विदेश की खबरें | भविष्य के आहार में आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होगी, खान-पान पर विचार करना जरूरी

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श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

वेलिंगटन, चार सितंबर (द कन्वरसेशन) आयरन की कमी दुनिया भर में पोषक तत्वों की कमी के सबसे आम रूपों में से एक है।

सूक्ष्म पोषक तत्व आयरन की गंभीर कमी एनीमिया कहलाती है तथा दक्षिण एशिया, मध्य अफ्रीका और पश्चिम अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में प्रजनन आयु की लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं इससे प्रभावित हैं, जबकि उच्च आय वाले देशों में एनीमिया प्रभावित महिलाओं की संख्या 16 फीसदी है।

न्यूज़ीलैंड में 15 से 18 वर्ष की आयु की 10.6 फीसदी महिलाएं और 31 से 50 वर्ष की आयु की 12.1 प्रतिशत महिलाएं आयरन की कमी से पीड़ित हैं। गर्भावस्था की तीसरी तिमाही के दौरान एनीमिया का जोखिम बढ़ जाता है। अत: मां और बच्चे दोनों का अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए आयरन के स्तर की सावधानीपूर्वक निगरानी की जानी चाहिए।

जैसे-जैसे लोग वनस्पति आधारित आहार अपनाने पर विचार करेंगे, आयरन की कमी का खतरा बढ़ने की संभावना होगी।

हम वर्तमान और भविष्य की वैश्विक खाद्य प्रणालियों में पोषक तत्वों की उपलब्धता का अनुमान लगाने के लिए ‘‘सस्टेनेबल न्यूट्रिशन इनिशिएटिव ग्लोबल फूड मास बैलेंस मॉडल’’ के नवीनतम संस्करण का उपयोग करते हैं। इससे पता चलता है कि अगर खाद्य उत्पादन और आपूर्ति के ‘वैश्विक पैटर्न’ नहीं बदले, तो 2040 तक आहार में आयरन की कमी हो सकती है।

इसका मतलब है कि हमें अपने आहार में आयरन की कमी को दूर करना होगा, खासकर किशोरों और महिलाओं में। हमारा तर्क है कि आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थ कम पौष्टिक आहार के सेवन के कारण होने वाली पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए ‘‘वन-स्टॉप समाधान’’ प्रदान कर सकते हैं।

खाद्य सुदृढ़ीकरण या फूड फोर्टिफिकेशन

ब्रेड और अनाज जैसे सामान्य खाद्य पदार्थ सहित विभिन्न खाद्य पदार्थ में पहले से ही अतिरिक्त पोषक तत्व हैं।

ब्रेड में आयोडीन और फोलिक एसिड शामिल करने की अनिवार्यता की तरह वर्तमान में न्यूज़ीलैंड में आयरन पोषण को प्रोत्साहित करने या अनिवार्य करने के लिए कोई सरकारी पहल नहीं है।

चूंकि, आयरन-पोषण रणनीतियों में न्यूज़ीलैंड सहित कई देशों में इसकी कमी को रोकने की क्षमता है, इसलिए हमारा तर्क है कि हमारे खाद्य पदार्थों में आयरन को शामिल करना आहार में आयरन का स्रोत प्रदान करने का एक सुविधाजनक और लागत प्रभावी तरीका हो सकता है।

वनस्पति आधारित आहार अपनाएं

पर्यावरणीय प्रभावों और कार्बन उत्सर्जन कम करने की उम्मीद में अधिकतर उपभोक्ता ऐसे आहार चुन रहे हैं, जिसमें पशु-स्रोत वाले खाद्य पदार्थ कम हैं। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि 2018 से 2021 तक न्यूज़ीलैंड में शाकाहार अपनाने वालों की संख्या में 19 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

एक सतत और टिकाऊ खाद्य प्रणाली के लिए वनस्पति आधारित आहार पर विचार करते समय पोषक तत्वों की उपलब्धता के बारे में बातचीत अवश्य शामिल होनी चाहिए। वनस्पति आधारित खाद्य पदार्थों में अक्सर उच्च मात्रा में फाइबर और फाइटेट होते हैं, जो शरीर की आयरन को अवशोषित करने की क्षमता को कम कर देते हैं।

साबुत अनाज, नट, बीज, फलियां और पत्तेदार साग जैसे वनस्पति आधारित खाद्य पदार्थों में आयरन भरपूर होता है और पशु-स्रोत वाले खाद्य पदार्थों में मौजूद आयरन की तुलना में कम आसानी से अवशोषित होता है। मिश्रित आहार यानी सब्जियां, अनाज और पशु-स्रोत वाले खाद्य पदार्थ जैसे कुछ मछलियों, लाल मांस या मुर्गे का सेवन आयरन अवशोषण की सुविधा प्रदान करता है।

सुदृढ़ीकरण लोगों को वनस्पति-आधारित आहार की ओर मोड़ने में मददगार एक शक्तिशाली रणनीति हो सकती है, लेकिन तब आहार को पोषक तत्वों से समृद्ध करना होगा, अन्यथा उनकी कमी होगी।

एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि आयरन समेत आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ खाद्य पदार्थों को समृद्ध करने से, अधिक क्रमिक आहार समायोजन संभव हो जाता है। पोषक तत्वों से समझौता किए बिना वनस्पति-आधारित आहार अपनाने के इच्छुक उपभोक्ताओं को यह दृष्टिकोण मददगार लग सकता है।

वैसे एक अहम बात यह भी है कि इन आयरन-युक्त खाद्य पदार्थों में अक्सर गेहूं या अनाज आधारित तत्व होते हैं, जो आयरन अवशोषण अवरोधक के रूप में कार्य कर सकते हैं। इसका एक समाधान यह हो सकता है कि आयरन युक्त वनस्पति आधारित खाद्य पदार्थों को विटामिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थों के साथ खाया जाए, जैसे कि संतरे का रस, जो आयरन को अधिक अवशोषित रूप में परिवर्तित करने में मदद करता है।

हालांकि, गरिष्ठ खाद्य पदार्थ आयरन की कमी से निपटने में बहुत लाभ दे सकते हैं, लेकिन कुछ उपभोक्ता इन खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल करने से झिझकते हैं।

‘फूड स्टैंडर्ड्स ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड’ (एफएसएएनजेड), एक सरकारी संस्था है, जिसने दोनों देशों के लिए खाद्य नियम तय किए हैं। एफएसएएनजेड ने पाया कि कई उपभोक्ता गरिष्ठ खाद्य पदार्थों को अप्राकृतिक, प्रसंस्कृत और अपेक्षाकृत कम स्वस्थ मानते थे।

यह बात विशेष रूप से तब स्पष्ट हुई, जब गैर-अनिवार्य सुदृढ़ीकरण की बात आई। नाश्ते के अनाज में या, हाल ही में वनस्पति आधारित दूध और मांस के विकल्पों में शामिल किए गए विटामिन और खनिज, गैर-अनिवार्य या ‘‘स्वैच्छिक फोर्टिफिकेशन’’ के उदाहरण हैं। लेकिन, उपभोक्ता अक्सर इसे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली कोशिश के बजाय एक विपणन रणनीति के रूप में देखते हैं।

पर्याप्त आयरन सेवन के महत्व और आहार में आयरन की अनुमानित कमी को देखते हुए, सुदृढ़ीकरण के लाभों का मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण है। आयरन की कमी के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देने और सुदृढ़ीकरण के सकारात्मक प्रभावों, जैसे शैक्षिक हस्तक्षेप से इन पहलों के प्रति उपभोक्ताओं की सोच बदलने में मदद मिल सकती है।

(द कन्वरसेशन)

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