विदेश की खबरें | ‘पीकॉक स्पाइडर’ मकड़ी के अस्तित्व को खतरा, दो साल पहले हुई थी खोज

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. एडिलेड/पर्थ, 16 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) अगर आपने कभी एक छोटी, आकर्षक रंग की मकड़ी को नाचते हुए देखा है तो संभव है कि आपने पहली बार ‘पीकॉक स्पाइडर’ देखी है।

श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

एडिलेड/पर्थ, 16 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) अगर आपने कभी एक छोटी, आकर्षक रंग की मकड़ी को नाचते हुए देखा है तो संभव है कि आपने पहली बार ‘पीकॉक स्पाइडर’ देखी है।

हर साल पीकॉक स्पाइडर की नई प्रजातियां खोजी जाती हैं; अब इनकी संख्या 113 हो गई है। एक नई खोजी गई प्रजाति ‘मैराटस यांचेप’ केवल पर्थ के उत्तर में यानचेप के पास तटीय इलाकों के एक छोटे से क्षेत्र में ही पाई जाती है।

जैसे-जैसे पर्थ में उत्तर और दक्षिण की ओर शहर फैलते जा रहे हैं, वैसे-वैसे एक समस्या यानी ठिकाने का संकट दूसरी परेशानी यानी विलुप्त होने के संकट को और भी बदतर बना रही है।

मैराटस यांचेप के ठिकाने यानी टीले बड़ी नई संपदाओं के लिए साफ की जा रही भूमि से सिर्फ 20 मीटर की दूरी पर हैं।

अगर इस प्रजाति को औपचारिक रूप से संकटग्रस्त माना गया होता तो इसे संरक्षित किया जा सकता था। लेकिन मकड़ी की खोज महज दो साल पहले यानी 2022 में की गई थी और इसे राज्य या संघ की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल नहीं किया गया। इसका मतलब है कि सरकार के अनुसार, मैराटस यांचेप को कोई संरक्षण नहीं मिला है।

जर्गेन ओटो जैसे उत्साही लोगों के सम्मिलित प्रयासों ने हमारे ज्ञान को काफी बढ़ाया है। 113 वर्णित प्रजातियों में से प्रत्येक का अपना विशिष्ट रंग और नृत्य होता है (नर का अपना रंग और चाल होती है)। लेकिन हम जानते हैं कि पीकॉक स्पाइडर की और भी प्रजातियां हैं जिन्हें पश्चिमी देशों के विज्ञान के अनुसार मान्यता मिलने की प्रतीक्षा है।

पीकॉक स्पाइडर की कई प्रजातियां बहुत छोटे क्षेत्र में ही पाई जाती हैं।

इससे इस प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा बहुत अधिक हो जाता है क्योंकि एक भी खतरा जैसे कि एक बड़ी झाड़ी में आग लगने या उपनगर बनाए जाने से एक बार में ही उनके सभी ठिकाने नष्ट हो सकते हैं।

इसकी अनुमति कैसे दी जा सकती है?

ऑस्ट्रेलिया में किसी भी देशी झाड़ीदार भूमि को साफ करने से पहले, डेवलपर्स को खतरे में पड़ी प्रजातियों की तलाश करने और यह पता लगाने के लिए पर्यावरण प्रभाव सर्वेक्षण कराना होता है कि विकास कार्य से क्या नुकसान होगा। यदि कोई संकटग्रस्त प्रजाति पाई जाती है, तो विकास कार्यों को सीमित या अस्वीकार किया जा सकता है।

समस्या यह है कि इन सर्वेक्षणों में केवल उन प्रजातियों की तलाश की जाती है जो खतरे में हैं। अगर कोई प्रजाति ऑस्ट्रेलिया की बढ़ती हुई संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल नहीं है, तो उसकी तलाश नहीं की जाती। लेकिन मैराटस यांचेप का मूल्यांकन कर यह पता नहीं लगाया गया है कि यह खतरे में है या नहीं। इसका मतलब है कि इसे कोई सुरक्षा नहीं मिली है।

यह एक व्यापक समस्या की ओर इशारा करता है। कोआला और प्लैटिपस जैसे बड़े, प्रसिद्ध ऑस्ट्रेलियाई कशेरुकियों (वर्टेब्रेट्स) को साधारण गैर-कशेरुकी (इनवर्टेब्रेट्स) जीवों की तुलना में अधिक देखभाल और संरक्षण मिलता है। कशेरुकी जीवों के ठिकानों को संरक्षित करने के लिए हम एक मुश्किल लड़ाई लड़ रहे हैं।

कशेरुकी रीढ़ की हड्डी और ढांचे वाले जीवों को कहा जाता है जबकि गैर-कशेरुकी जीवों में रीढ़ की हड्डी या ढांचा नहीं होता है।

