य सरकार वर्षों से महिला सशक्तिकरण और उनको आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं चला रही है. बावजूद इसके अगर राजधानी के करीब ऐसा हो रहा है तो दूरदराज के इलाकों के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है.

अन्य राज्यों में भी हालत चिंताजनक

ऐसा नहीं है कि पश्चिम बंगाल में ही ऐसी घटनाएं हो रही हैं. हाल में उत्तर प्रदेश में दो नाबालिग युवतियों ने कथित रूप से सामूहिक बलात्कार के बाद रहस्यमय तरीके से आत्महत्या करने का मामला भी सुर्खियों में रहा था. बाद में उनमें से एक के पिता ने भी रहस्यमय तरीके से आत्महत्या कर ली थी. इसके अलावा झारखंड के दुमका जिले में स्पेन के एक दंपति के साथ जो कुछ हुआ, वह भी सुर्खियों में रहा था. उस महिला के साथ सात लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया था.

राजधानी दिल्ली के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं. यही वजह है कि एनसीआरबी के आंकड़े चौंकाते नहीं है. हालांकि समाजशास्त्रियों का कहना है कि यह आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं बताते. इनमें उन मामलों का ही जिक्र किया जाता है जो पुलिस तक पहुंचे हैं. लेकिन खासकर मानसिक संकीर्णता और दकियानूसी सोच की जंजीरों में बंधे ग्रामीण इलाकों में ऐसे ज्यादातर मामलों को स्थानीय पंचायत के स्तर पर ही रफा-दफा कर दिया जाता है. फिर भी एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट एक खतरे की घंटी तो है ही.

एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने बीते दिसंबर में अपनी ताजा रिपोर्ट जारी की थी. इसमें साल 2022 के दौरान महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों का आंकड़ा है. इसमें बताया गया था कि 2021 के मुकाबले 2022 में देश में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में चार फीसदी की वृद्धि हुई है. इस दौरान दिल्ली में लगातार तीसरे साल महानगरों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के तहत सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए. महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश एक फिर पहले स्थान पर रहा है. उसके बाद महाराष्ट्र और राजस्थान का स्थान है. इसी तरह बलात्कार के बाद हत्या जैसे गंभीर अपराधों के मामले में भी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पहले दोनों स्थान पर हैं. दहेज के लिए होने वाली मौतों के मामले में भी पहला स्थान उत्तर प्रदेश का ही रहा है.

एनसीआरबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4.45 लाख मामले दर्ज किए गए. यह सुनकर हैरत हो सकती है कि देश में हर घंटे महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में 51 एफआईआर दर्ज किए. साल 2022 के दौरान देश भर में करीब 70 हजार महिलाओं का अपहरण हुआ. इस मामले में उत्तर प्रदेश अव्वल रहा है. उसके बाद क्रमशः बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल का स्थान था.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र के दो संगठनों यूएन वुमेन और यूएनडीपी ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में पहली बार साल 2022 में 114 ऐसे देशों में महिलाओं की स्थिति का विश्लेषण किया है जो महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता सूचकांकों के लिहाज से पिछड़े हैं. इन देशों में 3.1 अरब युवतियां और महिलाएं रहती हैं जो दुनिया में महिलाओं की कुल आबादी का 90 फीसदी है. बराबरी के रास्ते (द पाथ्स टू इक्वल) शीर्षक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दोनों सूचकांक महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की दिशा में संबंधित देश की प्रगति की पूरी तस्वीर बताते हैं.

इसमें भारत का जिक्र करते हुए कहा गया है कि आर्थिक लिहाज से कुछ प्रगति जरूर हुई है. महिलाओं के बैंक खाते खुले और स्थानीय प्रशासन में भागीदारी कुछ बढ़ी है. लेकिन कौशल विकास के अलावा श्रम, राजनीति और निजी क्षेत्र में भागीदारी जैसे मामलों में उनको अब भी लैंगिक समानता के लिए काफी फासला तय करना है.

योजनाओं के बावजूद समस्या कहां आती है

समाजशास्त्रियों का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए बने तमाम कानून प्रभावी तो हैं. लेकिन उनको लागू करने के लिए राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति का अभाव है. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पुलिस से मामलों में भी सत्तारूढ़ पार्टी के इशारे या मूड के आधार पर ही कदम उठाती है. तमाम राज्यों में इसकी सैकड़ों मिसाल मिल जाएगी.

महिला कार्यकर्ता सोनाली प्रधान कहती हैं, "विडंबना तो यह है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुद्दे पर राजनीति या कुछ कर पाने की हैसियत में रही महिलाएं भी चुप्पी साध लेती हैं." वे इस मामले में संदेशखाली की घटना का हवाला देती हैं. इतने बवाल के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर सत्तारूढ़ पार्टी की किसी महिला नेता ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की. विपक्ष ने इस मुद्दा जरूर बनाया. लेकिन सुनंदा के मुताबिक, वह इसे राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है. राजनीति या प्रशासन में शीर्ष पर पहुंचने वाली महिलाएं ऐसे मामलों में अपराधियों का राजनीतिक जुड़ाव देखने के बाद ही टिप्पणी करने या चुप्पी साधने का फैसला करती हैं.

एक अन्य समाजशास्त्री और महिला कार्यकर्ता देवप्रिया मंडल कहती हैं, "तमाम केंद्रीय कानूनों और महिला सशक्तिकरण योजनाओं के बावजूद सौ बात की एक बात यह है कि जब तक महिलाएं अपने कम्फर्ट जोन से निकल कर अपने जीवन की बागडोर खुद संभालने की इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय नहीं दिखाती तब तक देश में महिला सशक्तिकरण का मुद्दा हवाई ही रहेगा."

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