देश की खबरें | टीएमसी ने बंगाली श्रमिकों को अवैध हिरासत में रखे जाने का दावा किया

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कोलकाता, नौ जुलाई तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बुधवार को आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित ओडिशा सरकार ने अवैध प्रवासियों की पहचान करने के बहाने बांग्ला भाषी प्रवासी मजदूरों को अवैध रूप से हिरासत में लिया जबकि उनके पास वैध दस्तावेज थे।

सत्तारूढ़ पार्टी ने हिरासत में लिये मजदूरों की तत्काल रिहाई की मांग की और चेतावनी दी कि‍ अगर इस तरह का ‘लक्षित उत्पीड़न’ जारी रहा तो एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन किया जाएगा।

ओडिशा पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने हालांकि बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों के पास अपने निवास या नागरिकता साबित करने के लिए वैध दस्तावेज नहीं थे।

उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस किसी समुदाय या क्षेत्र को निशाना नहीं बना रही, बल्कि केवल देश की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है।

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और राज्यसभा सदस्य समीरुल इस्लाम ने सोशल मीडिया पर एक बयान में ये आरोप लगाये और इस घटना की निंदा की थी।

इस्लाम, प्रवासी मजदूर कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं।

महुआ ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “नादिया के 23 मजदूरों को झारसुगुड़ा में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है। मैं ओड़िशा के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से आग्रह करती हूं कि उन्हें तुरंत रिहा करें।”

उन्होंने दावा किया कि ओडिशा में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल (बीजद) के 24 वर्ष के शासनकाल के दौरान ऐसी घटनाएं कभी नहीं हुईं।

महुआ ने कहा, “ऐसा मत सोचिए कि इन मजदूरों के लिए लड़ने वाला कोई नहीं है।”

महुआ ने एक अन्य पोस्ट में कहा कि ये 23 मजदूर उनके निर्वाचन क्षेत्र के पानीघाटा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले मिर्जापुर गांव के हैं।

टीएमसी सांसद ने आरोप लगाया, “सभी दस्तावेजों के बावजूद इन मजदूरों को ओडिशा के झारसुगुड़ा के ओरिएंट थाने द्वारा स्थापित पूछताछ केंद्र में 421 अन्य बंगाली मजदूरों के साथ अवैध रूप से हिरासत में रखा जा रहा है।”

टीएमसी नेताओं के अनुसार, हाल के सप्ताह में ओडिशा पुलिस ने 200 से ज्यादा प्रवासी मजदूरों को बांग्लादेशी होने के संदेह में झारसुगुड़ा जिले के पूछताछ केंद्रों में रखा है और ये मजदूर नादिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, बीरभूम, पूर्वी बर्धमान और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों के रहने वाले हैं।

टीएमसी के राज्यसभा सदस्य समीरुल इस्लाम ने आरोप लगाया कि ये कार्रवाई मजदूरों की और उनके मूल आधार को देखते हुए ‘जानबूझकर उत्पीड़न किये जाने’ का एक हिस्सा है।

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