विदेश की खबरें | हथियार सम्मेलन से खरबों डॉलर का उद्योग आया चर्चा में

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. मेलबर्न, 22 अगस्त (360इंफो) हथियारों का वैश्विक कारोबार करीब 2000 अरब डॉलर का है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस सप्ताह आयोजित एक सम्मेलन का उद्देश्य इस प्राणघातक उद्योग को और निगरानी के तहत लाना है।

श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

मेलबर्न, 22 अगस्त (360इंफो) हथियारों का वैश्विक कारोबार करीब 2000 अरब डॉलर का है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस सप्ताह आयोजित एक सम्मेलन का उद्देश्य इस प्राणघातक उद्योग को और निगरानी के तहत लाना है।

ऑस्ट्रेलिया वैश्विक स्तर पर शीर्ष पांच हथियार आयातक देशों में शामिल है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट के आकलन के मुताबिक वर्ष-2021 में ऑस्ट्रेलिया ने करीब 1.235 अरब डॉलर के हथियारों का वैध आयात किया। इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया दुनिया के शांतिपूर्ण देशों में सबसे बड़ा हथियार आयातक बन गया।

ऑस्ट्रेलिया अपने संप्रभु अधिकारों और सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी का इस्तेमाल करते हुए कानूनी रूप से विभिन्न हथियार प्रणालियों को खरीद व तैनात कर सकता है। इनमें युद्ध के लिए डिजाइन किए गए हथियार जैसे पनडुब्बी, टैंक, बख्तरबंद वाहन, तोप, लड़ाकू विमान, हमलावर हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, मिसाइल और मिसाइल लांचर शामिल हैं।

इनमें छोटे और हल्के हथियार शामिल हैं। पूरी दुनिया में आश्चर्यचकित करने वाली संख्या में हथियारों का व्यापार हो रहा है। खबरों के मुताबिक वर्ष-2021 में वैश्विक स्तर पर सेना पर 2113 अरब डॉलर व्यय किए गए। हथियारों की लगातार मांग की वजह से एक वृहद वैश्विक सैन्य अर्थव्यवस्था बन गई है।

वर्ष 2021 में अमेरिका, चीन, भारत, ब्रिटेन और रूस दुनिया के शीर्ष पांच देश थे जिन्होंने अपनी-अपनी सेना पर सबसे अधिक खर्च किया। वैश्विक स्तर पर इस मद में खर्च राशि में 62 प्रतिशत भागीदारी इन पांचों देशों की है। वर्ष-2017 से 2021 के बीच सबसे बड़े पांच हथियार निर्यातक अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और जर्मनी थे जिनकी कुल निर्यात में 77 प्रतिशत भागीदारी थी।

ऑस्ट्रेलिया के अलावा सबसे अधिक हथियार आयात करने वाले पांच देशों में भारत, सऊदी अरब, मिस्र और चीन शामिल हैं और संयुक्त रूप से ये वैश्विक स्तर पर 38 प्रतशित हथियार आयात के लिए जिम्मेदार हैं।

कथित ‘‘व्हाइट मार्केट’’ जिसमें कानूनी तौर पर हथियारों का व्यापार होता है के अलावा इसका एक ‘ब्लैक मार्केट’’भी है जो बड़ा और लाभदायक है। इसका विकास ‘‘राज्य से इतर तत्वों’’ को आधिकारिक और गैर आधिकारिक तरीके से हथियार आपूर्ति के लिए किया गया है ताकि अंतरराष्ट्रीय और घरेलू हथियार निर्यात पाबंदियों का अनुपालन नहीं करना पड़े। हथियारों के अवैध कारोबार का असर अन्य चीजों के साथ सशस्त्र संघर्ष, सरकारों को अस्थिर करने, संगठित अपराध एवं आतंकवाद पर पड़ता है। इसका उल्लेखनीय प्रभाव युद्ध प्रभावित क्षेत्रों के असैन्य नागरिकों पर पड़ता है।

छोटे हथियारों और उनमें इस्तेमाल होने वाले गोलाबारूद के दूसरे हाथों में पहुंचने का खतरा अधिक होता है और ये आतंकवादियों, अपराधियों, सशस्त्र समूहों और अन्य अवैध उपयोगकर्ताओं के हाथों में चले जाते हैं। सभी हथियार प्रणालियों के व्यापार में छोटे हथियारों का कारोबार सबसे कम पारदर्शी है।

