विदेश की खबरें | गेहूं और वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर इस साल अल नीनो का प्रभाव
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. कैम्परडाउन (ऑस्ट्रेलिया), 16 जुलाई (द कन्वरशेसन) ‘वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन’ (डब्ल्यूएमओ) ने सात वर्षों में पहले अल नीनो प्रभाव की शुरूआत होने की घोषणा की है। उसने यह पूर्वानुमान किया है कि प्रशांत महासागर के सतह के गर्म होने से उत्पन्न मौसमी दशा अल नीनो का प्रभाव 2023 में बना रहेगा।
कैम्परडाउन (ऑस्ट्रेलिया), 16 जुलाई (द कन्वरशेसन) ‘वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन’ (डब्ल्यूएमओ) ने सात वर्षों में पहले अल नीनो प्रभाव की शुरूआत होने की घोषणा की है। उसने यह पूर्वानुमान किया है कि प्रशांत महासागर के सतह के गर्म होने से उत्पन्न मौसमी दशा अल नीनो का प्रभाव 2023 में बना रहेगा।
अल नीनो के कारण ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में गर्म और सूखे मौसम की संभावना बढ़ जाती है जिससे जंगलों में आग लगने और अकाल पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, पेरू और इक्वाडोर में अतिवृष्टि की संभावना होती है जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
मानव जनित कारणों से हो रहे जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर इन प्रभावों को ‘न्यू नॉर्मल’ (जिसे वर्तमान में सामान्य स्थिति माना जाता है) की झलक माना जा रहा है।
इस मौसमी परिवर्तन का कृषि उत्पादन पर प्रभाव और उसके कारण खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि चिंता का विषय है। खास तौर से गेंहू, मक्का और धान के उत्पादन तथा कीमतों पर इसका प्रभाव चिंताजनक है।
दुनिया पर अल नीनो का प्रभाव कई रूप में पड़ रहा है, लेकिन यह तय है कि दुनिया की ज्यादातर आबादी इससे प्रभावित हो रही है। और यह खास तौर से गरीब और ग्रामीण परिवारों के परिप्रेक्ष्य में सही है क्योंकि उनका भविष्य पूरी तरह से जलवायु और कृषि पर आधारित है।
वैश्विक खाद्यान्न आपूर्ति और उसकी कीमतों के बहुत ज्यादा प्रभावित होने की आशंका है। पिछले पांच दशकों में 10 अल नीनो प्रभावों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वैश्विक रूप से कीमतें प्रभावित हुई हैं।
अल नीनो के प्रभाव के कारण औसत खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हुआ है, लेकिन इसके कारण दुनिया में ‘गेंहू, मक्का और धान’ के भंडार अत्यधिक प्रभावित नहीं हुए हैं। हालांकि, स्थानीय स्तर पर इसका प्रभाव बहुत गंभीर है। ‘मध्यम स्तर’ के अल नीनो का विशेष भौगोलिक क्षेत्र में ऊपज पर असर हो सकता है जैसे कि इंडोनेशिया और मलेशिया में ‘पाम तेल’ का उत्पादन।
कुछ जगहों पर खाद्यान्नों की उपलब्धता और कीमतों पर अल नीनो के प्रभाव का बहुत गंभीर असर हो सकता है और वहां भुखमरी और मानवीय संघर्ष जैसे सामाजिक संकट पैदा हो सकते हैं।
दुनिया को खाद्यान्न पर असर:
‘संयुक्त राष्ट्र खाद्यान्न मूल्य सूचकांक’ के आंकड़ों के अनुसार, अल नीनो प्रभाव और दुनिया में खाद्यान्न की कीमतों के बीच सीधा संबंध है। हालांकि, इस प्रत्यक्ष संबंध के बावजूद ऐसा कम ही हुआ है जब अल नीनो वाले साल में कीमतों में बहुत ज्यादा वृद्धि देखी गई हो। यहां तक कि पिछले तीन दशकों में दो सबसे गंभीर अल नीनो प्रभाव के दौरान कीमतों कर्मी दर्ज की गई है।
इस दौरान अन्य कारकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जैसे... एशियाई वित्तीय संकट, 1997 और वैश्विक वित्तीय संकट 2007 से 2008 तक।
गेंहूं की आपूर्ति पर प्रभाव:
अल नीनो के कारण फसल बर्बाद होने हैं, लेकिन दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में उत्पादित फसलों पर अल नीनो का दुष्प्रभाव कम और अच्छा प्रभाव ज्यादा होता है।
उदाहरण के लिए अल नीनो से संघर्ष और सूखा से जूझ रहे ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ (जिबूती, इथोपिया, एरिट्रिया और सोमालिया) में मौसम बेहतर होगा।
इसका बेहतर उदाहरण गेंहूं है। आंकड़े प्रदर्शित करते हैं कि 1980 से ही अल नीनो ने ऑस्ट्रेलिया में गेंहूं के उत्पादन को कैसे प्रभावित किया है।
सबसे कम प्रभावी नौ अल नीनो प्रभावों में से छह के दौरान उत्पादन में कमी आयी है और इनमें से चार में दीर्घकालीक औसम से 30 प्रतिशत कम उत्पादन हुआ है।
ऑस्ट्रेलिया दुनिया के शीर्ष तीन गेंहूं निर्यातकों में से एक है और दुनिया का करीब 13 प्रतिशत निर्यात यहीं से होता है।
ऐसे में ऑस्ट्रेलिया में गेहूं के उत्पादन पर दुष्प्रभाव से इसकी कीमतों में वृद्धि होती है। लेकिन, लेकिन अगर पूरी दुनिया में होने वाले गेंहूं उत्पादन की बात करें तो यह आंकड़ा इतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता है क्योंकि यह वैश्विक उत्पादन का करीब 3.5 प्रतिशत है।
अल नीनो के कारण फसल उत्पादन पर पड़ने वाला कुप्रभाव अन्य क्षेत्रों में होने वाले उत्पादन के कारण नग्न्य हो जाता है।
ज्यादातर देश व्यापार/व्यवसाय के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, ऐसे में अल नीनो का अर्थव्यवस्था पर गहरा असर होगा। इससे कुछ क्षेत्रों में सूखा और कृषि संबंधी संघर्ष जैसी सामाजिक समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
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