वैज्ञानिकों का दावा : तेजी से हो रहे शहरीकरण का संबंध नयी बीमाारियों से

ब्रिटेन स्थित लिंकन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं सहित वैज्ञानिकों के एक दल के मुताबिक, इस तरह के विस्तार से लाखों लोगों के रहने और प्रकृति के साथ उनके संबंधों पर असर पड़ता है।

लंदन, 22 अप्रैल वैज्ञानिकों ने हाल ही में किए गए एक अध्ययन में दावा किया है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण की वजह से नयी संक्रमक बीमारियों के लिए ‘‘नयी पारस्थितिक पनाहगाहें’’ स्थापित हो रही हैं जिसे देखते हुए भविष्य में महामारी के खतरे को नियंत्रित करने के लिए इन इलाकों में भी उचित शासन व्यवस्था की जरूरत है।

ब्रिटेन स्थित लिंकन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं सहित वैज्ञानिकों के एक दल के मुताबिक, इस तरह के विस्तार से लाखों लोगों के रहने और प्रकृति के साथ उनके संबंधों पर असर पड़ता है।

जर्नल अर्बन स्टडीज में प्रकाशित समीक्षा शोधपत्र में 1980 के बाद से शहरीकरण के बढ़ते चलन और हर दशक में आने वालीफैलने वाली बीमारियों की कुल संख्या में इसकी भूमिका का आकलन किया गया है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि खासतौर पर एशिया और अफ्रीका में तेजी से हो रहे शहरीकरण की वजह से आबादी शहरों के बाहर उपनगरीय इलाकों में बस रही है जिससे शहरी और ग्रामीण पर्यावरण के संबंध अस्थिर हो रहे हैं।

अध्ययन के मुताबिक ये बस्तियां पड़ोसी उपनगर, अनाधिकृत रूप से बनाए गए आवास, शरणार्थी शिविर और फैक्टरी एवं खदानों के पास रहने के लिए बनाए गए आवास हो सकते हैं।

अध्ययन में कहा गया कि इस तरह शहरों के बाहर बसी आबादी नयी संक्रामक या दोबारा उभरने वाली बीमारियों का स्रोत बन सकती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इन इलाकों में रहने वाले लोगों को जानवरों से इन्सानों को होनी वाली बीमारियों का सबसे अधिक खतरा है क्योंकि यह आबादी अपने जीविकोपार्जन के लिए विस्थापित वन्य जीवों के संपर्क में आ सकती है जबकि सामान्यत: शहरों में बसी आबादी ऐसे जीवों के संपर्क में नहीं आती।

शोधकर्ताओं ने कहा कि इस तरह के इलाके घने बसे होते हैं, बसावट की योजना नहीं होती, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी होती है और सरकारी एजेंसियों की नजर से भी ये इलाके दूर होते हैं।

उन्होंने कहा कि ये इलाके शहर और गांवों के बीच में होते हैं जिससे नगर निगम, क्षेत्र और यहां तक की राष्ट्रीय सीमा को प्रभावी रूप से पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता।

अध्ययन में रेखांकित किया गया है कि सार्स और इबोला जैसी बीमारियां इसका उदाहरण हैं जो इसी प्रकार के उपनगरीय क्षेत्रों में शुरू हुईं और बाद में स्थापित शहरों तक संक्रमण फैल गया।

वैज्ञानिकों ने कहा कि इस क्षेत्र में आगे अंतर्विषयक शोध की जरूरत है, खासतौर पर दुनिया की मौजूदा कोविड-19 के खिलाफ कार्रवाई के संबंध में, जिसकी शुरुआत दिसंबर में चीन के वुहान शहर में हुई।

लिंकन विश्वविद्यालय से संबद्ध भूगोल विद्यालय में शहरी विषय के भूगोलवेत्ता और प्रमुख शोधकर्ता क्रेगटन कॉनोली ने कहा, ‘‘ आर्थिक विकास, श्रम बाजार में बदलाव और शहरी विस्तार में टकराव के अलावा एवं विकासशील देशों में गांवों से शहरों की ओर अभूतपूर्व पलायन हो रहा है। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘ यातायात के साधन में सुधार से गांवों, उपनगरों और शहरों तक यात्रा के समय में अभूतपूर्व कमी आई है। हालांकि, बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अवसंरचना जैसे स्वास्थ्य केंद्र, स्वच्छ पेयजल का विकास उस गति से नहीं हुआ है, जैसा होना चाहिए। ’’

वैज्ञानिकों का मनाना है कि मुख्य शहरों के बाहरी इलाकों में बसे लोगों के लिए बीमारी फैलने पर त्वरित कार्रवाई करने की सरकारी मशीनरी भी कमजोर है।

उन्होंने कहा कि संभवत: इसकी वजह न्यायाधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद है।

वैज्ञानिकों ने रेखांकित किया कि शहरों, उपनगरों और गांवों के संबंधों में आने वाले बदलाव की समझ, इन बदलाओं की वजह और उनका बेहतर तरीके से प्रबंधन संक्रामक बीमारियों के खतरे को कम करने की कुंजी है।

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