देश की खबरें | शीर्ष अदालत ने न्यायालय की अवमानना के लिये प्रशांत भूषण पर एक रूपए का सांकेतिक जुर्माना किया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक ट्वीट करने के कारण आपराधिक अवमानना के दोषी अधिवक्ता प्रशांत भूषण को सोमवार को सजा सुनाते हुये उन पर एक रुपए का सांकेतिक जुर्माना लगाया। न्यायालय ने कहा कि भूषण ने न्याय के प्रशासन की संस्था की प्रतिष्ठा को कलंकित करने का प्रयास किया है।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 31 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक ट्वीट करने के कारण आपराधिक अवमानना के दोषी अधिवक्ता प्रशांत भूषण को सोमवार को सजा सुनाते हुये उन पर एक रुपए का सांकेतिक जुर्माना लगाया। न्यायालय ने कहा कि भूषण ने न्याय के प्रशासन की संस्था की प्रतिष्ठा को कलंकित करने का प्रयास किया है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि वह कोई कठोर दंड देने की बजाय उदारता दिखाते हुये भूषण पर एक रुपए का सांकेतिक जुर्माना लगा रही है।

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न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की तीन सदस्यीय पीठ ने दोषी अधिवक्ता प्रशांत भूषण को सजा सुनाते हुये कहा कि जुर्माने की एक रुपए की राशि 15 सितंबर तक जमा करानी होगी और ऐसा नहीं करने पर उन्हें तीन महीने की कैद भुगतनी होगी और तीन साल के लिये वकालत करने पर प्रतिबंध रहेगा।

पीठ ने सजा के बारे में अपने 82 पेज के फैसले में कहा,‘‘हमारे सुविचारित दृष्टिकोण में अवमाननाकर्ता (भूषण) द्वारा किया गया कृत्य बहुत ही संगीन है। उन्होंने न्याय के प्रशासन की उस संस्था की प्रतिष्ठा को कलंकित करने का प्रयास किया जिसका वह स्वयं भी हिस्सा हैं।’’

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पीठ ने कहा, ‘‘दोहराने की कीमत पर, हमें यह कहना है कि देश की जनता का विश्वास ही कानून के शासन के लिये न्यायिक संस्था की बुनियाद है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य पहलू है।’’

न्यायमूर्ति मिश्रा ने फैसला पढ़कर सुनाया लेकिन इसमें फैसले के लेखक का नाम नहीं था। न्यायमूर्ति मिश्रा दो सितंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

न्यायालय ने 14 अगस्त को कार्यकर्ता अधिवक्ता प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के खिलाफ दो अपमानजनक ट्वीट के लिये आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराते हुये कहा था कि इन्हें जनहित में न्यापालिका के कामकाज की स्वस्थ आलोचना नहीं कहा जा सकता।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि कई बार उसने सिर्फ अवसर ही नहीं दिये बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भूषण को इस मामले में खेद व्यक्त करने के लिये भी कहा।

न्यायालय ने कहा कि अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने भी सुझाव दिया कि बेहतर होगा कि अवमाननाकर्ता खेद व्यक्त करके अपने जवाबी हलफनामे में लगाये गये आरोप वापस ले ले, लेकिन इस अनुरोध पर भी भूषण ने ध्यान नहीं दिया।

पीठ ने कहा, ‘‘अवमाननाकर्ता ने इस न्यायालय में 14 अगस्त, 2020 को दिये गये दूसरे बयान को न्यायालय के समक्ष आने से पहले ही न सिर्फ खूब प्रचारित किया बल्कि न्यायालय के अधीन मामले के बारे में कई इंटरव्यू भी दिये। इस तरह उसने इस न्यायालय की प्रतिष्ठा और कम करने का प्रयास किया।

पीठ ने कहा, ‘‘यदि हम इस तरह के आचरण का संज्ञान नहीं लेंगे तो इससे देश भर में वकीलों और वादकारियों के बीच एक गलत संदेश जायेगा। हालांकि, इस मामले में उदारता दिखाते हुये कठोर दंड देने की बजाय हम अवमाननाकर्ता पर एक रुपए का सांकेतिक जुर्माना कर रहे हैं।’’

