देश की खबरें | उपहार सिनेमा अग्निकांड कृष्णमूर्ति ने अंसल बंधुओं की रिहाई को नाइंसाफी बताया
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नयी दिल्ली, 19 जुलाई ‘एसोसिएशन ऑफ विक्टिम्स ऑफ उपहार ट्रेजेडी (एवीयूटी) की प्रमुख नीलम कृष्णमूर्ति ने रियल एस्टेट कारोबारी सुशील और गोपाल बंसल की रिहाई को मंगलवार को ‘नाइंसाफी’ बताया और कहा कि उनका न्यायपालिका से विश्वास खत्म हो गया है।
अदालत ने अंसल बंधुओं को उपहार सिनेमा हॉल में आग लगने की घटना के संबंध में सबूतों से छेड़छाड़ के मामले में जेल में बिताई गई अवधि के आधार पर उन्हें रिहा करने का आदेश दिया। 1997 में उपहार सिनेमा हॉल में आग लगने से 59 लोगों की मौत हो गई थी।
घटना में कूष्णमूर्ति के दो नाबालिग बच्चों की मौत हो गई थी। वह पिछले दो दशकों से पीड़ित परिवारों की ओर से न्याय के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही थी।
इस बीच, एवीयूटी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पहवा ने कहा कि एसोसिएशन दिल्ली उच्च न्यायालय में मंगलवार के आदेश के खिलाफ "निश्चित रूप से अपील" करेगा।
कृष्णमूर्ति ने अदालतकक्ष से बाहर जाने से पहले न्यायाधीश से कहा, “ यह पूर्ण अन्याय है। अगर आरोपी अमीर और ताकतवर है तो हमें न्यायपालिका पर भरोसा नहीं हो सकता। मैंने अदालत आकर गलती की। व्यवस्था ही भ्रष्ट है। यह बहुत ही निराशाजनक है।”
न्यायाधीश ने आदेश सुनाते हुए कहा, ‘‘हम आपके (नीलम कृष्णमूर्ति के) साथ सहानुभूति रखते हैं। कई लोगों की जान चली गई, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। लेकिन, आपको यह समझना चाहिए कि दंड नीति प्रतिशोध के बारे में नहीं है। हमें उनकी (अंसल बंधुओं) उम्र पर विचार करना होगा। आपने नुकसान झेला है, लेकिन उन्होंने भी नुकसान सहा है।’’
इससे पहले आज, सजा की अवधि पर बहस के दौरान, कृष्णमूर्ति ने वृद्धावस्था और आश्रित परिवार का हवाला देते हुए अंसल बंधुओं के रियायत पाने के प्रयास का पुरजोर विरोध करते हुए कहा, “कम से कम आपका एक परिवार है। मैंने अपने दोनों बच्चों को उस आग में खो दिया। मेरे मरने के बाद मेरा अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं होगा।"
बाद में, अदालत कक्ष के बाहर, कृष्णमूर्ति ने आज के आदेश के प्रति अपनी निराशा दोहराई और न्यायिक जवाबदेही की मांग की।
उन्होंने कहा कि वह सीजेआई (भारत के प्रधान न्यायाधीश) से पूछना चाहती हैं कि अंसल बंधुओं में ऐसा क्या खास है कि उच्चतम न्यायालय और सत्र अदालत ने उन्हें जेल में गुजारी गई अवधि पर छोड़ दिया?
उन्होंने कहा, “ आप मामलों को दशकों तक क्यों खींचने देते हैं और फिर अपराधियों को उम्र का हवाला देकर राहत प्रदान करते हैं। हमें न्यायिक जवाबदेही की जरूरत है।”
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