देश की खबरें | बंदूकें शांत हो जाने के बाद भी बेलाउर में समाज विभाजित
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. गांव के दो अलग अलग छोरों पर दो मूर्तियों को छोड़ दें तो बेलाउर भी बिहार की अन्य ग्रामीण बस्तियों की ही तरह है जहां अवरुद्ध नालियों और बदहाल सड़कों के बीच प्रशासनिक उपेक्षा साफ दिखती है।
संदेश (बिहार), 26 अक्टूबर गांव के दो अलग अलग छोरों पर दो मूर्तियों को छोड़ दें तो बेलाउर भी बिहार की अन्य ग्रामीण बस्तियों की ही तरह है जहां अवरुद्ध नालियों और बदहाल सड़कों के बीच प्रशासनिक उपेक्षा साफ दिखती है।
एक प्रतिमा हाथ में तलवार लिए घोड़े पर सवार रणवीर चौधरी की है जबकि दूसरी मूर्ति संत रविदास की है जो तुलनात्मक रूप से छोटी है। ये मूर्तियां गाँव के लोगों और उनके संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
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कहा जाता है कि भूमिहार जाति से आने वाले रणवीर चौधरी ने 19 वीं शताब्दी में भोजपुर में प्रभावशाली राजपूतों से अपने समुदाय की रक्षा की। वहीं रविदास दलित चेतना के प्रतीक हैं।
एक समय बिहार में जातियों के बीच संघर्ष का केंद्र रहे बेलाउर में अब शांति है। यहीं ऊंची जाति के भूस्वामियों के लड़ाकू दस्ते रणवीर सेना का गठन हुआ था। रणवीर सेना का भाकपा-माले (लिबरेशन) से टकराव था जिसने ऊंची जाति के आधिपत्य से लड़ने के लिए दलितों को गोलबंद किया था। दोनों के बीच खूनी संघर्ष में दर्जनों लोग मारे गए थे।
शांति के बाद में गांव में जातिगत विभाजन बरकार है।
ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया ने आठ अक्टूबर, 1994 को रणवीर चौधरी के नाम पर रणवीर सेना का गठन किया था।
भूषण दुबे (34) ने कहा, "इलाके में हमेशा गोलियां चलती रहती थीं।’’ दुबे का परिवार रणवीर सेना से जुड़ा था।
उन्होंने पीटीआई से कहा, गोलियों की इतनी आवाजें होती थीं कि हमारे गाँव के एक सैनिक, जो छुट्टी में आए थे, ने कहा था कि उन्होंने सीमा पर भी ऐसी गोलीबारी नहीं देखी।’’
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