देश की खबरें | दिल्ली की सत्ता में बदलाव से न्यायालय में उपराज्यपाल के खिलाफ मुकदमों पर अनिश्चितता

नयी दिल्ली, आठ फरवरी दिल्ली सरकार उच्चतम न्यायालय में उपराज्यपाल के साथ कई मुकदमों में उलझी हुई है, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं के नियंत्रण में निर्वाचित सरकार पर उपराज्यपाल की प्रधानता स्थापित करने वाले केंद्र के कानून को चुनौती देने वाली उसकी याचिका भी शामिल है।

इन याचिकाओं की विषय-वस्तु में दिल्ली में प्रशासनिक सेवाओं पर नियंत्रण संबंधी कानून के प्रावधानों को लेकर संवैधानिक चुनौतियों से लेकर सरकारी वकीलों की नियुक्ति का अधिकार उपराज्यपाल को देने के केंद्र के फैसले तक शामिल हैं।

दिल्ली सरकार द्वारा शीर्ष अदालत का रुख करने के पीछे मुख्य कारण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (जीएनसीटीडी) अधिनियम, 2023 को चुनौती दिए जाने का लंबित मामला है, जो क्षेत्र में प्रशासनिक सेवाओं के नियंत्रण से संबंधित है।

राष्ट्रीय राजधानी में भाजपा की सरकार बनने जा रही है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली में सत्ता परिवर्तन के बाद शीर्ष अदालत के समक्ष ये मामले किस प्रकार सामने आते हैं।

अप्रैल 2023 में दिल्ली सरकार ने दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) के अध्यक्ष की नियुक्ति के मुद्दे पर एक याचिका दायर की थी।

बाद में, एक और याचिका दायर की गई थी जिसमें सरकारी स्कूल के शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए फिनलैंड भेजने के संबंध में उपराज्यपाल की मंजूरी की शर्त को चुनौती दी गई।

दिल्ली सरकार की फरिश्ते योजना को पुनः चालू करने के लिए उपराज्यपाल द्वारा धनराशि जारी करने के निर्देश को लेकर भी याचिका दायर की गई।

एक अन्य मामला दिल्ली रिज में पेड़ों की अवैध कटाई के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के खिलाफ अवमानना ​​कार्यवाही से संबंधित है, जिसमें दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना की भूमिका जांच के दायरे में है।

संसद ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2023 को मंजूरी दे दी है, जिसे दिल्ली सेवा विधेयक के रूप में भी जाना जाता है। यह उपराज्यपाल को सेवा मामलों पर व्यापक नियंत्रण देता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह विधेयक कानून बन चुका है।

शीर्ष अदालत ने इससे पहले केंद्र के 19 मई के अध्यादेश को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेज दिया था, जिसमें दिल्ली सरकार से सेवाओं पर नियंत्रण छीन लिया गया था और दो सत्ता केंद्रों के बीच एक नया टकराव शुरू हो गया था।

केंद्र ने 19 मई, 2023 को दिल्ली में ग्रुप-ए अधिकारियों के स्थानांतरण और नियुक्ति के वास्ते एक प्राधिकरण बनाने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश, 2023 लागू किया था। आम आदमी पार्टी नीत सरकार ने सेवाओं के नियंत्रण पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को ‘‘धोखा’’ करार दिया। मामला अभी भी उच्चतम न्यायालय में लंबित है।

अध्यादेश जारी होने से पहले, प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अपने फैसले में केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच आठ साल पुराने विवाद को समाप्त करने का प्रयास किया था। यह विवाद 2015 की गृह मंत्रालय की अधिसूचना से शुरू हुआ था, जिसमें सेवाओं पर उसके नियंत्रण का दावा किया गया था। पीठ ने कहा था कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का प्रशासन अन्य केंद्र शासित प्रदेशों से भिन्न है और संविधान द्वारा इसे ‘विशिष्ट’ दर्जा दिया गया है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि निर्वाचित सरकार का नौकरशाहों पर नियंत्रण होना जरूरी है, अन्यथा सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

अब, नए कानून में दिल्ली, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दमन और दीव तथा दादरा और नगर हवेली (सिविल) सेवा (दानिक्स) कैडर के ग्रुप-ए अधिकारियों के खिलाफ स्थानांतरण, नियुक्ति और अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए एक राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण की परिकल्पना की गई है।

मुख्यमंत्री प्राधिकरण के तीन सदस्यों में से एक हैं, जबकि अन्य दो नौकरशाह हैं। प्राधिकरण द्वारा लिए जाने वाले निर्णय बहुमत से लिए जाएंगे और विवाद की स्थिति में मामला उपराज्यपाल के पास भेजा जाएगा, जिनका निर्णय अंतिम होगा।

शीर्ष अदालत के फैसले से पहले दिल्ली सरकार के सभी अधिकारियों का स्थानांतरण और नियुक्ति उपराज्यपाल के कार्यकारी नियंत्रण में थी।

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