दुनिया भर में, कई करुशेकी जीव वास्तव में लुप्त होने की कगार पर हैं। ऑस्ट्रेलिया में कम से कम 300,000 गैरकशेरुकी प्रजातियां हैं, जो 8,000 करुशेकी प्रजातियों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं। लेकिन फिलहाल केवल 101 प्रजातियां ही संघीय सरकार के संकटग्रस्त प्रजातियों की सुरक्षा करने वाले कानूनों, पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता अधिनियम के तहत सूचीबद्ध हैं। समस्या यह है कि हमारे पास औपचारिक संरक्षण सूची और सुरक्षा के लिए अधिकांश गैर कशेरुकी प्रजातियों का आकलन करने के लिए पर्याप्त डेटा नहीं है।

डेटा के लिए होती है पैसों की जरूरत

किसी प्रजाति को संकटग्रस्त सूची में शामिल करने के लिए इस बारे में बहुत ज्यादा डेटा की जरूरत होती है कि वह प्रजाति कहां पाई जाती है और कहां नहीं। इसके लिए समय और विशेषज्ञों के ज्ञान की जरूरत होती है। लेकिन वित्तीय व्यवस्था की कमी है।

नतीजतन, गैर-कशेरुकी जीवों से जुड़ा डेटा इकट्ठा करने के हमारे प्रयास अक्सर स्वतंत्र रूप से काम करने वालों और इन तरह की चीजों में दिलचस्पी रखने वाले व्यक्तियों पर निर्भर करते हैं, जो अक्सर किसी प्रजाति जैसे पीकॉक स्पाइडर के बारे में हमारा ज्ञान बढ़ाने के लिए निकल पड़ते हैं।

जब यांचेप में तटीय टीलों को हटाने जैसे स्पष्ट खतरे सामने आते हैं तो हम एक बार फिर सूचना एकत्र करने के लिए इन स्वयंसेवकों पर निर्भर होते हैं।

शहरों के विस्तार से उत्पन्न समस्या

पर्थ दुनिया के सबसे बड़े शहरों में से एक है। इसके उपनगर 150 किलोमीटर तक फैले हुए हैं, जो उत्तर में टू रॉक्स से लेकर दक्षिण में डावेसविले तक हैं।

पर्थ के कई निवासी तट के किनारे रहना चाहते हैं, जिसकी वजह से शहर के बाहरी इलाकों में नए आवासों की मांग बढ़ रही है। इससे स्थानीय झाड़ीदार भूमि का विनाश होता है और प्रजातियां विलुप्त होने लगती हैं। कुछ प्रजातियां इस बदलाव को सहन कर लेती हैं, लेकिन इनकी संख्या 25 प्रतिशत से भी कम होती है। छोटी, स्थानीय प्रजातियां के सामने विलुप्त होने का सबसे अधिक खतरा है।

पर्थ के विस्तार के सीमित होने का कोई संकेत नहीं दिखता। आवास के लिए भूमि को साफ करने से कार्नेबी के कॉकटू (एक तरह का तोतों) की दशा और भी बदतर हो गई है। पचास साल पहले, कॉकटू के 7,000 से अधिक झुंड शहर के ऊपर से उड़ते थे। अब ऐसा कुछ नहीं है।

हम क्या कर सकते हैं?

मैराटस यांचेप को बचाने के लिए प्रयास जारी हैं। गैर-लाभकारी संस्था ‘इनवर्टेब्रेट्स ऑस्ट्रेलिया’ इसे ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर’ की खतरे में पड़ी प्रजातियों की लाल सूची में शामिल कराने के लिए काम कर रही है। सांसद ब्रैड पेटिट ने अगस्त में संसद में यह मुद्दा उठाया था।

पीकॉक स्पाइडर की एक खासियत है उनका रूप। वे बेहद खूबसूरत होती हैं। नर मकड़ियों पर अलग-अलग पैटर्न के कारण उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। अधिकतर प्रजातियों को पहचानने के लिए आपको किसी विशेषज्ञ प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती, बस एक पैनी नजर चाहिए होती है।

अपनी सुंदरता की वजह से पीकॉक स्पाइडर ने दर्जनों शौकिया ‘अरचनोलॉजिस्ट’ और फोटोग्राफरों का ध्यान आकर्षित किया है जो उनके ठिकाने पता लगाकर जानकारी एकत्रित व साझा करते हैं। इस डेटा का अक्सर किसी प्रजाति को संकटग्रस्त सूची में डालने के लिए सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही इसका इस्तेमाल इन प्रजातियों को सुरक्षा देने के लिए भी किया जा सकता है।

इस छोटी मकड़ी को बचाने में हाल ही में लोगों की दिलचस्पी बढ़ने के बावजूद, शायद अब बहुत देर हो चुकी है। प्रतिष्ठित ऑस्ट्रेलियाई प्रजातियों के बड़े पैमाने पर विलुप्त होने से बचने के लिए, हमें उनके ठिकानों को नष्ट किए बिना निर्माण के बेहतर तरीके खोजने होंगे।

(द कन्वरसेशन) जोहेब माधव

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

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