पीठ ने कहा कि शुरू से ही शीर्ष अदालत इस मामले को खत्म करना चाहती थी और उसने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भूषण से कहा कि माफी मांगकर मामले को खत्म करें और संस्थान और व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करें, जो न्यायालय का अधिकारी है।

पीठ ने कहा कि हमारे कहने या अटॉर्नी जनरल की सलाह के बावजूद भूषण ने किसी प्रकार का खेद नहीं दर्शाया। अत: हमें उन्हें उचित सजा देने पर विचार करना ही होगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि हम न तो अवमाननाकर्ता को कैद की सजा सुनाने और न ही उन्हें वकालत से बाहर करने से डरते हैं।

न्यायालय ने कहा कि भूषण का आचरण उनके अड़ियल रवैये और अहं को दर्शाता है, जिसकी न्याय प्रशासन प्रणाली और इस महान पेशे में कोई जगह नहीं है। न्यायालय ने कहा कि संस्थान, जिसके वह भी सदस्य हैं, उसे नुकसान पहुंचाने के लिये उन्हें किसी तरह का पछतावा भी नहीं है ।

पीठ ने कहा कि हम सिर्फ इसलिए पलट कर हमला नहीं कर सकते क्योंकि अवमाननाकर्ता ने एक बयान दिया है कि वह इस न्यायालय से न तो उदारता चाहता है ओर न ही दया चाहता है और वह कोई भी सजा भुगतने के लिये तैयार है, जो न्यायालय उस कृत्य के लिये देगा जिसे वह एक अपराध मानता है।

पीठ ने कहा कि भूषण ने अपने बयान में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बयान भी उद्धृत किया जो उन्होंने अपने खिलाफ मुकदमे की सुनवाई के अंत में किया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि व्यवस्था की निष्पक्ष आलोचना के लिये अभिव्यक्ति के अधिकार के इस्तेमाल का स्वागत है और तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने और सीमा से बाहर निकल कर की जा रही आलोचना के लिये न्यायाधीश अति संवेदनशील नहीं हो सकते।

न्यायालय ने कहा कि इसे बदनाम करने और अवमाननाकारी बयानों तक ले जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायालय को उस परिस्थिति में कार्रवाई करनी होगी जब ये हमले एक सीमा से बाहर हो जायें। कानून के मजबूत हाथ ऐसे व्यक्ति पर हमला करते हैं जो कानून के शासन की श्रेष्ठता को चुनौती देते हैं।

धवन ने 14 अगस्त का निर्णय वापस लेने और भूषण को कोई सजा नहीं देने का सुझाव न्यायालय को दिया था। उन्होंने न्यायालय से इस मामले को न सिर्फ बंद करने बल्कि इस विवाद को खत्म करने का भी अनुरोध किया था।

न्यायालय ने कहा कि राजीव धवन का यह आग्रह स्वीकार नहीं किया जा सकता।

पीठ ने इस तथ्य का भी जिक्र किया कि भूषण ने शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की 12 जनवरी, 2018 की प्रेस कॉन्फ्रेंस को भी अपना आधार बनाने का प्रयास किया।

पीठ ने कहा, ‘‘हम आशा करते हैं कि यह पहला और अंतिम अवसर है जब न्यायाधीश प्रेस में गये हैं और ईश्वर अंतरिम व्यवस्था के माध्यम से इसकी गरिमा की रक्षा करने का विवेक प्रदान करे, विशेषकर, तब जब सार्वजनिक रूप से लगाये गये आरोपों को सहने वाले न्यायाधीश इसका जवाब नहीं दे सकते।’’

पीठ ने कहा कि सच्चाई न्यायाधीशों के लिये भी बचाव का रास्ता हो सकती है लेकिन वे न्यायिक मानकों और शुचिता तथा आचार संहिता से बंधे होते हैं।

न्यायालय ने कहा कि इस मामले में भूषण के बचाव को जनहित में या वास्तविक नहीं कहा जा सकता।

अनूप

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