जरुरी जानकारी | निविदा प्रणाली पारदर्शिता के लिए अपनायी गई लेकिन जमीनी हकीकत कुछ अलग: न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि आर्थिक गतिविधियों में सरकार की बढ़ी हुई भूमिका और उसके साथ ही आर्थिक उदारता की उसकी क्षमता अधिक पारदर्शिता वाली निविदा प्रणाली बनाने की आधारशिला थी, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लगभग कोई भी निविदा चुनौती से परे नहीं है।

नयी दिल्ली, 17 सितंबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि आर्थिक गतिविधियों में सरकार की बढ़ी हुई भूमिका और उसके साथ ही आर्थिक उदारता की उसकी क्षमता अधिक पारदर्शिता वाली निविदा प्रणाली बनाने की आधारशिला थी, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लगभग कोई भी निविदा चुनौती से परे नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि बिना सोच- विचार वाली अपीलों का नियम नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने इस तरह के मुकदमों में लिप्त वाणिज्यिक इकाइयों से खर्च वसूलने के लिए अपनी तरह की एक नई पहल का जिक्र किया।

न्यायालय ने कहा कि निविदा क्षेत्राधिकार वाणिज्यिक मामलों पर गौर करने के लिए बनाया गया था और जहां पार्टियां लगातार निविदाओं के जारी होने को चुनौती देती हैं। न्यायालय ने कहा कि उनका मानना है कि निविदा प्राप्त करने वाले पक्ष को खर्च की रकम मिलनी चाहिए और जो पार्टी हारती है उसे इस लागत का भुगतान करना चाहिए।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ ने तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी निविदा के नियमों और शर्तों पर विवाद को लेकर कॉरपोरेट संस्थाओं के बीच वाणिज्यिक विवाद का फैसला करते हुए कहा कि ठेके से जुड़े ऐसे मामलों की न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमाएं हैं।

पीठ ने 29 अप्रैल के मद्रास उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ यूफ्लेक्स लिमिटेड द्वारा दायर एक अपील पर यह आदेश पारित किया।

न्यायालय ने 'कॉस्ट फॉलोइंग कॉज' के सिद्धांत को अपनाया। कई देशों में इस सिद्धांत का पालन किया जा रहा है लेकिन भारत में इसको लेकर झिझक है। इसके साथ ही निविदा प्रक्रिया की शर्तों को चुनौती देने के लिए दो कंपनियों पर लागत (जुर्माना) लगाई और उन्हें निविदा प्राप्त करने में सफल कंपनी को कानूनी शुल्क तथा राज्य सरकार को मुआवजा देने के लिए कहा।

पीठ ने कहा कि राज्य के खिलाफ अधिकारों को लागू करने के लिए संघर्ष में अलग-अलग सिद्धांत लागू होते हैं लेकिन वाणिज्यिक मामलों में 'कॉस्ट फॉलोइंग कॉज' सिद्धांत का पालन करना चाहिए। इस सिद्धांत के तहत किसी दीवानी विवाद में हारने वाले पक्ष को मुकदमे में आने वाला कानूनी खर्च का भुगतान दूसरे पक्ष को करना होता है।

पीठ ने यूफ्लेक्स लिमिटेड को 23.25 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया जिसकी अपील को स्वीकार कर लिया गया। इसके अलावा ​राज्य सरकार को दो प्रतिद्वंद्वी फर्मों द्वारा मुआवजे के रूप में 7.58 लाख रुपये दिए जाने का आदेश दिया।

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