जरुरी जानकारी | कोविड-19 से मार्च 2022 तक कंपनियों का 1.67 करोड़ रुपये का कर्ज बैंकों की चिंता बढ़ा सकता है: रिपोर्ट
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. कोविड- 19 महामारी के आर्थिक प्रभाव के चलते शीर्ष- 500 कंपनियों द्वारा लिये गये कर्ज में से 1.67 लाख करोड़ रुपये का ऋण मार्च 2022 तक बैंकों की चिंता बढ़ा सकता है। कंपनियां समय पर कर्ज चुकाने से पीछे रह सकती हैं और यह फंसे ऋण की श्रेणी में आ सकता है। सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में यह कहा गया है।
मुंबई, छह जुलाई कोविड- 19 महामारी के आर्थिक प्रभाव के चलते शीर्ष- 500 कंपनियों द्वारा लिये गये कर्ज में से 1.67 लाख करोड़ रुपये का ऋण मार्च 2022 तक बैंकों की चिंता बढ़ा सकता है। कंपनियां समय पर कर्ज चुकाने से पीछे रह सकती हैं और यह फंसे ऋण की श्रेणी में आ सकता है। सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में यह कहा गया है।
इंडिया रेटिंग्स एण्ड रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस राशि को मिलाकर ऐसे फंसे कर्ज की कुल राशि 4.21 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है जो कि कुल कर्ज का 11 प्रतिशत होगी।
इस साल की शुरुआत में जब कोरोना वायरस फैलना शुरू हुआ उस समय भी बैंकों के कर्ज की स्थिति उसकी गुणवत्ता को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही थी। रिजर्व बैंक ने कोविड- 19 के अर्थव्यवस्था पर पड़े प्रभाव को देखते हुये विभिन्न कर्जों के भुगतान पर अगस्त 2020 तक के लिये छूट दे दी जो कि दबाव को बढ़ायेगा। सरकार ने महामारी के आर्थिक प्रभाव को कम करने के लिये 21 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज भी घोषित किया है।
रेटिंग एजेंसी का मानना है कि महामारी और इसके साथ ही अन्य नीतिगत कदमों से शीर्ष 500कंपनियों द्वारा लिये गये कर्ज में से 1.67 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बैंकों के लिये अतिरिक्त दबाव वाला साबित हो सकता है।
एजेंसी ने कहा है कि महामारी की शुरुआत के समय उसने मार्च 2022 तक 2.54 लाख करोड रुपये के कर्ज के फंसे ऋण में परिवर्तित होने का अनुमान लगाया था। अब 1.67 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त कर्ज के इसमें परिवर्तित होने से यह आंकड़ा कुल 4.21 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यह समूचे कंपनी क्षेत्र के कुल कर्ज का 18.21 प्रतिशत तक होगा। यह आंकड़ा वर्तमान में दबाव वाला माने जाने वाले 11.57 प्रतिशत के आंकड़े से ऊंचा है।
एजेंसी ने चेतावनी देते हुये कहा है कि आने वाले समय में पुनर्वित का दबाव बढ़ सकता है और कंपनियों के लिये समय पर वित्तीय संसाधन जुटाना लगातार चुनौतीपूर्ण बना रह सकता है।
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