विशेषज्ञों का आकलन है कि दुनिया में करोड़ों छोटे हथियार मौजूद है और उनमें से तीन चौथाई असैन्य लोगों के पास है।

वर्ष-1990 के दशक में हथियारों की बिक्री के नियमन के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि करने की प्रक्रिया शुरू हुई और इसकी वजह से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दो अप्रैल 2013 को सशस्त्र व्यापार संधि (एटीटी) को अंगीकार किया। मार्च 2022 तक ऑस्ट्रेलिया सहित 111 देश इस संधि का हिस्सा बन चुके थे। अब भी 30 हस्ताक्षरकर्ताओं और 54 देशों को संधि में शामिल होना है। उल्लेखनीय कि अमेरिका और रूस (दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्यातक), भारत,सऊदी अरब और मिस्र (दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक) इसमें शामिल नहीं हैं।

वहीं, समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले 30 देशों ने इस संधि की अब तक पुष्टि नहीं की है।

एटीटी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक हथियारों के वैध कारोबार को प्रतिबंधित करना नहीं है बल्कि इस कारोबार के लिए मानक स्थापित करना, अवैध करोबार को रोकना और खत्म करना है।

एटीटी, हथियारों के स्थानांतरण को प्रतिबंधित करता है अगर कोई देश संयुक्त सुरक्षा परिषद के निर्देशों का अनुपालन नहीं करता या वह अंतरराष्ट्रीय समझौते का उल्लंघन कर हथियारों का हस्तांतरण करेगा या संबंधित देश जानता है कि हथियार नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध में इस्तेमाल होंगे या अन्य युद्ध अपराधों में इस्तेमाल होंगे।

हथियार कारोबार में संलिप्त विभिन्न किरदारों की आपराधिक जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने में असफलता और राज्यों के स्व नियमन को लेकर लचीलापन से संधि का प्रभाव सीमित हो जाता है। जिम्मेदारी, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए पक्षकारों को इस संधि को लागू करने के लिए किए गए उपायों की जानकारी सचिवालय को देनी चाहिए। वे वाणिज्यिक रूप से संवेदनशील या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी को अलग रख सकते हैं।

राज्य पक्षकारों द्वारा दी जाने वाली जानकारी एटीटी को लागू करने के लिए समझ बनाने, निगरानी करने और आकलन करने के लिए आवश्यक औजार है। हालांकि, एटीटी की प्रतिवेदन प्रणाली क्षमता के अनुरूप कारगर नहीं है। प्रतिवेदन में दी गई छूट इकरारनामों से बचने का रास्ता देता है। इस सप्ताह एटीटी के राज्य पक्षकारों की बैठक स्विट्जरलैंड के जिनेवा में होने वाली है। इस दौरान एटीटी की रिपोर्टिंग के साथ इसके अनुपालन एवं वृहद स्वीकार्यता पर चर्चा एजेंडे में है।

संयुक्त राष्ट्र के अधिकतर सदस्यों में सहमति है कि एटीटी उपयोगी और संरक्षित करने योग्य है, भले सभी देश इस संधि के सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों को लेकर सहमत नहीं हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि एटीटी की सफलता सार्वभौमिक स्वीकार्यता और क्रियान्वयन पर निर्भर है।

यह बहस का विषय है कि क्या यह संधि कई दशकों के अपर्याप्त हथियार नियंत्रण की विरासत को समाप्त करेगी और आर्थिक हितों के बदले मानव सुरक्षा को तरजीह देगी। लेकिन जब तक एटीटी को व्यापक तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता, इसे एक शानदार विचार या कागजी शेर आदि ही समझा जाएगा, जैसा कि जर्मन वकील मारलिट ब्रांडिस ने इसका उल्लेख किया है।

जब तक अंतरराष्ट्रीय हथियार व्यापार के विवादित, अति संवेदनशील और गंभीर मुद्दों पर राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और सहयोग नहीं दिखता, तब तक पारंपरिक हथियारों के अंतरराष्ट्रीय नियमन के लिए एकीकृत सहमति बनाने के लिए प्रभावी आधार नहीं तैयार किया जा सकता।

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