देश की खबरें | अगले दो दशकों में अपरिहार्य जलवायु जोखिम उत्पन्न होंगे : आईपीसीसी
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नयी दिल्ली, 28 फरवरी वैज्ञानिकों ने सोमवार को चेतावनी दी कि जोखिमों को कम करने की कोशिशों के बावजूद मानवजनित जलवायु परिवर्तन प्रकृति में खतरनाक एवं व्यापक बाधा खड़ी कर रहा है ।
जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर-सरकार पैनल (आईपीसीसी) की ओर से सोमवार को जारी की गयी एक रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गयी है। आईपीसीसी अध्यक्ष हाउसंग ली ने ‘जलवायु परिवर्तन 2022: प्रभाव, अनुकूलन एवं संभाव्यता’ नामक रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, ‘‘यह रिपेार्ट निष्क्रियता के परिणाम के बारे में सख्त चेतावनी है।’’
ली ने डिजिटल संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘ यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन हमारे कल्याण एवं स्वस्थ ग्रह के लिए गंभीर एवं बढ़ता खतरा है। आज के हमारे कृत्य तय करेंगे कि कैसे लोग प्रकृति के अनुरूप खुद को ढालते हैं और प्रकृति कैसे इस बढ़ते जलवायु जोखिमों पर प्रतिक्रिया करती है।’’
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सामने अगले दो दशक में धरती के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस वृद्धि के साथ विविध जलवायु खतरे हैं और अस्थायी रूप से भी इसमें वृद्धि ऐसी अतिरिक्त असर डालेगी जिनमें से कुछ को पलटा भी नहीं जा सकेगा।
वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में कहा, ‘‘ समाज के लिए खतरे बढ़ेंगे, बुनियादी ढांचों एवं निचले तटीय बस्तियों के लिए संकट खड़ा होगा।’’
अपने संबोधन में संयुक्त राष्ट्र महासचिव जनरल एंतोनियो गुतारेस ने आगा किया कि आगामी दशक में वैश्विक उत्सर्जन में 14 फीसद वृद्धि की आशंका है जिसके त्रासदपूर्ण परिणाम होंगे।
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट 67 देशों के 270 से अधिक वैज्ञानिकों ने तैयार की है और 195 सरकारों ने मंजूर की है। रिपोर्ट से पता चलता है कि बिगड़ते जलवायु के प्रभाव दुनिया के हर हिस्से में विनाशकारी हैं और वे इस ग्रह पर हर सजीव पदार्थ-इंसान, जानवर, पेड़-पोधों एवं पूरी पारिस्थितिकी पर असर डाल रहे हैं।
यह रिपोर्ट आईपीसीसी की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट की दूसरी किस्त है। छठी रिपोर्ट इस साल पूरा होगी।
रिपेार्ट में कहा गया है, ‘‘ लू, सूखा और बाढ़ में वृद्धि पहले ही पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं की सहिष्णुता सीमा को पार कर गयी है, फलस्वरूप पेड़-पौधों एवं प्रवाल भित्तियों जैसी प्रजातियां बड़े पैमाने पर खत्म हो रही हैं।’’
उसमें कहा गया है, ‘‘ प्रतिकूल मौसमी दशाएं भी साथ-साथ सामने आ रही हैं, फलस्वरूप ऐसे प्रभाव नजर आ रहे हैं जिनका प्रबंधन लगातार मुश्किल होता जा रहा है। उसके कारण अफ्रीका, एशिया, मध्य एवं दक्षिण अमेरिका एवं छोटे द्वीपों और आर्कटिक क्षेत्र में लेागों के सामने भोजन एवं पानी की असुरक्षा पैदा हो गयी है।’’
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