देश की खबरें | मुख्यमंत्री शिंदे, बागी विधायकों के निलंबन संबंधी याचिका पर 11 जुलाई को होगी सुनवाई

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नयी दिल्ली, एक जुलाई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उन 15 बागी विधायकों को विधानसभा से निलंबित किए जाने का अनुरोध करने वाली शिवसेना के मुख्य सचेतक सुनील प्रभु की याचिका पर 11 जुलाई को सुनवाई करेगा, जिनके खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं लंबित हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की अवकाशकालीन पीठ से आग्रह किया कि मुख्यमंत्री समेत 16 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित होने के कारण अंतरिक याचिका पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है।

सिब्बल ने कहा, ‘‘परेशान करने के लिए माफी चाहता हूं...हमने एक अर्जी दाखिल की है। न्यायालय ने 29 जून को एक आदेश पारित किया था, उसके बाद एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली है। हमारे सामने और विधानसभा के समक्ष यह समस्या है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत विलय नहीं है तो मतों की गिनती कैसे होगी?’’

उन्होंने कहा, ‘‘(शिवसेना के) दोनों गुट व्हिप जारी करने जा रहे हैं। हम सदन की कार्यवाही को कैसे नियंत्रित करेंगे। वह (शिंदे) पार्टी नहीं हैं और यह मुद्दा केवल चुनाव आयोग द्वारा ही निर्णित हो सकता है।’’

पीठ ने कहा कि वह इस मुद्दे को लेकर पूरी तरह सचेत है और 11 जुलाई को इस पर गौर करेगी जब उपसभापति द्वारा जारी अयोग्यता नोटिस के खिलाफ शिवसेना के 16 बागी विधायकों की मुख्य याचिका पर सुनवाई होगी।

न्यायालय ने कहा, “हम निश्चित रूप से इस मुद्दे पर गौर करेंगे। ऐसा नहीं है कि हम इसके प्रति सचेत नहीं हैं। देखते हैं कि किन प्रक्रियाओं को अपनाया जा रहा है। यदि प्रक्रिया दोषपूर्ण है तो कृपया एक हलफनामा दाखिल करें, हम उस पर भी विचार करेंगे।’’

अवकाशकालीन पीठ ने 27 जून को शिवसेना के 16 बागी विधायकों को भेजे गए अयोग्यता नोटिस का जवाब देने का समय 12 जुलाई तक बढ़ाकर शिंदे गुट को अंतरिम राहत दी थी।

गौरतलब है कि 29 जून को, महाराष्ट्र के राज्यपाल ने शक्ति परीक्षण का आदेश दिया था, जिसके कारण महा विकास आघाड़ी (एमवीए) सरकार ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था और शक्ति परीक्षण को टालने का अनुरोध किया था।

पीठ ने 31 महीने पुरानी एमवीए सरकार को बहुमत साबित करने के लिए विधानसभा में शक्ति परीक्षण के राज्यपाल के निर्देश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पद छोड़ दिया।

तीस जून को शिंदे के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद, प्रभु ने शीर्ष अदालत का रुख किया और विभिन्न आधारों पर 15 बागियों को निलंबित करने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि वे ‘‘भाजपा के मोहरे के रूप में काम कर रहे हैं, जिससे दलबदल का संवैधानिक पाप हो रहा है।’’

याचिका में शीर्ष अदालत से आग्रह किया गया है कि शिंदे को मुख्यमंत्री के पद की पेशकश करके उनको दलबदल के लिए पुरस्कृत किए जाने के ‘‘निर्विवाद और स्पष्ट’’ तथ्यों के मद्देनजर मामले की जांच की जाए।

इसमें कहा गया है, ‘‘यद्यपि दसवीं अनुसूची की कार्यवाही लंबित है, लेकिन अंतरिम उपाय के तौर पर कम से कम दोषी विधायकों की सदन की सदस्यता निलंबित किये जाने योग्य है।’’

याचिका के अनुसार, विद्रोह के बावजूद, मूल शिवसेना उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला गुट है। ठाकरे 23 जनवरी, 2018 को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में उस वक्त चुने गए थे, जब संगठनात्मक चुनाव हुए थे और चुनाव आयोग को इसकी सूचना दी गई थी।

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