देश की खबरें | कंजूरमार्ग की जमीन का स्वामित्व निजी कंपनी को दिए जाने संबंधी आदेश उच्च न्यायालय ने खारिज किया

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मुंबई, 15 जून बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के उपनगरीय कंजूरमार्ग इलाके में 6000 एकड़ भूमि का मालिकाना हक एक निजी कंपनी को दिए जाने से संबंधित 2020 के आदेश को बुधवार को दरकिनार कर दिया और कहा कि ‘‘अपने हक में आदेश जारी कराने के लिए अदालत के साथ बड़ा धोखा किया गया।’’

मुंबई मेट्रो परियोजना के लिए यह आदेश अहम हो सकता है।

महाराष्ट्र सरकार, केंद्र, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) और कई अन्य सरकारी तथा निजी संस्थाओं ने उसी भूमि या उसके कुछ हिस्सों पर स्वामित्व का दावा किया है। राज्य सरकार इस भूमि पर मुंबई मेट्रो के लिए एक कार शेड बनाना चाहती है।

न्यायमूर्ति अनिल मेनन ने बुधवार को कहा कि आदर्श वाटर पार्क्स एंड रिसॉर्ट्स ने इन भौतिक तथ्यों को छिपाकर डिक्री प्राप्त की थी कि इस जमीन के अन्य दावेदार भी हैं।

इस साल मार्च में, महाराष्ट्र सरकार को पता चला था कि उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2020 में आदर्श वाटर पार्क्स एंड रिसॉर्ट्स को इस भूमि का स्वामित्व प्रदान किए जाने का आदेश दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने डिक्री को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था।

इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर केंद्र, महाराष्ट्र सरकार और बीएमसी के बीच विवाद चल रहा है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद आरे कॉलोनी क्षेत्र में कार शेड बनाने की पूर्व योजना को समाप्त करके राज्य सरकार ने लगभग 100 एकड़ जमीन पर मेट्रो परियोजना के लिए एक कार शेड बनाने का प्रस्ताव दिया है।

न्यायमूर्ति मेनन ने कहा कि अक्टूबर 2020 में अदालत को तथ्यों को छिपाकर निजी कंपनी के पक्ष में आदेश पारित करने के लिए राजी किया गया था।

उन्होंने कहा, ‘‘निस्संदेह, जमीन पर अन्य पक्षों के दावे को दबाकर बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की गई है। डिक्री आदेश पक्षों द्वारा अदालत को धोखे में रखकर लिया गया है। मेरे मन में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि अदालत को धोखे में रखा गया।’’

न्यायाधीश ने हालांकि स्पष्ट किया कि वह इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं कि विवादित भूमि का वैध मालिक कौन है।

अदालत ने कहा कि संबंधित पक्षों को इस जमीन के स्वामित्व विवाद को उचित अदालत में ले जाना होगा।

इसने आगे कहा कि अगर पहले डिक्री आदेश पारित करने वाली पीठ को सूचित किया गया होता कि इस जमीन के अन्य दावेदार भी हैं, तो वह इसकी पड़ताल कर लेती।

न्यायमूर्ति मेनन ने कहा, ‘‘डिजिटल सुनवाई (कोविड महामारी के समय) के दौरान आने वाली कठिनाइयों के कारण, वकीलों ने जो कहा उसे अदालत मानने के लिए बाध्य हो गई। इसलिए बड़ी जिम्मेदारी वकीलों पर आती है। अदालत को उस वक्त सभी तथ्यों से अवगत नहीं कराया गया था।’’

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