विदेश की खबरें | कर्मचारी, प्रबंधक ‘घर से काम’ करने के सामाजिक, मानसिक स्वास्थ्य प्रभाव की अनदेखी क्यों नहीं कर सकते?

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. बर्नेबी (कनाडा), 22 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) कोविड-19 महामारी के कारण कार्यस्थल से जुड़ी कई विकृतियां उत्पन्न हुई हैं, जिनमें ‘‘सामूहिक इस्तीफे’’, ‘‘केवल निश्चित कार्यावधि में ही काम करने की जिद’’ और श्रमिकों की कमी जैसी चीजें शामिल हैं।

श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

बर्नेबी (कनाडा), 22 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) कोविड-19 महामारी के कारण कार्यस्थल से जुड़ी कई विकृतियां उत्पन्न हुई हैं, जिनमें ‘‘सामूहिक इस्तीफे’’, ‘‘केवल निश्चित कार्यावधि में ही काम करने की जिद’’ और श्रमिकों की कमी जैसी चीजें शामिल हैं।

महामारी के दौरान ‘घर से काम’ (वर्क फ्रॉम होम) का लंबा दौर चलने के बाद वापस कार्यस्थल या कार्यालय लौटकर काम करने को लेकर कर्मचारियों और प्रबंधकों के बीच तनतनी भी देखने को मिली है।

‘इम्प्लॉई बर्नआउट’ (कर्मचारियों की अपने कार्य के प्रति असंतुष्टि) और स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं इन मुद्दों के केंद्र में हो सकती हैं।

दो नए अध्ययन कार्यस्थल पर सामाजिक जुड़ाव के महत्व को उजागर करते हैं और बताते हैं कि घर से काम करना कार्यस्थल की सबसे अच्छी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

तो, ‘बर्नआउट’ क्या है?

‘इंटरनेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ डिजीज’ इसे (बर्नआउट) एक सिंड्रोम के रूप में वर्णित करता है जो उस दीर्घकालिक कार्यस्थल तनाव से उत्पन्न होता है, जिसे सफलतापूर्वक प्रबंधित नहीं किया गया है।

निदान योग्य स्थिति के रूप में बर्नआउट के तीन लक्षण होते हैं :

पहला शारीरिक थकावट और दूसरा काम तथा सहकर्मियों से दूर होना जबकि तीसरा लक्षण किसी का अपनी नौकरी और करियर के प्रति अनिश्चितता से संबंधित है।

बर्नआउट का क्या कारण है और इसे कैसे रोका जा सकता है?

वैश्विक शोध के अनुसार, लगभग 50 प्रतिशत कर्मचारी और 53 प्रतिशत प्रबंधक कोविड-19 महामारी के कारण बर्नआउट का शिकार हुए हैं। कार्यस्थल पर स्पष्ट रूप से उत्साहजनक स्थितियां नहीं हैं।

एक सामाजिक महामारी विज्ञानी के रूप में सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के संदर्भ में मैं यह समझने के लिए उत्सुक रहा हूं कि कौन से कारक बर्नआउट में योगदान करते हैं और इसे सफलतापूर्वक कैसे प्रबंधित किया जा सकता है, खास तौर पर मौजूदा कोविड-19 से उपजी चुनौतियों के मद्देनजर।

आप सोच सकते हैं कि शोधकर्ताओं को सब कुछ पता होगा लेकिन उन्हें इस बिंदु पर बर्नआउट को लेकर काफी कुछ समझने की आवश्यकता है। आखिरकार, बर्नआउट का अध्ययन 1970 के दशक के आसपास से किया जा रहा है।

तब से किए गए कई अध्ययनों ने कार्यस्थल की स्थितियों, जैसे वेतन, काम के घंटे, प्रबंधन शैली और अस्पष्ट ‘‘कार्यस्थल संस्कृति’’ पर ध्यान केंद्रित किया है।

जैसे, बर्नआउट के प्रबंधन ने अक्सर कार्यस्थल के वातावरण को फिर से आकार देने और खराब प्रबंधकों को सुधारने पर ध्यान केंद्रित किया है। हालांकि, ये निश्चित रूप से आवश्यक हैं लेकिन तत्काल यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसे कदम पर्याप्त हैं।

महामारी सामने आने के साथ कई लोगों के पास जीवन से काम को अलग करने के असंभव होने के बारे में जागरूकता के नए स्तर हैं।

कुछ के लिए, यह जागरूकता इस बात से जुड़ी है कि जब वे अपनी ड्यूटी पूरी करके घर आते हैं तो वे कितने थके हुए होते हैं। वहीं, ‘वर्क फ्रॉम होम’ करने वाले अन्य लोगों के लिए, यह घर और कार्यालय के बीच के फर्क के गायब होने से जुड़ा हो सकता है।

किसी भी मामले में, हमारा भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य हमारे साथ होता है, चाहे हम कार्यस्थल पर हों या घर पर। जिस तरह, यह समझ में आता है कि हम बर्नआउट के बारे में समग्र दृष्टिकोण रखते हैं।

इसी तरह, घर से काम करने के अपने सामाजिक फायदे और नुकसान भी हैं।

साइमन फ्रेजर विश्वविद्यालय में ‘माईलैब’ द्वारा हाल के एक अध्ययन में हमने बर्नआउट के लिए सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारकों की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित किया।

इस अध्ययन में हमने पाया कि अकेलापन और सामाजिक रूप से मिलने वाले सहयोग की कमी भी बर्नआउट के प्रमुख कारणों में शुमार है।

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