विदेश की खबरें | श्रीलंका की शीर्ष अदालत ने राजपक्षे परिवार के खिलाफ मामले की सुनवाई की अनुमति दी

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श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

कोलंबो, सात अक्टूबर श्रीलंका के सर्वोच्च न्यायालय ने राजपक्षे परिवार के खिलाफ एक अधिकार समूह द्वारा दायर एक मामले की सुनवाई की अनुमति दे दी है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल श्रीलंका नामक इस अधिकार समूह का आरोप है कि राजपक्षे परिवार ही देश के बढ़ते हुए कर्ज और गंभीर आर्थिक संकट के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल श्रीलंका ने 17 जून को इस संबंध में एक जनहित याचिका दायर कर दावा किया था कि पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे, उनके भाई महिंदा राजपक्षे और बासिल राजपक्षे, केंद्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर अजित निवार्ड काबराल और वित्त मंत्रालय के शीर्ष नौकरशाह एस आर अट्टीगले देश के मौजूदा आर्थिक संकट के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

अधिकार समूह ने दावा किया कि याचिका में नामित प्रतिवादी श्रीलंका के बढ़ते विदेशी कर्ज, कर्ज अदायगी में चूक और मौजूदा आर्थिक संकट के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया है कि राजपक्षे नेतृत्व द्वारा समय पर कार्रवाई करने में विफल रहने के कारण श्रीलंका दिवालिया हो गया और घोषणा की कि देश अपनी अंतरराष्ट्रीय ऋण प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में असमर्थ है।

गौरतलब है कि राजपक्षे परिवार ने लगभग दो दशकों तक श्रीलंका के राजनीतिक परिदृश्य पर अपना दबदबा कायम रखा था। बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों के कारण राजपक्षे परिवार को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने श्रीलंका में सुलह, जवाबदेही और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए बृहस्पतिवार को एक मसौदा प्रस्ताव को स्वीकार किया लेकिन इस दौरान भारत ने मतदान में भाग नहीं लिया।

भारत ने मतदान में भाग नहीं लेते हुए जोर दिया कि वह श्रीलंका के तमिलों की वैध आकांक्षाओं और सभी श्रीलंकाई लोगों की समृद्धि से संबंधित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए श्रीलंका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ काम करेगा।

जिनेवा में हुए मानवाधिकार परिषद के 51वें सत्र में ‘श्रीलंका में सुलह, जवाबदेही और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना' के संबध में मसौदा प्रस्ताव स्वीकार किया गया। 47 सदस्यीय परिषद में 20 देशों ने मसौदा प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जबकि चीन और पाकिस्तान समेत सात देशों ने इसके खिलाफ वोट दिया और भारत, जापान, नेपाल तथा कतर इससे गैर हाजिर रहे।

प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने वालों में ब्रिटेन, अमेरिका, अर्जेंटीना, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, मैक्सिको और नीदरलैंड समेत अन्य देश हैं।

श्रीलंका में सुलह, जवाबदेही और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने संबंधी प्रस्तावों को 2012, 2013, 2014, 2015, 2017, 2019 और 2021 में भी लाया गया था।

श्रीलंका सरकार ने इनका विरोध किया है और इन्हें अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है।

श्रीलंका करीब-करीब दिवालिया हो चुका है और उस पर 51 अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज भी है, जिसमें से 2027 तक उसे 28 अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज चुकाना ही होगा।

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